पंचायत चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अब 3 जनवरी को सुनवाई होगी. आरक्षण और रोटेशन से शुरू हुई पंचायत चुनाव की लड़ाई ओबीसी आरक्षण तक पहुंची और सरकार के गले की फांस बन गई. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर प्रदेश की ओबीसी सीटों को सामान्य किया जाना था, लेकिन सरकार ने बिना ओबीसी आरक्षण  के पंचायत चुनाव न कराने का संकल्प विधानसभा में ले लिया.गौरतलब है कि प्रदेश का बड़ा ओबीसी वर्ग सरकार की तरफ उम्मीदों से भरी निगाहों से देख रहा है. सरकार ने भले ही ओबीसी वर्ग को आरक्षण से वंचित नहीं किया हो, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने पंचायत चुनाव से जुड़े 70 हजार ओबीसी वर्ग के प्रत्याशियों के लिए परेशानी खड़ी कर दी है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रदेश में सियासी उठापटक का दौर चलने लगा. विधानसभा के शीतकालीन सत्र में सरकार ने संकल्प पारित कर अपना रुख स्पष्ट किया.

इस मामले पर कांग्रेस भी बीजेपी के साथ
चूंकि, मसला ओबीसी का था इसलिए कांग्रेस भी भाजपा के साथ कदमताल करती हुई देखी गई. विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रदेश में पंचायत चुनाव में ओबीसी वर्ग को आरक्षण तभी मिलेगा, जब अन्य पिछड़ा वर्ग के राजनीतिक पिछड़ेपन को तय किया जाए और जातियां अधिसूचित हों. संवैधानिक बेंच के ट्रिपल टेस्ट के न्याय दृष्टांत के अनुसार फिलहाल प्रदेश में सरकार ने ऐसा कोई सर्वे नहीं कराया है.

ओबीसी को राहत दे सकत है सरकार- तंखा
दूसरी ओर, तय समय के चलते निर्वाचन आयोग को भी चुनाव संपन्न कराने हैं. बार-बार पत्र लिखने के बाद भी सरकार ने अभी तक ओबीसी की सीटों को सामान्य रूप से अनुसूचित नहीं किया है. सरकार ने पत्र लिखकर निर्वाचन आयोग से आग्रह किया है कि सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई रिकॉल एप्लीकेशन की सुनवाई का इंतजार किया जाए. वहीं कांग्रेस अब सरकार से पूरी तैयारी कर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखने की बात कह रही है. वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तंखा का कहना है कि सरकार अगर चाहे तो अपनी बात सुप्रीम कोर्ट में रखकर ओबीसी की बड़ी आबादी को राहत दिला सकती है. कांग्रेस ने तो 1994 से ओबीसी वर्ग को 25 फीसदी आरक्षण पंचायत में दे रखा है, आखिर भाजपा इसे क्यों नहीं बचा पाई यह बड़ा सवाल है. PLC

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