शिव कुमार झा टिल्लू की कविताएँ

1. कर्मवाद

मेरी अपनी कविता ने एक बार
पढ़ाया मुझे पाठ
कर्मवाद का
भावों के सहारे नहीं चलती
यह बहुरंगी दुनिया
बहुआयामी जीवन में
है निहायत जरूरी
भौतिक साध्य
जीने के लिए ही नहीं
वरन जन्म से मरण तक
क्योंकि रसायन छद्म परिवर्ती
इसलिए तो कहता हूँ
बनो भाव शिल्पी मगर
डालो नज़र
सिर्फ एक बार
इस जहान पर
शांत करने हेतु
अपनी पिपासा को
चिरकालिक भुभुक्षा को ..
होती है जरुरत
विविध   संसाधनो की
तब शायद जाओगे भूल मुझे ..
मगर ! उन सृजन के उस कंटक पथ पर
मैं आउंगीं नज़र
यह तो बस परखने की है चीज
क्योंकि मैं नहीं देती शिक्षा
पलायनवाद का
आवश्यकताओं के संयोजन से ही
होती है अनुसंधान ..
इस खलक के हर अलख में
छिपी है काव्य
तलाशो संभावनाओं को
असाध्य जीवन संक्रमण
पर होगा तुम्हारा नियंत्रण
भव्य बनो कर्म का
भाव स्वतः आएगी
तुम्हारे कण -कण में
फलेगी शिल्प -साधना
दशोमुखी जीवन में
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2. प्रतीक्षा

स्वर्णरेखा द्रुतगामी के प्रांजल डब्बे में
हो रही थी बातें !
आने वाले दिनों की
कमलिनी संभावना
कोई बोल रहा था
अच्छे दिन आयेंगें
अवश्य आयेंगें
है विश्वास उस सरल व्यक्तित्व पर
जिसने कहा था
जनतंत्र के महापर्व में
विविध मंचों से …
अरे भाई , है कोई ?
जादू की छड़ी उसके हाथ !
लेकिन आयेंगें अवश्य भारत में
अच्छे दिन …
मैं अपनी सीट पर दुबका हुआ
कर रहा था
असहज महसूस
कोयलांचल की राजधानी से
ब्रह्मकाल में उठकर
टाटा नगरी की यात्रा
ऊपर से देररात तक का जगा हुआ
लेकिन करता क्या ?
उन नेताओं की संख्या थी ज्यादा
लगभग सारे लोग !
जनता नहीं नेतागण
अच्छे दिनों की
उमंग में थे मतंग
मैं गुमसुम
कर रहा था -” प्रतीक्षा ”
किसी वासुदेव की
द्रौपदी के समान
जो बचाये मेरी लाज
करे शांत इन राष्ट्र चाटुकारों को
तत्क्षण भंग हुआ
मौनव्रत ! एक अधेड़ का
जो अपने बालक के साथ
फटेहाल बैठा था एकांत
दीनहीन परन्तु विद्वत
समय का मारा ..
चिल्ला उठा ” ख़ाक आयेंगें अच्छे दिन ”
करते रहो “प्रतीक्षा ” !
कोई नहीं बदल सकती किस्मत
हम लाचारों की …
अपने तर्कों से कर दिया सबको
अचंभित और मूक
क्योंकि नहीं था वह
कोई स्वार्थी नेता …..
गूँज रही है अभी भी
मेरे कानो में …
उसकी अंतिम काव्यात्मक छंद …
“साधनहीन के आँगन बाड़ी
कभी नहीं गूंजे किलकारी
आर्यावर्त की एक ही बीमारी
जनजन बन बैठा व्यापारी
ईमान- धर्म पर चोरी भारी
आशा में बैठी दुखिया बेचारी
जड़-चेतन की कालाबाजारी
वाकदेवी सब सहती लाचारी
मासांत में तंत्रक भरमाते हैं
दिवास्वप्न ही दिखलाते हैं
जहाँ बहुतेरे उल्लूओं का मेला
क्या लय छेड़े कोयल अकेला
सब चुप थे …..
नहीं था किसी के पास जबाब
उस बेचारे के सवालों का !
कहीं उन्हें भी हो गया हो
डर-शंका वा संदेह
फिर से ठगे जाने का
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3. कल आज और कल

बीता हुआ कल था एक सपना
दुखदायी हो या हो सुनहरा
आज की सोच ! यही तो है अपना
आनेवाला कल ..मात्र एक कल्पना
सुनते सुनते मन ऊब गया
खोये कल में डूब गया
कैसे भूल सकता हूँ मैं ?
उन अंतर -अर्बुद पीड़ा को
अर्णव तरंग की तरह आई
सुखद अनुभूतियों को भी
याद रखा है मैंने ..
जिसने स्नेह दिया उसे भूलकर
क्या ..वफ़ा का अपमान करूँ ?
जिसने लिया आत्मा को खंगाल
खींचा दारुण संवदेना का खाल
क्या उन्हें भूलकर
कर दूँ घ्राणशक्ति का अपमान
श्वान का घ्राणशक्ति नहीं
यह है एक मानव द्वारा
व्यथा दिए दानव और स्नेहिल मानव
को परखने का तादात्म्य !
विश्वास में जहाँ खाया था
एक बार … ठोकर
क्या उसी राह में वापस जाऊं
फिर उसी दर पर भटककर
बेदर्दी से ठोकर खाऊँ.. ?
अरे तब भूलूँ कैसे ..
तब क्यों कहते हो यह
बढ़ता ही है ठोकर से ज्ञान
होती सत्यकर्म संज्ञान …..
भूतकाल को भूलने
अब तो नहीं कहोगे ना….
क्या है ,आज वर्त्तमान कैसा ?
सोचोगे जैसा पाओगे वैसा
क्षण में ही पलट जाती है दुनियाँ
सारे रंग हो जाते बेरंग..
किसी को दे देती सप्तरंगी आयाम
नव जीवन का विहान
जैसे हुआ हो तत्क्षण पावस का अवसान
चहक उठी है यौवन
इंद्रधनुषी आकाश की तरह
मेघ की घनघोर छटा से उन्मुक्त
शीतल शीतल पवन विहंगम
रवि अर्चिस का मादक संगम ..
लिटा देती है किसी नवयौवन को
अकाल ! सफ़ेद लिवाश में
ओह ! उसकी नवल सहधर्मिता
पल भर पहले थी सबला
सूर्य चढ़ते ही हो गयी अवला
चूड़ी बचने वाले को कल ही तो
हँसकर कहा था उसने
आज आने के लिए
क्योंकि उसके उबडुब यौवन रथ के
सारथी जो आने वाले थे
निरीह व्यापारी चूड़ीवाला आया भी
लेकिन उस अभागिन के दर से
फूटी बिखरी चूड़ियाँ ले गया ..
साजन नहीं उनका आया मृत तन
अरे समय की गति का
गणन करने वाले शिल्पकारों !
यही है वर्तमान
जिसकी परिभाषा गढ़ते गढ़ते
दर्शन का हो जाएगा मर्दन ..
भविष्य तो भविष्य है..
उसे जब नहीं परख पाया बनाने वाले ने
हम तुम ख़ाक चिंतन करोगे उसपर
ख़ाक छानते रह जाओगे ..
सोचते -सोचते पछताओगे ..
एक ही उपाय है
देखो सभ कुछ जो सकते हो देख ..
चिंतन करो चिंता नहीं
नहीं तो जल जाएगी चिता सोचने से पहले .
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4. कातिल सपना

एक सबला रूपसी ने मन झकझोड़ा
क्षण स्नेह गात लगाकर हिय को तोड़ा
तब नहीं लगी वह  कोई प्रीति पराई
मुझे मदहोश अदाओं से खूब रिझाई
पल  में सहला जैसे हो  उर्वशी  चबाई  !
मैंने नेह गेह पट जड़ दिया था ताला
मन में मंजुल रम्भा पर हाथ में माला
बाह्य वैरागी रूप  हठात समझकर
उगलाई सबकुछ “प्रेयस”  कहकर
निश्शंक सुधि -वुधि अंगार कर दिया
मेरे शून्य आत्मा   में प्यार भर दिया
बाँक जड़ों से निकली  अब गोल वितान
कलुष  कूप में पसरा नवल विहान
भरे निदाध  में शीतल बूँद बरसाई
सूखे पत्तों में हरित प्रसून भर आई
एकाएक अब वह हो गयी है ओझल
खिलने से पहले विखर गई कोंपल
अमानत वही पुरातन पथ अपना
प्रेयसी नहीं वह तो थी ” कातिल सपना  ”
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shiv-kumar-jha-ki-kavitaenSHIV-KUMAR-JHAपरिचय -:

शिव कुमार झा टिल्लू
कवि ,आलोचक ,लेखक

शिक्षा : स्नातक प्रतिष्ठा,: स्नातकोत्तर , सूचना- प्राद्यौगिकी साहित्यिक परिचय : पूर्व सहायक संपादक विदेह मैथिली पत्रिका (अवैतनिक )

सम्प्रति – : कार्यकारी संपादक , अप्पन मिथिला ( मुंबई से प्रकाशित मैथिली मासिक पत्रिका ) में अवैतनिक कार्यकारी संपादक साहित्यिक

उपलब्धियाँ : प्रकाशित कृति १ अंशु : मैथिली समालोचना ( 2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली २ क्षणप्रभा : मैथिली काव्य संकलन (2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली )इसके अतिरिक्त कवितायें , क्षणिकाएँ , कथा , लघु-कथा आदि विविध पत्र -पत्रिका में प्रकाशित

सम्प्रति :जमशेदपुर में टाटा मोटर्स की अधिशासी संस्था जे एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड में महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत

संपर्क -: जे. एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड ,मैन रोड बिस्टुपुर  ,जमशेदपुर : ८३१००१ संपर्क – : ०९२०४०५८४०३, मेल : shiva.kariyan@gmail.com

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