Close X
Sunday, February 28th, 2021

विटामिन D कमी से कमजोर होती है हड्डियाँ

एक रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिसर्च के मुताबिक भारत में करीब 70 प्रतिशत लोग विटमिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। विटमिन डी की कमी होने पर हड्डियों का कमजोर होना और हड्डियों से संबंधित बीमारियां, इम्यून सिस्टम कमजोर होना और डिप्रेशन की स्थिति शामिल है। ऐसे में अगर आप जिम में जाकर पसीना भी बहा रहे हैं, तो कोई फायदा नहीं होगा। इसलिए आपको अपनी डायट में कुछ ऐसी चीजों को शामिल करना चाहिए जिन्हें पीने से आपके शरीर को भरपूर विटमिन डी मिलेगा।
ऑरेंज जूस
ऑरेंज जूस में विटमिन सी बहुलता से होता ही है साथ ही में यह विटमिन डी की कमी को दूर करने में भी मदद करता है। पैक्ड जूस की जगह घर पर ही इस फ्रूट का जूस निकालें और रोज पिएं, इससे आपको फायदा होगा।पैक्ड जूस में रसायन मिश्रित होने से हानिकारक होता हैं।
गाय का दूध
गाय का दूध विटमिन डी का बहुत अच्छा स्त्रोत हैं  है। हेल्थ एक्सपर्ट्स की मानें तो लो फैट मिल्क की जगह लोगों को फुल क्रीम मिल्क पीना चाहिए जिसमें ज्यादा विटमिन डी और कैल्शियम होता है।आजकल शुद्ध दूध मिलना बहुत कठिन हैं। जहाँ तक हो शुद्ध दूध प्राप्त कर उपयोग करना चाहिए।
दही का करें सेवन
दूध से बनने वाला दही भी विटमिन डी अधिकता में  होता है। रोज-रोज अगर दही न खाया जा सके तो इसकी लस्सी या छाछ बनाई जा सकती है जो टेस्टी तो होगी ही साथ ही में दही के पूरे फायदे भी आपको मिलेंगे।
        सोया मिल्क में भी गाय के दूध की तरह विटमिन डी की भरपूर मात्रा होती है। इस दूध को चाहे तो आप यूं ही पी सकते हैं या फिर डॉक्टर की सलाह से इसमें ऐसा फ्लेवर पाउडर मिला सकते हैं जिसमें विटमिन डी हो।
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन


 स्टैटिन दवाओं के दुष्प्रभाव
--वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन
एलॉपथी दवा खाने से एक बीमारी समाप्त होती हैं तो कई उसके साइड इफेक्ट्स देखने मिलते हैं। इससे अब सामान्य जन मानसिक रूप से बचते हैं ,पर अन्य कोई विकल्प न होने से लेने को मजबूर होना पड़ता हैं।  
                    यदि आप कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने के लिए स्टैटिन दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो ये बातें आपको जरूर पता होनी चाहिए...
                  कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए आप जिन स्टैटिन दवाओं का उपयोग करते हैं, ये दवाएं आपके शरीर में उस पदार्थ की उपस्थिति को नियंत्रित करती हैं, जिसका उपयोग करके आपका शरीर कोलेस्ट्रॉल का निर्माण करता है। लेकिन कोलेस्ट्रॉल को कम करने के फायदे के साथ ही स्टैनिन दवाएं आपके शरीर पर और भी कई असर डालती हैं। यदि आप भी अपने बढ़ते कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने के लिए दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो आपको खुछ खास बातें जरूर पता होनी चाहिए...
                   स्टैनिन के लगातार उपयोग से आपके हार्ट की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इस कारण हार्ट डिजीज और हार्ट स्ट्रोक का खतरा बढ़ता है। हालांकि ये दवाएं काफी हद तक ब्लड क्लॉट्स को बनने से रोकटी   हैं और इन थक्कों के जमाव का रिस्क भी कम करती हैं। लेकिन लगातार इन दवाओं का सेवन बिना किसी डॉक्टर की सलाह के करना आपकी जान के लिए जोखिम खड़ा कर सकता है।
आपको बता दें कि कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करनेवाली दवाओं के साथ डॉक्टर्स अक्सर हार्ट को हेल्दी रखने की दवाएं भी प्रिस्क्राइव करते हैं। इसलिए पहली बात तो आपको यह समझ लेनी चाहिए कि इन दवाओं की सिर्फ उतनी ही मात्रा का सेवन आपको करना है, जितनी मात्रा आपके डॉक्टर ने आपको सजेस्ट की हो।
                 आपको स्टैटिन दवाओं का सेवन करना चाहिए या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल कितना है और आपके हार्ट की सेहत कैसी है। साथ ही आपकी ब्लड वेसल्स की स्थिति कैसी है। इसलिए आपको स्टैटिन दवाएं लिखने से पहले आपके डॉक्टर आपकी सेहत के कई दूसरे पहलुओं की जांच करते हैं और तभी इन दवाओं को लेने का सुझाव देते हैं।
                 ऐसे समझें कोलेस्ट्रॉल की स्थिति
               आमतौर पर लोगों को अपना टोटोल कोलेस्ट्रॉल लेवल 200 मिलीग्राम प्रतिडेसिलीटर (mg/dL)से नीचे रखना चाहिए। या फिर आप इसे 5.2 मिलीमोल्स प्रतिलीटर (mmol/L) में भी नाप सकते हैं।
                  -अगर बात एलडीएल यानी कि बैड कॉलेस्ट्रॉल की करें तो इसका स्तर 100 मिलीग्राम प्रतिडेसिलीटर से कम होना चाहिए। आप इसे 2.6 मिलीमोल्स प्रतिलीटर में नाप सकते हैं। लेकिन अगर आपके परिवार में हार्ट डिजीज की हिस्ट्री है तो आपके बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर 70 मिलीग्राम प्रतिडेसिलीटर (1.8 mmol/L) से ऊपर नहीं होना चाहिए।
                  आपको स्टैटिन लेने की सलाह देते समय आपके डॉक्टर कई बातों को ध्यान में रखते हैं। खासतौर पर जब वह आपको लंबे समय तक स्टैटिन लेने की सलाह दे रहे हों। क्योंकि यदि आपका हार्ट डिजीज का जोखिम बहुत कम है तो आपको संभवतः स्टैटिन की आवश्यकता नहीं होगी, जब तक कि आपका एलडीएल 190 मिलीग्राम प्रति डीएल (4.92 मिलीमोल प्रतिलीटर) से ऊपर न हो।
              स्टैटिन्स के साइड इफेक्ट्स
          -आमतौर पर स्टैटिन दवाएं ज्यादातर लोगों का शरीर स्वीकार कर लेता है। जिन लोगों में इसके हल्के-फुल्के साइड इफेक्ट्स होते हैं, उनका शरीर इन बदलावों को शुरुआती स्तर पर दिखाता है लेकिन फिर स्वीकार कर लेता है। यह स्थिति बहुत गंभीर नहीं है। लेकिन आपको अपने डॉक्टर से कोई भी बात छिपानी नहीं चाहिए। शाकाहारी लोग ऐसे बचें कोरोना वायरस से, इन फूड्स से मिलेगा Vitamin-D
             -इन दवाओं को शुरू करने के बाद यदि आपके शरीर में किसी भी तरह का बदलाव होता है जैसे आपको मितली आना, सिर में दर्द रहना, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द होना इत्यादि तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से बात करनी चाहिए।
                -ऐसा संभव है कि स्टैटिन शुरू करने के बाद आपका ब्लड शुगर लेवल बढ़ा हुआ रहने लगे, यह आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज की वजह भी बन सकता है।
               उच्च कोलेस्ट्रॉल के लिए 6 आयुर्वेदिक उपचार
             कोलेस्ट्रॉल एक प्रकार का फैटी एसिड होता है जो लीवर द्वारा उत्पादित होता है. शरीर कोलेस्ट्रॉल का उपयोग विभिन्न गतिविधियों को करने के लिए करता है जैसे कि हार्मोन, पित्त एसिड और विटामिन डी को संश्लेषित करना है. आयुर्वेद इसे स्नेहन के मामले में शरीर का एक महत्वपूर्ण घटक मानता है. कोलेस्ट्रॉल को संतुलित करने का आयुर्वेदिक दृष्टिकोण न केवल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को रोकने के लिए है बल्कि आहार को कड़ाई से नियंत्रित करने के लिए भी है ताकि कोलेस्ट्रॉल का स्राव कम किया जा सके. यहां कुछ आयुर्वेदिक टोपी-युक्तियां दी गई हैं जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने और शरीर के सामान्य शरीर के कार्य को बहाल करने में मदद कर सकती हैं:
             मेडिकागो सतीना: वह अल्फल्फा के रूप में जाने जाते हैं और धमनी से संबंधित बीमारियों से निपटने की उनकी क्षमता के लिए प्रसिद्ध हैं. वह कोलेस्ट्रॉल से घिरे धमनियों को साफ़ करने में सक्षम हैं. उन्हें पूरी तरह से या रस में मिलाकर रोजाना खाया जा सकता है.
              अर्जुन: अर्जुन अभी तक एक और शक्तिशाली आयुर्वेदिक जड़ी बूटी है जो दिल की बाधाओं, दिल के दौरे इत्यादि जैसे हृदय संबंधी स्थितियों से निपटने में शक्तिशाली शक्तिशाली है. अर्जुन पेड़ की छाल पाउडर के रूप में ली जा सकती है और खाया जा सकता है. उनके पास कोलेस्ट्रॉल को भंग करने और दिल की रोकथाम को रोकने की क्षमता है. यह गर्म पानी के साथ नाश्ते से पहले, सुबह में पहले उपभोग किया जाना चाहिए.
          धनिया: धनिया को सबसे अच्छा हर्बल मूत्रवर्धक एजेंट माना जाता है. यह किडनी को पुनर्जीवित कर सकता है और अपशिष्ट के विसर्जन के मामले में उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने में मदद करता है. इसलिए किडनी शरीर से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को फ्लश कर सकता है. धनिया को दैनिक आधार पर भोजन के साथ उपभोग किया जा सकता है.
          लहसुन: फिर से लहसुन मानव जाति के लिए सदियों से ज्ञात है और उच्च कोलेस्ट्रॉल से पीड़ित लोगों के लिए बेहद फायदेमंद है. दैनिक आधार पर लहसुन के दो लौंग रक्त में उच्च कोलेस्ट्रॉल के प्रभाव को पूरी तरह से बेअसर कर सकते हैं. धमनियों को मुक्त करने के अलावा लहसुन के कई अन्य स्वास्थ्य लाभ हैं.
             गुगुलु: यह जड़ी बूटी रक्त में उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल के इलाज के लिए आयुर्वेदिक चिकित्सकों के बीच लोकप्रिय जड़ी बूटियों में से एक है. उनमें गुगुलस्टेरोन होते हैं, जिन्हें रक्त में खराब कोलेस्ट्रॉल का सक्रिय अवरोधक माना जाता है. इस पदार्थ के 25 मिलीग्राम की खपत एक व्यक्ति को उच्च कोलेस्ट्रॉल से पूरी तरह से मुक्त कर सकती है. उन्हें किसी भी भोजन के बाद लिया जा सकता है.
           पवित्र तुलसी या तुलसी: पवित्र तुलसी एक और लोकप्रिय और पारंपरिक भारतीय केंद्र है जिसका उपयोग आयुर्वेदिक चिकित्सकों द्वारा रक्त प्रवाह में उच्च कोलेस्ट्रॉल का इलाज करने के लिए किया जाता है. वह किडनी के माध्यम से अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को खत्म कर सकते हैं. इसका उपयोग कई दवाओं की तैयारी के लिए किया जाता है. यह एक सिद्ध औषधीय जड़ी बूटी है जो रक्त में अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल से निपटने में बहुत ही कुशल है. उनके शरीर से कोलेस्ट्रॉल को विघटित करने की क्षमता है. तुलसी की 2-3 पत्तियों को दैनिक आधार पर उपभोग किया जा सकता है. यदि आप किसी विशिष्ट समस्या के बारे में चर्चा करना चाहते हैं, तो आप आयुर्वेद से परामर्श ले सकते हैं.
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन

शाकाहारी  ऐसे बचें कोरोना वायरस से
--वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल /पुणे
कोरोना वायरस  के कारण उन लोगों की स्थिति अधिक गंभीर बन रही  है, जिनके शरीर में विटमिन-डी की कमी पाई गई। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विटमिन-डी हमारी इम्यून सेल्स को ऐक्टिव करने और उनके उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।  शाकाहारी लोग किस तरह अपने खाने में विटमिन-डी की मात्रा बढ़ा सकते हैं...
आमतौर पर विटमिन-डी (Vitamin-D) की प्राप्ति एनिमल प्रॉडक्ट्स से ही होती है। यही कारण है कि ज्यादातर शाकाहारी लोगों में इस जरूरी विटमिन की कमी पाई जाती है। हमारे देश में महिलाओं में इसकी कमी का एक और बड़ा कारण है, उनका हर समय शरीर को ढके रहना। ऐसे में शाकाहारी लोग और महिलाएं इन फूड्स को अपनी डायट में शामिल कर शरीर में विटमिन-डी की कमी को पूरा कर सकते हैं...
              गर्मी के मौसम के अनुसार आपको हेल्दी रहने और विटमिन-डी प्राप्त करने के लिए क्या खाना चाहिए,
              -धूप, मशरूम, फोर्टिफाइड मिल्क, इंसटेंट ओटमील, विटमिन-डी टैबलेट्स, संतरे का जूस
              सबसे पहले धूप की बात
              -ज्यादातर लोगों को पता है कि सूरज की किरणें विटमिन-डी की प्राप्ति का प्राकृतिक माध्यम हैं। लेकिन आमतौर पर लोग धूप में पूरे शरीर को ढंककर बैठते हैं। इस कारण सूरज की किरणें त्वचा के अंदर पैनिट्रेट नहीं कर पातीं और सही मात्रा में विटमिन-डी नहीं मिल पाता।
              -सुबह की गुनगुनी धूप हमारे ब्रेन, हमारी आंखों और हमारी स्किन के लिए बहुत अधिक फायदेमंद होती है। लेकिन जरूरी नहीं कि हर मौसम में और हर दिन सुबह के समय ही विटमिन-डी मिले।
                     -लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि सूरज की रोशनी हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी है। क्योंकि यह अच्छी नींद लाने में हमारी मदद करती है। इससे शरीर में विटमिन-डी का अवशोषण भी सही तरीके से होता है।
                       मशरूम से मिलता है विटमिन-डी
                -गर्मी और बरसात के समय में मशरूम की सब्जी खाने से हमारे शरीर को जरूरी मात्रा में विटमिन-डी की प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं इसमें पोटैशियम, प्रोटीन और सेलेनियम भी होते हैं। यही वजह है कि मशरूम खाने से हमारी हड्डियां सेहतमंद रहती हैं।
                फोर्टिफाइड मिल्क
              गाय का दूध पीने से शरीर में विटमिन-डी की कमी भी पूरी हो जाती है। लेकिन यह बात पूरी तरह सही नहीं है। इसलिए जरूरी है कि आप विटमिन-डी फॉर्टिफाइड दूध पिएं। गाय का दूध में विटमिन-डी फोर्टिफाइड हो तो इसका लाभ कई गुना बढ़ जाता है।
             -गाय के दूध के अलावा मार्केट में विटमिन-डी फोर्टिफाइड सोया मिल्क भी आता है। सोया मिल्क खासतौर पर उन लोगों के लिए विटमिन-डी की प्राप्ति का अच्छा जरिया हो सकता है, जिन्हें लैक्टोस से एलर्जी है। यानी जिन्हें दूध पीने के बाद किसी भी तरह की दिक्कत होती है।
             विटमिन-डी टैबलेट्स
          मार्केट में विटमिन-डी की टैबलेट्स उपलब्ध हैं। अगर आप चाहकर भी अपने शरीर को विटमिन-डी उसकी जरूरत के अनुसार नहीं दे पा रहे हैं तो आप इन टैबलेट्स का सेवन कर सकते हैं।
               -विटमिन-डी की टैबलेट सप्ताह में एक बार और लगातार दो महीने तक लेनी होती है। ऐसा उन लोगों के लिए है, जिनके शरीर में इसकी बहुत अधिक कमी हो गई हो। बाकी आप अपनी जांच कराने के बाद या अपने डॉक्टर के परामर्श के हिसाब से इनका सेवन कर सकते हैं।
            इंस्टेंट ओटमील
हर चीज की तरह मार्केट में आपको ओटमील की भी कई वैरायटीज मिल जाएंगी। लेकिन अगर आप धूप और दूध के जरिए विटमिन-डी प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो इंस्टेंट ओटमील का सेवन करें। यह आपके शरीर को विटमिन-डी प्राप्त करने में मदद करेगा।
हालांकि इस बात का ध्यान रखें कि ओटमील से आपके शरीर को उतना विटमिन-डी नहीं मिल पाएगा, जितने की आपके शरीर को जरूरत होती है। लेकिन फिर भी इसके सेवन से आपके शरीर में विटमिन-डी की मात्रा बढ़ाने में मदद मिलेगी।
            संतरे का जूस
संतरा भी मशरूम की तरह ही विटमिन-डी की प्राप्ति का एक प्राकृतिक सोर्स है। लेकिन यह सर्दियों का फल है और हमें इस साल गर्मियों में इसकी जरूरत है। तो मार्केट में मिलनेवाले स्टोर्ड ऑरेंज का जूस आप पाइनऐपल और दूसरे मौसमी फलों के साथ मिलाकर तैयार कर सकते हैं।
इससे आपको बेमौसम फल खाने का नुकसान भी नहीं होगा और सीमित मात्रा में ही सही आप विटमिन-डी का कुछ अंश प्राप्त कर पाएंगे। इन फूट्स के साथ बेहतर होगा कि आप अपने डॉक्टर की सलाह से विटमिन-डी टैबलेट्स का भी सेवन करें। साथ ही जितना संभव हो सके स्किन को खुला रखकर 45 मिनट के लिए धूप में हर दिन बैठें।
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन

जैन तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव जी-कृषि कर्म  के जनक
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन
भारत को एक कृषि प्रधान देश माना जाता है। यहां पर प्राचीनकाल से ही खेती की जा रही है। सवाल यह उठता है कि भारत में कृषि करना कब से प्रारंभ हुआ और क्या रामायण एवं महाभारत काल में भी होते थे किसान या होती थी खेती-किसानी? क्या है इसके सबूत?
भारत में वैसे तो कृषि कार्य रामायण और महाभारत से भी पूर्व से किया जा रहा है। लोग खेत जोतते थे और उसमें अनाज, सब्जी आदि उगाते थे। कुछ लोग खेती के साथ ही गोपालन भी कहते थे और कुछ लोग सिर्फ गोपालन का ही कार्य करते थे। आज भी भारत के बहुत से त्योहार खेती और किसानी से ही जुड़े हुए हैं।
संसार की प्रथम पुस्तक ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में उल्लेख मिलता है कि अश्विन देवताओं ने राजा मनु को हल चलाना सिखाया। ऋग्वेद में एक स्थान पर अपाला ने अपने पिता अत्रि से खेतों की समृद्धि के लिए प्रार्थना की है।
अथर्ववेद के एक प्रसंग अनुसार सर्वप्रथम राजा पृथुवेन्य ने ही कृषि कार्य किया था। अथर्ववेद में 6,8 और 12 बैलों को हल में जोते जाने का वर्णन मिलता है।
यजुर्वेद में 5 प्रकार के चावल का मिलता है। यथाक्रम- महाब्राहि, कृष्णव्रीहि, शुक्लव्रीही, आशुधान्य और हायन। इससे यह सिद्ध होता है कि वैदिक काल में चावल की खेती भी होती थे।
राम की कई पीढ़ियों से पूर्व जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान ऋषभदेव ने कृषि, शिल्प, असि (सैन्य शक्ति), मसि (परिश्रम), वाणिज्य और विद्या- इन 6 आजीविका के साधनों की विशेष रूप से व्यवस्था की तथा देश व नगरों एवं वर्ण आदि का सुविभाजन किया था। इनके 2 पुत्र भरत और बाहुबली तथा 2 पुत्रियां ब्राह्मी और सुंदरी थीं जिन्हें उन्होंने समस्त कलाएं व विद्याएं सिखाईं। इसी कुल में आगे चलकर इक्ष्वाकु हुए और इक्ष्वाकु के कुल में भगवान राम हुए। ऋषभदेव की मानव मनोविज्ञान में गहरी रुचि थी। उन्होंने शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के साथ लोगों को श्रम करना सिखाया। इससे पूर्व लोग प्रकृति पर ही निर्भर थे। वृक्ष को ही अपने भोजन और अन्य सुविधाओं का साधन मानते थे और समूह में रहते थे। ऋषभदेव ने पहली दफा कृषि उपज को सिखाया। उन्होंने भाषा का सुव्यवस्थीकरण कर लिखने के उपकरण के साथ संख्याओं का आविष्कार किया। नगरों का निर्माण किया। ऋग्वेद में ऋषभदेव की चर्चा वृषभनाथ और कहीं-कहीं वातरशना मुनि के नाम से की गई है। शिव महापुराण में उन्हें शिव के 28 योगावतारों में गिना गया है।
रामायण काल में राजा जनक को एक खेत से हल चलाते वक्त ही भूमि से माता सीता मिली थी। इसी प्रकार महाभारत में बलरामजी को हलधर कहा जाता है। उनके कंधे पर हमेशा एक हल शस्त्र के रूप में विराजमान रहता था। इससे यह सिद्ध होता है कि उस काल में भी खेती होती थी।
सिंधु घाटी के लोग बहुत सभ्य थे। वे नगरों के निर्माण से लेकर जहाज आदि सभी कुछ बनाना जानते थे। सिंधु सभ्यता एक स्थापित सभ्यता थी। उक्त स्थलों से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि यहां के लोग दूर तक व्यापार करने जाते थे और यहां पर दूर-दूर के व्यापारी भी आते थे। आठ हजार वर्ष पूर्व सिंधु घाटी सभ्यता के लोग धर्म, ज्योतिष और विज्ञान की अच्छी समझ रखते थे। इस काल के लोग जहाज, रथ, बेलगाड़ी आदि यातायात के साधनों का अच्छे से उपयोग करना सीख गए थे। सिंधु सभ्यता के लोगों को ही आर्य द्रविड़ कहा जाता है। आर्य और द्रविड़ में किसी भी प्रकार का फर्क नहीं है यह डीएनए और पुरातात्विक शोध से सिद्ध हो चुका है। इस सभ्यता के लोग कृषि कार्य करने के साथ ही गोपालन और अन्य कई तरह के व्यापार करते थे। सिंधु घाटी की मूर्तियों में बैल की आकृतियों वाली मूर्ति को भगवान ऋषभनाथ जोड़कर इसलिए देखा जाता।
इससे सिद्ध होता हैं की भगवान ऋषभदेव के द्वारा कृषि कार्य की शुरुआत की थी। इसका आधार उनकी प्राचीनता हैं भी हैं और उनके पुत्र का नाम चक्रवर्ती भरत था ,जिनके नाम से हमारे देश का नाम भारतवर्ष रखा गया हैं।
वैद्य अरविन्द प्रेमचंद जैन


जंगल बचाने महाभारत में विदुर की बात सत्य निकली
महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया। इस युद्ध में कौरवों ने 11 अक्षौहिणी तथा पांडवों ने 7 अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर लड़ाई लड़ी थी। कुल अनुमानित 45 लाख की सेना के बीच महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला। महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे।
इस युद्ध से पूर्व महात्मा विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को एक उदाहरण देकर समझाया था कि यह युद्ध रोक लो अन्यथा दोनों पक्ष का विनाश हो जाएगा। परंतु धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह में विदुर की बात नहीं मानी। यदि वह बात मान लेते तो पांडवों सहित कौरव भी बच जाते। अर्थात जंगल भी बच जाते।
महात्मा विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं:-
न स्याद् वनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रा न स्युर्ऋते वनम् ।
वनं हि रक्षते व्याघ्रैर्व्याघ्रान् रक्षति काननम् ।।46।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागपर्व)
अर्थात  श्लोक में यह कहा गया कि बाघों के बिना वन का अस्तित्व संभव नहीं और न ही बिना वन के बाघ रह सकते हैं। वन की रक्षा तो बाघ करते हैं और बदले में वन उनकी रक्षा करते हैं। यह उदाहरण देकर महात्मा विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि अपने पुत्रों और पांडवों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहिए अन्यथा दोनों ही नष्ट हो जाएंगे।
 धार्तराष्ट्रा वनं राजन् व्याघ्रा पाण्डुसुता मताः ।
मा छिन्दि सव्याघ्रं मा व्याघ्रान् नीनशन् बनात् ।।45।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागपर्व)
अर्थात् आपके पुत्र (धृतराष्ट्र ) वन के समान हैं और पाण्डुपुत्र उनके सह-अस्तित्व में रह रहे बाघ हैं। बाघों समेत इन वनों को समाप्त मत करिए अथवा उन बाघों का अलग से विनाश मत करिए। वनों तथा बाघों की भांति दोनों पक्ष एक-दूसरे की रक्षा करें इसी में सभी का हित है।
युद्ध का परिणाम : सभी जानते हैं कि सारे कौरव अपने पुत्रों सहित मारे हो गए थे। इसके अलावा मात्र पांच गांव के खातिर लड़े गए इस युद्ध से आखिर में पांडवों को क्या हासिल हुआ? पांडव वंश में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी के उत्तरा के गर्भ में पल रहा उनका एक मात्र पुत्र बचा था जिसे श्रीकृष्ण ने बचाया था। इसका नाम परीक्षित था। पांडव युद्ध जीतने के बाद भी हार ही गए थे क्योंकि फिर उनके पास कुछ भी नहीं बचा था। प्रत्येक पांडव के 10-10 पुत्र थे लेकिन सभी मारे गए। द्रौपदी के भी पांचों पुत्र मारे गए थे।
गांधारी, कुंती, धृतराष्‍ट्र, विदुर, संजय आदि सभी जंगल चले गए थे। जंगल में धृतराष्‍ट्र और गांधारी एक आग में जलने से मर गए। ऐसी लाखों महिलाएं विधवा हो गई थी जिनके पतियों ने युद्ध में भाग लिया था। उनमें कर्ण, दुर्योधन सहित सभी कौरवों की पत्नियां भी थीं।
अंत: में युद्ध के बाद युधिष्ठिर संपूर्ण भारत वर्ष के राजा तो बन गए लेकिन सब कुछ खोकर। किसी भी पांडव में राजपाट करने की इच्छा नहीं रही थी। सभी को वैराग्य प्राप्त हो गया था। यह देखते हुए युधिष्ठिर ने राजा का सिंहासन अर्जुन के पौत्र परीक्षित को सौंपा और खुद चल पड़े हिमालय की ओर, जीवन की अंतिम यात्रा पर। उनके साथ चले उनके चारों भाई और द्रौपदी आदि। वहीं सभी का अंत हो गया था।
श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और कुछ यादव महाभारत के युद्ध में और बाद में गांधारी के शाप के चलते आपसी मौसुल युद्ध में श्रीकृष्ण के कुल का नाश हो गया था। मौसुल युद्ध में श्रीकृष्‍ण के सभी पुत्र और पौत्र मारे गए थे। कुल में जो महिलाएं और बच्चे बचे थे, उन्हें अर्जुन अपने साथ लेकर मथुरा जा रहे थे तो रास्ते में वे बचे हुए लोग भी लुटेरों के द्वारा मारे गए। श्रीकृष्ण के कुल का एकमात्र व्यक्ति जिंदा बचा था जिसका नाम था वज्रनाभ।
आज हम बाघों को बचाने की बात करते हैं ताकि हमारे वन सुरक्षित रह सकें परंतु हमारे देश के वन क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं और इसके साथ ही वन के पशु पक्षी आदि सभी भी लुप्त होते जा रहे हैं। एक दिन धरती पर मानव ही बचेगा इसकी कोई गारंटी नहीं। PLC.

Comments

CAPTCHA code

Users Comment