Sunday, July 5th, 2020

रंगोली वैश्य की बेटियां व् अन्य कविताएँ

 
कविताएँ
बेटियां
बेटियां यूँ ही ससुराल नहीं जाती  . . वो छोड़ जाती है अपना सुनहरा बचपन उस पीहर में वो बैठक में लगी हुई शीशे वाली झालर में अपनी झलक छोड़ जाती है वो आँगन वाली तुलसी में अपनी महक छोड़ जाती है वो बाबा के किस्सों में गंभीरता तलाश लेती है और दादी की कहानियो में परियो को भी फ़ांस लेती है वो सहेलियों के साथ शरारत से स्कूल को सर पर उठा लेती है और घर आये मेहमान को पलकों पर बैठा लेती है वो माँ की साडी से पापा की कमीज तक सब प्रेस करना जरुरी समझती है और खुद के लिए खाना खाने तक को मज़बूरी समझती है वो सबकी दवाई का समय भी ध्यान रखती है और खुद बीमार होकर भी पुरे घर में नाचती है वो पैसो की तंगी के कारण शौक मार लेती है पर भाई के झगड़ा करने पर भी सब कुछ संभाल लेती है वो सब्जी वाले से मोल भाव भी करती है और बुड्डी भिखारन को देख आंसू भी भरती है वो पापा की मजबूरियों को पल में ताड लेती है और हर मुश्किल का हल पल में निकाल लेती है वो विदाई में पलकों को इसलिए भिगोती है क्युकी पीहर की कमी उसे महसूस होती है बेटियां यूँ ही ससुराल नहीं जाती वो छोड़ जाती है अपना सुनहरा बचपन उस पीहर में
____________
संघर्ष
हमने दो जून की रोटी में भी सुकून तलाशा है हमारी मुफलिसी में भी जिन्दादिली की आशा है हम तकदीर के हौसले भी बुलंद कर देते है हम किस्मत के सिक्को को यूँ ही पलट देते है हम जवान कंधो के बोझ की अनसुलझी पहेली है हम दुश्मन के खौफ और दोस्तों की अठखेली है हम गरीब के चूल्हे की जलती हुई लकड़ी है हम दुनिया के जालो में फंसी हुई मकडी है हम मजदूरो के बच्चो की भूख और प्यास है हम हिम्मत हारे हुए किसी मजबूर की आस है हम धूल है धक्कड़ है रस्ते की मिट्टी है हम परदेस में आई अपने देस की चिठ्ठी है हम काजल है आंसू है चेहरे की रौनक है हम भीड़ में मिली कोई खोई हुई ऐनक है हम झूट है सच है , एक टूटी सी ख्वाइश हैं हम दुनिया के दस्तूरो में एक जोर आज़माइश है हम भक्त है भगवान है विधि का विधान है हम संघर्षो से जूझे हुए बस एक इन्सान हैं
_______________________
सुनहरा बचपन
लो बिसरे हुए उन ख्वाबों को पाले फिर बीते हुए कल की यादे सजाले उन रातों की लोरी का प्यारा सा मौसम उस नन्हे से बचपन का प्यारा सा आँगन छोटी सी हसरतो को फिर से सजाले चलो बिसरे हुए उन ख्वाबों को पाले उन टूटे हुए खिलौनों की यादे उन बिसरे हुए दोस्तों की बाते वो चंदा को मामा कहने की हसरत वो छोटी सी ख्वाइश को जीने की चाहत उन बचपन के रंगों को फिर से सजाले चलो बिसरे हुए उन ख्वाबों को पाले ___________________
हम कौन है
कभी इस बात को गंभीरता से समझा गया है कि कौन है हम अगर नहीं तो चलिए बताते हैं । हम वो है जो आये दिन होते दंगो में मरते हैं। हम वो है जो घंटो सरकारी दफ्तरों की लाइनो में लगते हैं। हम वो है जो सडक पर गुंडो से धमकाये जाते हैं। हम वो है जो केवल चुनावो में ही याद आते हैं। हम वो है जो गलत देख कर भी चुप्पी साध लेते हैं। हम वो है जो धर्म समुदाय मे ही खुद को बांट लेते हैं। हम वो है जो सिर्फ सैलून में सरकारे बदलते हैं। हम वो है जो नेताओं की खुशामद करते हैं। हम वो है जो नौकरियों के लिए चप्पलें घिसते है। हम वो है जो आरक्षण की चक्की में पिसते है। हम वो है जो ईमानदारी से अपना घर चलाते हैं । हम वो है जो शाम के बाद बाहर निकलने से कतराते है। हम वो है जो भारतीयता का झूठा पाठ पढाते है। हम वो है जो बाहर हिन्दी बोलने मे शरमाते है। हम वो है जो भगतसिंह के संघर्षों को भूल जाते हैं। हम वो है जो मरने पर मुआवजा बन जाते हैं। हम वो है जो महीने के आखिरी में सूखा भात खाते हैं ।
__________
Rangoli Vysya poetess,Rangoli Vysya,  poetess Rangoli Vysya ,Rangoli Vysyaपरिचय - :
रंगोली वैश्य
कवियत्री व् लेखिका
शिक्षा – अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक ( अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद )
__________________________________

Comments

CAPTCHA code

Users Comment