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Sunday, October 24th, 2021

श्रीमती भारती पाराशर वर्ष 2020 के लिए INVC लाइफ टाइम अचीवमेंट्स इंटरनेशनल अवार्ड के लिए चयनित

इससे पहले श्री पीएम भारद्वाज और श्री विजय समनोत्रा को वर्ष 2020 के लिए  लाइफ टाइम अचीवमेंट्स इंटरनेशनल अवार्ड के लिए चुना जा चुका है ,  कमेटी के सामने अभी सैकड़ो नामांकन बाकी है , जिनमे चुनकर वर्ष 2020 के लिए चौथे व् अंतिम अवार्ड की घोषणा कर दी जाएगी।
आई एन वी सी
न्यूज़ नई दिल्ली ,

अवार्ड सेलेक्शन कमेटी संयोजक डॉ वीरेंद्र रावत अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट,  अंतरराष्ट्रीय समाचार विचार निगम के अंतरराष्ट्रीय सलाहकार (मानद) डॉ डीपी शर्मा और अवार्ड सलेक्शन कमेटी के चेयरमैन जाकिर हुसैन ने एक लम्बे मंथन के बाद , सैकड़ो प्राप्त नामांकन में से ,  श्रीमती भारती पाराशर के जन सेवा कार्यो के साथ - साथ ही  बाकि दूसरी उपलब्धियों को मद्देनज़र रखते हुए , सर्वसम्मति से अंतरराष्ट्रीय समाचार एवं विचार निगम के लाइफ टाइम अचीवमेंट इंटरनेशनल अवार्ड के लिए चयनित किया !

अंतरराष्ट्रीय समाचार एवं विचार निगम द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में दिए जाने वाले और दूसरे अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों की घोषणा करना अभी बाकी हैं , ज्ञात रहे कि सन 2020 का  पुरस्कार वितरण समारोह कोरोना महामारी के कारण स्थगित कर दिया गया था । अब यह समारोह वर्चुअल माध्यम से सितंबर - अक्टूबर में आयोजित किया जाएगा जिसकी तारीख की घोषणा बाकी के अवार्ड फाइनल होने के बाद की जाएगी।
 
श्रीमती भारती पाराशर के बारे में , क्यों अवार्ड  सेलेक्शन  कमेटी ने अवार्ड के लिए किया चयन ? 

वो पथ क्या पथिक कुशलता क्या, जिस पथ में बिखरे शूल न हों,
नाविक की धैर्य कुशलता क्या, जब धारायें विपरीत न हों !!

उक्त पंक्तियाँ ......वीरभूमि राजस्थान के सुजानगढ़ तहसील में एक ब्राह्मण परिवार म़ें जन्मी मैडम भारती पाराशर की जिंदगी का यही फलसफा आज उनके संघर्ष और फर्श से अर्श तक की जीवन यात्रा की कहानी को बयान करता है / शिक्षा को देश सेवा के प्रकल्प रूप मैं कर्मयोग के माध्यम से राष्‍ट्रीय पहचान दिलाने के लिये प्रयासरत एक ऐसी शख्सियत हैं वे, जिन्हैं आज हजारों शिक्षार्थी एवं शिक्षाकर्मी प्यार से " मातुश्री " कहकर संबोधित करते हैं / आइये जानें उनके कर्मयोगी जीवन वृतान्त की यात्रा क़े पहलुओं को।

३५ वर्ष पूर्व आपने शिक्षा सेवा के राष्ट्रीय प्रकल्प क़ी जो शुरुआत की थी वह आज अनेकों महर्षि अरविंद शिक्षा संस्थानों यथा महर्षि अरविंद इन्स्टिट्यूट ऑफ साइन्स एण्ड मॅनेज्मेंट अम्बाबाड़ी जयपुर, महर्षि अरविंद इन्स्टिट्यूट ऑफ इंजिनियरिंग एण्ड टेक्नोलॉजी, मानसरोवर जयपुर, महर्षि अरविंद इंटरनॅशनल इन्स्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, कोटा, महर्षि अरविंद इन्स्टिट्यूट, जयपुर, महर्षि अरविंद कॉलेज ऑफ फार्मेसी अम्बाबाड़ जयपुर, महर्षि अरविंद इन्स्टिट्यूट ऑफ फार्मेसी, जयपुर, महर्षि अरविंद इन्स्टिट्यूट ऑफ होटल मेनेज्मेंट, मानसरोवर जयपुर, महर्षि अरविंद इन्स्टिट्यूट ऑफ मेनेज्मेंट, मानसरोवर, जयपुर एवं प्रेसीडेंसी कॉलेज ऑफ इंजिनियरिंग कोटा के रूप म़ें राष्ट्रीय एवं अंतर्रास्ट्रीय स्तर पर एक पहचान बना चुके हैं/ अब एक इंटरनॅशनल लेवल की महर्षि अरविंद यूनिवर्सिटी बनाने का शुरू हो चुका है।

१९७५ म़ें उनकी मुलाकात  एक परिचित शिक्षक से हुई जिन्होंने कहा कि आपके व्यक्तित्व म़ें बहुत सामर्थ्य है, आप शिक्षा एवम राष्ट्र निर्माण की दिशा में बहुत कुछ कर सकती हैं / उनके इस कथन ने उनके मन में सुषुप्त चिंगारी को मानो एक हवा सी लग गयी, और उनके मन में कच्ची वस्तियों म़ें रहने वाले बच्चों के लिये एक स्कूल खोलने की इच्छा जागृत हुई।

उन्होंने सोचा कि "संकल्प ऐसा करो, जो मानवीय दृष्टिकोण से मानवीय हित क़ी बात करे" / फिर क्या था; एक मिशन की शुरुआत हुई, शिक्षा के मिशन की; जिसका वृहत परिणामी आपके सामने है / शुरुआत म़ें उन्होंने जनप्रतिनिधियों से मिलकर कच्ची वस्तियों म़ें कुपोषण के शिकार बच्चों, जो स्कूल नहीं जा पाते थे उनको एकत्र किया / ऐसी महिलाओं को एकत्र किया जिनकी आर्थिक दशा ठीक नहीं थी / और इस प्रकार शुबह गरीब एवं कुपोषित बच्चों के लिये स्कूल एवं शाम को यूनिसेफ के सहयोग से बालवाड़ी का संचालन किया / उस जमाने म़ें मुफ्त शिक्षा देना उनके लिये बड़ा ही मुश्किल कार्य था, जब उनके पास आवश्यक मूलभूत सुविधाएँ भी न थीं / फिर भी श्रीमती पराशर ने हिम्मत की और १० रुपये मात्र फीस लेकर आवश्यक शुविधाएं जुटाना शुरू किया / ऐसे आर्थिक हालातों के चलते उन्हें अपने "दो सोने के कड़े" भी बेचने पड़े क्योंकि उनके लिये अब मिशन बहुत महत्वपूर्ण बन चुका था/  इसके पश्चात अनाथ बच्चों के लिये समाज कल्याण विभाग के सहयोग से एक स्कूल खोला / और इस प्रकार वे ही उन अनाथ बच्चों की माँ एवं पिता बनी / मातृत्व सेवा की सुखद अनुभूति को उन्होंने अलौकिक रूप में पहली बार महसूस किया।
इस मिशन के समानान्तर श्रीमती पराशर ने गरीब महिलाओं को कढ़ाई बुनाई का काम दिलाना शुरू किया / वक्त गुजरता गया / इस दौरान उनकी मुलाकात अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ममता की प्रतिमूर्ति मदर टैरेसा से हुई / बड़ी ही आत्मीय मुलाकात थी वो, अविस्मरणीय पल; सेवा की एक महानतम देवीय स्वरूपा शक्ति से मुलाकात / श्रीमती पराशर को लगा कि उनका मिशन और वे दोनों सही दिशा म़ें जा रहे हैं / उन्हें ऐसा लगा जैसे, उनके लक्ष्य का कोई मार्गदर्शक मिल गया हो।

इसके ५ साल बाद श्रीमती पराशर ने ८वीँ फेल महिलाओं के कल्याण के लिये काम शुरू किया / इस प्रकार उनका सेवा का ये मिशन अब शिक्षा से आगे बढ़कर शराबबंदी , महिला अत्याचार आदि क्षेत्रों म़ें फैलने लगा था / उन्हें किसी अदृश्य शक्ति ने मानवीय दृष्टिकोण के लिये जगाया और कहा कि तुम्हारा जीवन सिर्फ तुम्हारे लिये नहीं है / तुम्हारा जीवन समाज एवं राष्ट्र निर्माण के लिये है / शुरू म़ें तो श्रीमती पराशर को ये सब स्वप्न जैसा लगा परंतु धीरे धीरे मुझे ऐसा आभास होने लगा कि कोई उन्हें झकजोर रहा है; कि उठो अभी तुम्हें बहुत दूर जाना है, अपने लिये न सही समाज एवं राष्ट्र के लिये ही सही / एक बार तो उनका मन परिवार की सोचकर डगमगाने  लगा था / क्योंकि वे तीन बच्चों की माँ भी थी / श्रीमती पराशर ने मन क़ी स्थिरता के लिये " गीता " पढ़ना शुरू किया / धीरे धीरे यही गीता ज्ञान, उनके लिये शिक्षा सेवा के राष्ट्रीय कर्मयोग का आधार बन गया।

उस समय राजनीति, भले एवं राष्ट्रीय सोच वाले लोगों का कार्य क्षेत्र हुआ करती थी / एक  बार उनकी मुलाकात श्रीमती इंदिरा गाँधी से हुई / उस मुलाकात ने तो श्रीमती पराशर का जीवन ही परिवर्तित कर दिया / अब उनके व्यक्तित्व म़ें कठोर अनुशासन, दृढ इच्छा शक्ति, राष्ट्र के प्रति नजरिया सब कुछ बदल गया।

उस समय उनकी उम्र २६ साल की थी / श्रीमती पराशर मिशन क़े साथ-साथ बच्चों की माँ भी थी / घर संभालना, बच्चों को संभालने के साथ- साथ समाज सेवा, शिक्षा सेवा एवं पीड़ित मानवता की सेवा एक मुश्किल कार्य था उनके लिये परंतु फिर भी उनके मजबूत इरादों ने कभी धोखा नहीं दिया, निराश नहीं किया / और इस प्रकार वे आगे बढ़ती गयी / १९७५ म़ें शुरू किया स्कूल उन्होंने अब तकनीकी शिक्षा की ओर मोड दिया/ उन्होंने आई.टी.आई की शुरुआत की / इसके बाद डिप्लोमा इन फार्मेसी, पी.जी.डी.एम फिर इंजिनियरिंग, एम.सी.ए, होटल मैनेजमेंट और अब विश्वविध्यालय की स्थापना/ ये सब ३५ साल क़े सतत् संघर्ष का ही तो परिणामी है, न कि एक दिन की जिद का फल / ये सब कुछ जो आज आप देख रहे हैं वह उस पराशक्ति के आशीर्वाद क़ी ही परिणिती है जिसने उन्हें इस प्रकल्प के लिये चुना और आपको इसका साक्षी बनाया
.
कहते हैं कि " आंधियों मैं चिराग जलाने का हुनर कोई उनसे सीखे" .
तूफ़ानी रफ़्तार से मानवीय संवेदनाओं को आंचल में समेटे, सपनों को 'हकीकत' में बदलने की जिद ने उन्हैं " सच्चे अर्थों में हजारों शिक्षा सेवा के लाभार्थी एवं शिक्षार्थियों की 'मातुश्री' बना दिया” /
उन्होंने उस भारत को देखा है जिसने गुलामी की दास्तान झेली / उस जमाने में शिक्षा एक दिवा स्वप्न की तरह अमीरों की बंधक थी? इस बारे में  उनके ये विचार थे उस वक्त ?
वे उस मिशन का एक छोटा सा अंश बनी जिसमें गुलामी की दास्तान से शिक्षा को भी मुक्त होना था / उनका मानना है कि हर इंसान मैं परमात्मा का एक अंश होता है / उसके दिल मैं ज्ञानरूपी प्रकाश का दीपक जलाना किसी मंदिर में दीपक जलाने के सदृश है / शिक्षा को भी गुलामी की जंजीरों से मुक्त होना चाहिये / परमात्मा हर इंसान को दीपक जलाने का मौका नहीं देता वल्कि सिर्फ उन्ही को देता है जिनमें दिये जलाने का हुनर परमात्मा प्रदत्त हो एवं उसको साकार करने की असीम उर्जा एवं जज्वा हो /
वे कहतीं हैं कि मैने तो एक  दीपक जलाया था / ये श्रंखला कैसे बनी, ये तो उस महान आत्मा महर्षि अरविंदो एवं पराशक्ति सांई की देन है, करने वाला वही है, हम तो सिर्फ निमित्त् मात्र हैं l

लोग उन्हें एक मजबूत महिला के रूप मैं जानते पहचानते हैं / हमारे देश का सांस्कृतिक ताना - बाना कुछ ऐसा है कि यहाँ उनके जैसी कुछ बिरली महिलाओं ने ही अपने दम पर मुकाम हासिल किये हैं/ वे भारतीय महिला शक्ति के उत्कर्ष का एक उदाहरण हैं , उनके लिये एक रॉल मॉडल हैं  / उनको अनेकों पुरुस्कारों से नवाजा गया है l

पुरस्कार पुरस्कार / सम्मान पाकर आपको कैसा लगता है ? आप संघर्षशील महिला शक्ति के लिये क्या संदेश देना चाहेंगी ?
देखिये पुरस्कारों  की दरकार मुझे न तो कभी थी, और न कभी होगी / मेरा तो " राष्ट्र भावना से प्रेरित काम और उससे मिलने वाली संतुष्ठी ही पुरस्कार है " / ऐसे कई मौके आये जब मैने पुरस्कार स्वीकारने से ही मना कर दिया / जहां तक महिलाओं के लिये संदेश की बात है; तो मेरा उन सभी बहिन, बेटिओं एवं माताओं से यही कहना है कि " वो महिला भला कमजोर कैसे हो सकती है जिसने कमजोर कहने वाले पुरुष को जन्म दिया, उसको बड़ा किया " / नारी तो ब्रह्म्मांड क़ी अधिष्ठात्री है / नारी जब-जब कमजोर हुई तो सिर्फ अपने कारण और जब-जब वो शक्तिस्वरूपा बनी तब भी वह अपने ही कारण / बदलते युगों में जीवन देने वाली को जीवन क़ी शक्ति को समझना होगा।
मैं तो यही कहूँगी कि -

" हो के मायूश ना यूं , शाम से ढलते रहिये,
जिंदगी भोर है सूरज सा निकलते रहिये !
एक ही पाँव पर ठहरोगे तो थक जाओगे,
धीरे-धीरे ही सही पर राह पे चलते रहिये !! "

मैं माँ हूँ! शिक्षा एक छोटी सी गर्भस्थ बालिका है मेरे लिये ? मैं संसार में लाकर इसके प्रकाश को राष्ट्र की चहुँ दिशाओं में फैलाना चाहती हूँ।
उनका ये संदेश महिलाओं एवं युवाओं में बारूद का काम करता है / 'गीता' ज्ञान को जीवन में उतारने का उनका संदेश ......आज सबको प्रेरित करता है / इंसानियत और राष्ट्र-प्रेम से ओत-प्रोत उनके व्याख्यानों के बारे म़ें ये कहना उचित होगा कि-

" गले में उसके खुदा क़ी एक अजीब कुदरत है,
जब वो बोलती है तो एक रोशनी सी निकलती है “l

आज भी आप अपने मिशन को कामयाबी क़ी उंचाइओं तक पहुचाने के लिये प्रयासरत हैं/ सुना है कि आपका व्यक्तित्व चार महान सख्शियतों का सम्मिश्रण है l

क्या वे दिव्य आत्मा महर्षि अरविंदो, पराशक्ति सांई, महान नारी श्रीमती इंदिरा गाँधी एवं ममतामयी मदर टैरेसा हैं?

हाँ, बिल्कुल सही पहचाना आपने / मैने योगी महर्षि अरविंदो से "आध्यात्म एवं देशभक्ति",  बाबा साँई से "कृपा", इंदिरा जी से "शक्ति" एवं मदर टैरेसा से "निस्वार्थ मातृत्व " को प्रत्यक्ष महसूस किया और लिया एवं जीवन म़ें अपनाया  भी।

आपका कोई अहम संदेश-

मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर वो कहतीं हैं -

इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर होना....
हम चले नेक रस्ते पे हमसे, भूलकर भी क़ोई भूल हो ना.....


शिक्षा रूपी कर्मयोग की प्रतिमूर्ति श्रीमती भारती पराशर को वर्ष 2020 के लिए आईएनवीसी  लाइफ टाइम अचीवमेंट्स इंटरनेशनल अवार्ड प्रदान करने की घोषणा करते हुए हम गौरवान्वित महसूस करते हैं।

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