Saturday, August 8th, 2020

सरिता झा की कविताएँ

 
सरिता झा  की कविताएँ
1)  मेरी कलम रुक गई
दिल में है दर्द बहुत , क्यों न इसे, पन्नें पे उतार दू ! दिल में मेरे ये शोर , करता है बहुत , क्यों न इसे , शब्दों  में ढाल दू ! अभी तो दर्द -ए -मोहब्बत , का ज़िक्र ही किया था शुरू  ! की आँखों से हो गयी , आसुंओं की बरसात शुरू  ! आसुंओं की जद में , आया वो पन्ना , अब वो रो रहा , अपने दर्द का रोना , अब कैसे उसपे मैं कुछ लिख दू ! *******************************
2 कान्हा की प्रेम दीवानी
जब आया बुलाबा मथुरा से, जाने को तैयार थे , कृष्ण कनाही ! पता चला जब राधा को, वो दौड़ी दौड़ी आयी ! रोते -रोते फिर उसने , पकड़ी कृष्ण की कलाई ! और कहा  ना जाओ कान्हा , मर जाएगी तेरी प्रेम दीवानी ! कान्हा -कान्हा करती रह गयी, कान्हा की प्रेम दीवानी ! पर तरस न आया कान्हा को, छोड़ गए वो राधा को ! उसके पीछे रोते रह गयी, ---------------------------------
3 उसकी प्रेम दीवानी !!
ना जानू कोई बंधन मैं तो, ना जानू इस जग की कोई रीत रे ! मैं तो बस इतना जानू , तू मेरा कान्हा लागे , और मोहे हुआ तोसे प्रीत रे ! कर दिया मैंने अपना सब कुछ , कान्हा तेरे नाम रे ! सुबह शाम मैं तोहे पुकारू , और मोहे ना दूजा कोई काम रे ! बना ले मोहे अपनी चरणों की दासी , या दे दे इस जीवन से मुक्ति रे ! -----------------------------------------
4 प्यार में तेरे क्या से क्या बन गए
लिखते -लिखते शायरी , हम शायर बन गये ! कल तक तो एक पन्ना थे , आज एक किताब बन गए ! लिखा है अपने अहसास को , और वो सारे गीत बन गए ! गाने लगे सब उसे , और वो गजल बन गए ! लिखते -लिखते शायरी , आज हम उनसे दूर हो गए ! कल तक थे वो गीत मेरे , आज शायरी के दर्द भरे सबद बन गए ! लिखते -लिखते शायरी , पूरी जिंदगी गुजर गए !! -------------------------------
5 मुझे रुलाने को तेरी यादें चली आई
दरवाज़े की चौखट पे बैठ के, तेरा इन्तिज़ार करती रह गई ! तु ना आया ए संगदिल , पर रात चली आई ! गुजरे सारे मौसम तेरी यादों के सहारे, पर तु ना आया ए बेवफा सावन चली आई ! जब देखें तुम्हारे खत को तो आँखे हुई नम , मुझे रुलाने को तेरी यादें चली आई ! तेरे लिए हमने अपनों को छोड़ा  , तु छोड़ गया मुझको फिर तन्हाई चली आई !
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Sarita-Jhas-poems-poems-of-Sarita-Jhaपरिचय – : सरिता झा  (आशु ) कवयित्री व् लेखिका शिक्षा- स्नातक प्रतिष्ठा ( हिन्दी साहित्य ) सूचना प्राद्यौगिकी में डिप्लोमा
विशेष : मैं सरल भाषा में सामान्य बातों को , जीवन के विविध पहलू में शामिल सत्य परंन्तु अंतर्द्वंद्व को अपनी लेखनी में ढालना बेहद पसंद करती हूँ . मैं कोई नैसर्गिक कवयित्री नहीं अपितु भावुक सरल नारी हूँ !
मुझे नारी विमर्श और सिनेह से लगाव है ..इसलिए मेरी कविताओं में यह यथार्थपरक रूप पढ़ने को मिलेंगें .निर्णय तो पाठक  के ऊपर  है   ( सरिता झा )
सम्पर्क-: हेसाग ,हटिया  रांची  , ईमेल- : saritajha11@gmail.com

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SHIV KUMAR JHA, says on April 22, 2015, 2:24 PM

बहुत सुन्दर रचनाएं ...कविताओं में पूर्णता हैं , भाव सहज और प्रवाह अनुखन है....