Wednesday, November 20th, 2019
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साहिल जे सिंह की चार ग़ज़ले

 
ग़ज़ल 

1- रोज़ चाहत में रुसवा सरे आम हो रहे हैं रंज सब इस जहाँ के मेरे नाम हो रहे हैं क्या कहूँ यार तौबा नज़र मुंतज़िर के लमहे आंच में हिज्र की घुल के गुलफाम हो रहे हैं है करम कोई तेरा सफर से मेरे वाबस्ता नक़्शेपा देख सब मेरे गुमनाम हो रहे हैं रात किस रंग गुजरी है किस सुर उगा सवेरा ख़्वाब में मस्त हरपल सुबह - शाम हो रहे हैं उस तर्ज़ रहगुज़र की कहानी बने है रहबर जिस तर्ज़ नीमवा चश्म के जाम हो रहे हैं जिस चमन का चलन था नज़र साफ़ पाक सीरत उस चमन में बसर के चलन खाम हो रहे हैं हट वफ़ा से तूने शोहरत को गले लगाया कर वफ़ा हम सरे राह बदनाम हो रहे हैं क्या चलन कौन सुहबत करे दिल फरेब दुनिया रोज़ फ़न नंगे पन के सरे बाम हो रहे हैं खुद करें क्यूँ न 'साहिल' नए सफर का महूरत सच गुज़र के मुसाफिर तो नाकाम हो रहे हैं

2- रोज़ दिल हिज्र में सुलगता है रात भर मोम सा पिघलता है एक लमहा लगे सदी सूरत शब पहर इस क़दर गुजरता है खुश्क जंगल का ज़र्द पहरावा साथ मौसम सहज बदलता है गौर से देख कर कदम रखना हर कदम पांव याँ फिसलता है रात हर रोज़ ता सहर भटकूँ यूँ पतंगा तवाफ़ करता है जब कभी बज़्म में शमा देखूँ दिल जिगर एक साथ जलता है ता सफ़र अक्स आशना कोई हर पहर साथ साथ चलता है हिज्र की रात पूछ मत 'साहिल' शाम ढलते ही दम निकलता है

3- लेकिन यह देख किसी सूरत दिल को चैन मिल जाए कोई मुझे दे सबब यारब शमा की तरह जलने का अच्छा, यूँ ही सही, दिल में जमी रंजिश पिघल जाए रोज़ दिल की ज़मीं पर नए सफर के बीज बोता हूँ जो मेरे सूने आँगन में भी कोई फूल खिल जाए खूब दिलकश हुई जाए है मेरे सफ़र की फिसलन थाम लेना मुझे साकी कही अगर पांव फिसल जाए कोई आंसू सा उभर आया है अब बोझल पलकों में किसी तरज़ सही दिल का कोई अरमाँ निकल जाए अब तो ख़ौफ़ लगे है 'साहिल' घर के ही चरागों से जश्न की मस्ती में अपना कहीं गुलशन न जल जाए

4-

सफर में साथ चलने की अदा कुछ और होती है समय की लय में ढलने की अदा कुछ और होती है वफ़ा की राह पर चलना बड़ा मुश्किल सही माना वफ़ा की राह चलने की अदा कुछ और होती है क़फ़स में क़ैद पंछी भी तो उड़ना सीख जाते हैं खुले आलम में पलने की अदा कुछ और होती है जिगर को चीर जाए है यूँ कमसिन आँख में पानी नज़र से बात करने की अदा कुछ और होती है अलग कोई सफर कंदा है हर पाओं के हिस्से में गुजर मिल साथ करने की अदा कुछ और होती है सफर की आंच में इक रोज़ यूँ भी तो पिघलना है शबे गम में पिघलने की अदा कुछ और होती है कभी जीना, कभी मरना, यही सब की कहानी है चमन में गुल सा खिलने की अदा कुछ और होती है लगे दिलकश बहुत 'साहिल' नकल के तौर भी लेकिन फ़ित्री रंगत में खिलने की अदा कुछ और होती है

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साहिल जे सिंह
लेखक व् शायर 
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सेवानिवृत सिविल सर्विस से
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 निवास - : नागपुर
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