Friday, May 29th, 2020

Satire - जाहिद शराब पीने दे......

जाहिद शराब पीने दे...... "ग़ालिब:- जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर, या वो जगह बता जहाँ पर खुदा नहीं.. इकबाल:- मस्जिद खुदा का घर है पीने की जगह नहीं, काफ़िर के दिल में जा वहां खुदा नहीं.. फ़राज़:- काफ़िर के दिल से आया हूँ मैं ये देखकर, खुदा मौजूद है वहां उसको पता नहीं......।।’’

- भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी -

जी हाँ ठीक ही तो कहा गया है। जब मस्जिद में माँस बिक्री की जाती है- बकरे एवं अन्य जानवर काटे जाते हैं, तब शराब क्यों नहीं पी जा सकती......? आप कहेंगे कि इस्लाम में वर्जित है। मैं तर्क-कुतर्क न करके सीधा आप की बात मान लूँगा। मदिरा- सोमरस जिसका पान देवराज इन्द्र के दरबार में किया जाता है वहाँ माँस भक्षण का कोई जिक्र नहीं मिलता। राजा लोग शिकार करते थे- जीव हत्या करते थे, जंगली जानवरों की खास व सींगों को अपने ड्राइंगरूम में सजाते थे- वे मदिरा-पान भी करते थे। (शायद ऐसा रहा हो)

चाहे जिस जाति/धर्म का राजा रहा हो कुछ ऐसा ही करता रहा ऐसा इतिहास पढ़ने पर ता चलता है। आखेट करना उस राजा का शौक हुआ करता था। जीव हत्या का अपराध उसे नहीं मिलता था, क्योंकि वह स्वयं एक राजा हुआ करता था। वर्तमान समय में तो वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लग जाता और राजा को कानून दण्ड देता, परन्तु ऐसा न होकर उन मारे गए जीव-जन्तुओं के परिजनों की आहें लगा करती थी। जिससे राजा को फल मिलता था। उदाहरण के तौर पर- किवदन्ती के अनुसार अयोध्या के राजा दशरथ शिकार करने गए थे, उन्हें शब्दबेधी बाण चलाने का अभ्यास था, उन्होंने हिरन के भ्रम में मातृ-पितृ भक्त श्रवण कुमार की हत्याकर दिया था। श्रवण के माता-पिता जो अन्धे थे, ने उन्हें श्राप दिया था जिसके परिणाम स्वरूप भगवान राम के वनगमन के समय वह पुत्र शोक में मृत्यु को प्राप्त हुए थे।

विषयान्तर करना जरूरी है। वह यह कि एफ.बी. एवं अन्य सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने राम को भगवान मानने से इंकार कर दिया है उनका कहना है कि वे एक मर्यादा पुरूषोत्तम थे। उन लोगों का कहना है कि मानव पुरूष का मन्दिर नहीं बनता है भगवान का मन्दिर निर्माण कराया जाता है। आस्था की बात है- अभी कुछ दिन पूर्व ही पता चला कि कोलकाता में मेगा स्टार/बिग बी अमिताभ बच्चन का मन्दिर निर्मित हुआ है, जहाँ उनके चाहने वाले उस मन्दिर में जाकर उनकी मूर्ति की पूजा करते हैं। मैं मन्दिर-मस्जिद को मुद्दा नहीं बना रहा, बस प्रसंगवश लिख रहा हूँ। देश के लोकतन्त्र में महामानवों की मूर्तियों की स्थापना हुई और अन्धभक्तों को कहा गया कि वह लोग इन्हीं की पूजा करें। लोगों ने इसे सहर्ष स्वीकारा भी, जो अब भी बदस्तूर है। फेसबुक/सोशल मीडिया पर बहस करने वालों से प्रश्न तो किया ही जा सकता है कि जिस वर्ग द्वारा इस तरह की पूजा की जाती है क्या यह गैर वाजिब है। आस्था, श्रद्धा की बात है इसे रोका नहीं जा सकता है।

भारत संविधान निर्माता की मूर्तियाँ अनेकों जगह स्थापित की गई हैं। जाहिर सी बात है कि इन मूर्तियों पर फूल-माला तो चढ़ेगा ही। अब यह तो कहने का साहस नहीं है कि ये मूर्तियाँ मानवों की हैं। मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम यदि मानव थे और सैकड़ो/हजारों वर्षों से उनकी पूजा-अर्चना की जा रही है तब उनका मन्दिर निर्माण कराया जाना क्या गलत है? बहरहाल- मैं उस देश का वासी हूँ जहाँ पेड़-पौधों से लेकर जीव-जन्तुओं की पूजा की जाती है। गंगा जैसी नदी को माँ कहा जाता है और हिमालय पर्वत को पिता कहकर हम नदी और पाषाण की पूजा करते चले आ रहे हैं। आने वाले समय में ये सभी महामानव भगवान की श्रेणी में आ जाएँगे। एक बड़ा वर्ग मूर्ति पूजा करता है, देवी- देवताओं के मन्दिर बनवाता है क्या गलत करता है? कहते हैं कि जब देश अंग्रेजों की दासता में जकड़ा था तब अंग्रेज हमारे देश के लोगों में फूट डालने और राज करने की नीति अपनाए हुए सैकड़ो वर्ष तक सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत को हर तरह से लूटा और ग्रेट ब्रिटेन की तिजोरियाँ भरी गईं। क्रिकेट का भगवान भी इसी देश में है वह ‘भारत-रत्न’ है प्रबल सम्भावना है कि कालान्तर में उसके भी मन्दिर बनेंगे और मूर्ति स्थापित की जाएगी।

भगवान राम का मन्दिर विवाद का मूल है लेकिन डॉ. अम्बेडकर, अमिताभ बच्चन, सचिन तेन्दुलकर जैसे महामानवों के लिए अभी यह नहीं कहा जा सकता कि ये देश में विवाद के कारण हैं। शराब-शराबखानों और शाकी से बात शुरू हुई तो कितनी बार विषयान्तर हुआ इसकी गणना करना कोई आवश्यक नहीं। माहौल गर्माया हुआ है- उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक-एक नहीं अनेकों घटनाएँ ऐसी हो रही हैं जिन पर सोचना और मंथन करना पढ़े-लिखे लोगोंा की दिनचर्या बन गई है। कुछ दिन पूर्व बसपा के कद्दावर लीडर नसीमुद्दीन सिद्दीकी साहेब को पार्टी से निकालकर बसपा सुप्रीमों मायावती ने मुस्लिम वोट की परवाह न करके उन पर तरह-तरह के इल्जमात भी लगाए। दोनों दिग्गजों में बहस भी खूब चली- उसके बाद--- खबरों से पता चला कि सी.एम. योगी सरकार ने मायावती के शासनकाल में बनवाए गए स्मारकों की साफ-सफाई/रख-रखाव के लिए 10 करोड़ आवण्टित कर दिया है। सपा नेता शिवपाल सिंह यादव को भी जेड श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई। यह सब खबरें काफी होती हैं। सोशल मीडिया पर समर्पित, वफादार कार्यकर्ताओं द्वारा अजीब तरह की टिप्पणियाँ अपलोड की जाती हैं बहसबाजी शुरू हो जाती है।

मैं तो शुरू हुआ था- शाकी और शराब व उसके सेवन के लिए उपयुक्त स्थान को लेकर परन्तु पता नहीं कलम फिसलती गई- मैं लिखता गया- क्या-क्या लिख डाला आप पाठकों से बेहतर कौन बता सकता है। मैं क्षत्रिय हूँ, भारतवर्ष का हर निवासी क्षत्रिय है ऐसा प्रायः प्रसंग आता रहता है। हिन्दू-मुस्लिमकी बात नही कर रहा लेकिन ब्राम्हण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र (मनुवादी व्यवस्था) में सभी क्षत्रिय ही हैं। तब फिर आपस में बैर रखना कहाँ तक उचित होगा। इच्छाओं पर नियंत्रण पाने वाला ही योगी कहलाता है और ऐसा करने वाला क्षत्रिय ही हो सकता है। कर्ण को शाप क्यों मिला था-? इसलिए कि वह क्षत्रिय पुत्र था क्योंकि सहन शीलता इसी जाति के लोगों में होती है।

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परिचय :
डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
वरिष्ठ पत्रकार/टिप्पणीकार
रेनबोन्यूज प्रकाशन में प्रबंध संपादक
संपर्क – bhupendra.rainbownews@gmail.com , अकबरपुर, अम्बेडकरनगर (उ.प्र.) मो.नं. 9454908400

लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं और आई.एन.वी.सी  का इससे सहमत होना आवश्यक नहीं।

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