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Thursday, October 1st, 2020

सरिता झा की तीन कविताएँ

सरिता झा की तीन कविताएँ
1)  मेरी कलम रुक गई
******************** दिल में है दर्द बहुत , क्यों न इसे, पन्नें पे उतार दूँ ? दिल में मेरे यह  शोर , करता है बहुत , क्यों न इसे , शब्दों  में ढाल दूँ ? अभी तो दर्द -ए -मोहब्बत , का ज़िक्र ही किया था शुरू  ! की आँखों से हो गयी , आसुंओं की बरसात शुरू  ! आसुंओं की जद में , आया वो पन्ना , अब वो रो रहा , अपने दर्द का रोना , अब कैसे उसपे मैं कुछ अपने शब्दों से निखार दूँ ?
2) मेरी डायरी
************************ आज मेरी डायरी, ने किया मुझसे ही सवाल ! हर दिन क्यों करती हो तुम , अपने दर्द भरे शब्दों  से वार ! मेरे हर पन्ने पे दिया है तुमने , अपना सारा दर्द उतार ! तेरे शब्दों  के वार  से , हो गया है ,मेरा बुरा हाल ! रोक ले कलम अपने करती हूँ , मैं तुमसे ये फ़रियाद ! कुछ पन्ने हीशेष  रह गये , बांकी सब हो गए तार -तार ! कहते हैं पन्ने मेरे , तुम क्यों करती हो , हर दिन अपने , कलम से मुझपे प्रहार ! तेरे लफ्ज़ो के वार  से , हो गया है मेरा बुरा हाल !!
३ )  बेटी ************************** मैं हूँ वो कोमल कली  , जो अभी तक नहीं है खिली ! चाह है हमें भी खिलने की, एक नए रूप में ढलने  की ! आया मौसम बहारों का, मैं कली से एक फूल बनी ! जब तक थी  मैं बंद कली , किसी की नजर ना मुझपर  पड़ी ! आज हूँ मैं एक नए रूप में, सबकी नजरें मुझे घूर रही ! बेखौफ थी जब कली थी, आज खौफ से काँप रही ! जाने कब कोन आएगा , डाली से जुदा कर जायेगा ! बेहतर थी वो मेरी दुनिया , जब थी मैं एक कोमल कली !
Sarita Jha's poems ,poems of Sarita Jha परिचय - : सरिता झा  (आशु ) कवयित्री  
 शिक्षा- स्नातक प्रतिष्ठा ( हिन्दी साहित्य ) सूचना प्राद्यौगिकी में डिप्लोमा
विशेष : मैं सरल भाषा में सामान्य बातों को , जीवन के विविध पहलू में शामिल सत्य परंन्तु अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी में ढालना बेहद पसंद करती हूँ . मैं कोई नैसर्गिक कवयित्री नहीं अपितु भावुक सरल नारी हूँ ! मुझे नारी विमर्श और सिनेह से लगाव है ..इसलिए मेरी कविताओं में यह यथार्थपरक रूप पढ़ने को मिलेंगें .निर्णय तो पाठक  के ऊपर  है   ( सरिता झा )
सम्पर्क-: हेसाग ,हटिया  रांची  , ईमेल- : saritajha11@gmail.com

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SARITA JHA, says on January 7, 2015, 4:57 PM

पोर्टल के संपादक ज़ाकिर साहेब , सोनाली मेम और शिव कुमार झ टिल्लू जी को साभार..जिनक प्रयास से मुझे यहाँ जगह मिली

SHIV KUMAR JHA, says on January 7, 2015, 4:09 PM

बहुत सुन्दर कवितायें ....गोया कवयित्री के उदगार से भी काफी , सहज और सरल ....परन्तु इन्हें एक बात का ध्यान रखना होगा साहित्य हमेशा उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए , शब्द संयोजन तो महज एक श्रृंगार है मौलिक तत्व है इसकी सार्थकता ...लेकिन तीनो पद्य बहुत सुन्दर हैं