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Saturday, December 4th, 2021

कांग्रेस में नेहरू गांधी परिवार का कोई विकल्प नहीं

- तनवीर जाफ़री - 
स्वतंत्र भारत में जिन साम्प्रदायिक व विघटनवादी शक्तियों को कांग्रेस ने लगभग पचास वर्षों तक सत्ता के क़रीब आने का अवसर नहीं दिया वह भले ही कांग्रेस-मुक्त भारत की अवधारणा अपने दिल में लिये बैठे हों परन्तु हक़ीक़त तो यही है कि समयानुसार कांग्रेस पार्टी भी नए कलेवर,नए तेवर व नए नेतृत्व के साथ उभरती नज़र आ रही है। निश्चित रूप से इसी दौरान कांग्रेस कुछ ऐसे स्वार्थी नेताओं की वजह से आंतरिक उथल पुथल के दौर से भी गुज़र रही है जो सत्ता के भूखे होने के साथ साथ सिद्धांत व विचार विहीन भी हैं। परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि कांग्रेस इन चंद सत्ता लोभियों के पार्टी छोड़ने से समाप्त हो जायेगी। ब्रह्मानंद रेड्डी,देवराज अर्स जैसे कई विभाजन देखने व अनेकानेक दिग्गज नेताओं के किसी न किसी कारणवश पार्टी छोड़ने के बावजूद आज भी पार्टी देश के सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में क़ायम है। और इसका श्रेय सिर्फ़ और सिर्फ़ नेहरू-गाँधी परिवार को ही जाता है। 2014 में कांग्रेस कैसे सत्ता से बाहर हुई, कैसे पचास वर्षों तक दर्जनों हिंदूवादी संगठनों द्वारा हिंदुत्ववाद के विस्तार व धर्म-जागरण के नाम पर देश में साम्प्रदायिकता का प्रचार प्रसार कर,देश में ध्रुवीकरण की राजनीति कर तथा झूठ के रथ पर सवार होकर अन्ना आंदोलन के कंधे पर बैठकर, सत्ता हासिल की गयी यह पूरा देश देख रहा है।
                                                                  इन परिस्थितियों में कांग्रेस नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहिए,अपने नेतृत्व पर विश्वास रखना चाहिये,संगठन का विस्तार करना चाहिए और देश को साम्प्रदायिक ताक़तों के चंगुल से मुक्त कराने के लिये समान विचार वाले संगठनों  व नेताओं से तालमेल बनाना चाहिये। बजाये इसके कई राज्यों में सत्ता संघर्ष छिड़ा दिखाई दे रहा है। अनेक सिद्धांत व विचार विहीन तथाकथित कांग्रेसी नेता सत्ता की लालच में उसी दल में जा पहुंचे हैं  जहां से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया गया है। ऐसे तमाम दलबदलुओं को कुछ न कुछ 'लॉलीपॉप' दिया भी जा चुका है। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से पार्टी में ही कुछ ऐसे नेता अभी भी असंतुष्ट दिखाई दे रहे हैं जिनका अपना न तो कोई जनाधार है और सही मायने में तो ऐसे ही नेता पार्टी को कमज़ोर करने के ज़िम्मेदार भी हैं। इन 'असंतुष्टों' में कोई एक भी ऐसा नेता नहीं जो वर्तमान सरकार और उसकी जनविरोधी नीतियों का पूरी ताक़त के साथ विरोध करता दिखाई दे रहा हो। केवल नेहरू-गाँधी परिवार विशेषकर राहुल गांधी व प्रियंका गाँधी ही हैं जो हर उस जगह पहुँचती दिखाई दे रही हैं जहाँ लोग दुःख-पीड़ा या सरकार के दमनात्मक रवैय्ये से दुखी व परेशान हैं। सत्ता को उसके चुनावी वादों की याद भी केवल राहुल व प्रियंका गाँधी करवा रहे हैं।
                                                                  बड़े आश्चर्य की बात है कि इन बातों का आंकलन वामपंथी युवा नेता कन्हैया कुमार व जिग्नेश मिवानी जैसे युवा नेता तो कर रहे हैं परन्तु कांग्रेस में रहने वाले नेता इस बात को या तो समझ नहीं पा रहे या समझना नहीं चाह रहे। वामपंथी परिवेश में पला बढ़ा एक युवा नेता तो  महसूस कर रहा है कि संविधान,लोकतंत्र तथा देश की रक्षा के लिये तथा गाँधी,अंबेडकर व भगत सिंह के सपनों के भारत के निर्माण के लिये कांग्रेस का शक्तिशाली होना ज़रूरी है परन्तु कांग्रेस में पले-बढ़े व सवार्थवश पार्टी में आयातित कुछ कांग्रेस नेताओं को उनका अहंकार,स्वार्थ,दंभ व अहम ही खाये जा रहा है। कांग्रेस के कमज़ोर होने के बावजूद जो लोग राहुल गाँधी के एक आक्रामक विपक्षी नेता के तेवरों से प्रभावित होकर तथा यह जानकर कि सत्ता की ऐश परस्ती व सुविधाओं से अभी कांग्रेस काफ़ी दूर है,उसके बावजूद कांग्रेस का दामन थाम रहे हैं वे कांग्रेस के हितैषी हैं या वह लोग जो दशकों तक सत्ता की मलाई खाने के बावजूद कांग्रेस के मात्र सात वर्षों के केंद्रीय सत्ता से बाहर रहने से घबरा कर अपनी सुविधानुसार उस दल में जा रहे हैं या जाने की फ़िराक़ में हैं जो सैद्धांतिक व वैचारिक रूप से कांग्रेस विरोधी है ?
                                                                रहा सवाल कांग्रेस में 'जी हुज़ूरी ' व ख़ुशामद परस्ती संस्कृति का तो यह विडंबना हमारे देश के सभी राजनैतिक दलों,संस्थाओं व संस्थानों की है। इसी संस्कृति को पहचानकर व इसका लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने हम पर हुकूमत की। सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का साहस हर एक व्यक्ति नहीं कर पाता। वर्तमान सत्ता के शीर्ष को ही देख लीजिये। पूरे मंत्रिमंडल से लेकर प्रशासन तक तथा बड़े बड़े मीडिया घराने तक एक ही व्यक्ति के समक्ष 'जी हुज़ूरी ' या ख़ुशामद परस्ती ही नहीं बल्कि 'साष्टांग दंडवत ' की मुद्रा में हैं। हमारे यहाँ तो पल भर में नेताओं को देवी-देवताओं का रूप तक दे दिया जाता है। उनके मंदिर तक बना दिये जाते हैं। इस मानसिक प्रवृति पर शीघ्र क़ाबू नहीं पाया जा सकता। निश्चित रूप से इस चाटुकार संस्कृति ने कांग्रेस को भी नुक़सान पहुँचाया है।
                                                                याद कीजिये 1987 में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुद्ध कांग्रेस ने इलाहबाद उपचुनाव में सुनील शास्त्री जैसे कमज़ोर उम्मीदवार को प्रत्याशी बनाया था उस समय पार्टी की 'वर्तमान असंतुष्ट लॉबी' के इन्हीं नेताओं ने सुनील शास्त्री को प्रत्याशी बनाने की सलाह राजीव गाँधी को दी थी। अन्यथा यदि इलाहाबाद की जनता व पार्टी कार्यकर्ताओं की मांग पर अमिताभ बच्चन को ही विश्वनाथ प्रताप सिंह की कथित बोफ़ोर्स रिश्वत कांड के झूठे आरोपों की चुनौती स्वीकार करने के लिये उपचुनाव में उतारा गया होता तो कांग्रेस को आज यह दिन न देखने पड़ते। बड़ा आश्चर्य है कि नेहरू-गाँधी के चित्र व उनके नाम की बैसाखी के सहारे जिन लोगों ने विधायक,सांसद,मंत्री व मुख्यमंत्री पदों तक का सफ़र तय किया वही लोग आज सिर्फ़ इसलिये इस परिवार व इनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि पार्टी सत्ता से दूर है ?
                                                                 कश्मीर से कन्याकुमारी तक कोई ऐसा कांग्रेस नेता नहीं जो अपने चुनाव क्षेत्र में नेहरू-गाँधी परिवार के सदस्यों के चित्र अपने चुनावी बैनर्स व पोस्टर्स में छपवाये बिना चुनाव लड़ता हो। इस परिवार ने स्वतंत्र संग्राम के समय व स्वतंत्र भारत में भी देश के लिये जो खोया है उसका मुक़ाबला कोई भी कांग्रेस नेता या उसका घराना नहीं कर सकता। आज भी देश के किसी भी राज्य में शहर से गांवों तक में जो आकर्षण इस परिवार के नेताओं के प्रति है वह किसी नेता में नहीं। अपनी सुविधापूर्ण ज़िन्दिगी को त्याग कर पार्टी को मज़बूत करने के लिये राहुल व प्रियंका गाँधी द्वारा जितनी मेहनत व मशक़्क़त की जा रही है वह देश देख रहा है। देश को यदि कांग्रेस से कोई उम्मीद दिखाई दे रही है तो वह राहुल व प्रियंका के युवा नेतृत्व में ही नज़र आ रही है। कहना ग़लत नहीं होगा कि कांग्रेस में नेहरू गाँधी परिवार का कोई विकल्प मौजूद नहीं है।
 
About the Author 
Tanveer Jafri
Columnist and Author
Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
He is a devoted social  activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.
Contact – : Email – tjafri1@gmail.com –
Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC NEWS.
 

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इंसान , says on October 25, 2021, 11:45 PM

हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कांग्रेस-मुक्त की जगह कांग्रेस संस्कृति-मुक्त भारत के वक्तव्य ने मानों मृत्यु शय्या पर पड़ी इंडियन नेशनल कांग्रेस को जीवन-दान दे दिया है और इस कारण लोकतंत्र में राष्ट्र और राष्ट्रवासियों की भलाई हेतु मैं वरिष्ठ G-23 को नेहरु गाँधी परिवार का विकल्प देखना चाहूँगा| बता दूं कि १८८५ में जन्मी इंडियन नेशनल कांग्रेस द्वारा इस लम्बी अवधि में अब तक दल से जुड़े किन्हीं राष्ट्रवादी तत्वों को आवश्यकता व अवसरानुसार केंचुली की भांति अलग करते नेहरु-कांग्रेस ने सदैव अंग्रेजों के प्रतिनिधि कार्यवाहक स्वरूप काम किया है| वरिष्ठ G-23 के लिए अति आवश्यक है कि वे पहले नेहरु गाँधी परिवार का बहिष्कार करते हुए नेहरु-कांग्रेस द्वारा रचाई संस्कृति से स्वयं मुक्त हो जाएं और जनसमुदाय में लोकप्रिय अपने नए अवतार में इंडिया अथवा इंडियन शब्द का उपयोग न करें क्योंकि उनसे केंद्र में युगपुरुष मोदी के नेतृत्व के अंतर्गत स्थापित राष्ट्रीय शासन एवं अन्य राजनीतिक दलों के साथ सहयोग में इंडिया का नाम बदल भारत अथवा भारतवर्ष कहलाए जाने की अपेक्षा बनी रहेगी|