सवाल देश के सर्वाेच्च पद की गरिमा का

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 – तनवीर जाफरी –

                     narendra modi   देश की जनता ने गत् लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत से जिता कर देश की सत्ता की बागडोर भाजपा के हाथों में सौंप दी तथा पार्टी ने अपनी चुनाव पूर्व घोषणा के अनुसार नरेंद्र मोदी को देश के सर्वोच्च पद अर्थात् प्रधानमंत्री के पद पर बिठा दिया। भारतीय लोकतंत्र में मतदाताओं का निर्णय सर्वोपरि माना जाता है। लिहाज़ा इस निर्णय को भी देश की जनता ने सहर्ष स्वीकार किया। प्रधानमंत्री बनने के पश्चात इस सर्वोच्च पद पर बैठने वाला व्यक्ति मात्र कोई व्यक्ति अथवा केवल किसी पार्टी अथवा पक्ष का प्रतिनिधि नहीं रह जाता। बल्कि वह देश की लगभग सवा करोड़ की आबादी का सम्मानित प्रतिनिधि होता है। उसकी हर कारगुज़ारी,उसका प्रत्येक वचन,उसकी बोल-भाषा,उसका चरित्र,उसके विचार,रहन-सहन तथा स्वभाव सबकुछ समूचे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री बनने से पूर्व यही नरेंद्र मोदी विभिन्न प्रकार के संगाीन विवादों में घिरे रहे जिनका यहां उल्ल्ेाख करना मुनासिब नहीं। उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पूर्व अपने अल्पज्ञान से भी देश की जनता को अपने सार्वजनिक भाषणों से अवगत कराया। उसके बावजूद देश की जनता ने कांग्रेस पार्टी की नाकामियों के मुकाबले नरेंद्र मोदी के नेतृतव में भारतीय जनता पार्टी को चुनने का फैसला किया। ज़ाहिर है कांग्रेस पार्टी के शासन में व्याप्त मंहगाई व घोर भ्रष्टाचार का लाभ उठाते हुए स्वयं मोदी ने ही अपने भाषणों के द्वारा जनता को तरह-तरह के सब्ज़बाग दिखाए। और उस समय किसी मज़बूत विकल्प की तलाश करती देश की जनता उनकी बातों में आ गई।

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से पूर्व पटना के गांधी मैदान में आयोजित एक जनसभा में नरेंद्र मोदी ने एक-दो नहीं बल्कि कई ऐतिहासिक झूठ बोले। उन्होंने अपने भाषण में बिहार के लोगों को खुश करने के लिए कहा कि सिकंदर गंगा के तट तक आया और उसे यहां से वापस जाना पड़ा। जबकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि सिकंदर की सेना सतलुज नदी भी पार नहीं कर सकी थी। उसके सैनिक बीमार पडऩे लगे थे तथा कमज़ोर होने के कारण उनकी सेना सतलुज से आगे बढऩे के योग्य ही नहीं रह गई थी। इसी प्रकार उन्होंने तक्षशिला विश्वविद्यालय को बिहार में गिना डाला था जबकि तक्षशिला विश्वविद्यालय आज के पाकिस्तान में स्थित है। चाणक्या इसी तक्षशिला विश्वद्यिालय में प्रोफेसर हुआ करते थे। मोदी ने बड़े जोश में चंद्रगुप्त को गुप्तवंश का शासक बता डाला था। जबकि जिन चंद्रगुप्त का वे हवाला दे रहे थे वह गुप्त वंश के नहीं बल्कि मौर्य वंश के थे। सम्राटअशोक इन्हीं चंद्रगुप्त र्मार्य के पौत्र थे। उन्होंने बिहार की जनता से ‘चुन-चुन कर साफ करोगे अथवा नहीं’। इस प्रकार की शब्दावली पर जनता से हां करवाई थी। उत्तर प्रदेश में उन्होंने छप्पन ईंच का सीना होने जैसा भद्दा मुहावर इस्तेमाल किया था। नरेंद्र मोदी ने इसी प्रकार पूरे देश में चुनाव पूर्व घूम-घूम कर ऐसे और भी कई गलत व झूठे तथ्य जनता के सामने पेश किए। इसे उनका अल्पज्ञान ही कहा जाएगा। परंतु इसके बावजूद भी जनता ने उनके झूठ को नज़रअंदाज़ करते हुए उन्हें देश का प्रधानमंत्री चुना। निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र के इस निर्णय का स्वागत भी किया जाना चाहिए।

परंतु प्रश्र यह है कि क्या प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ जाने के बाद अब भी उन्हें ऐसी भाषा-शैली का इस्तेमाल करना चाहिए जैसाकि वे चुनाव पूर्व करते रहे हैं? अब नरेंद्र मोदी उस पद पर विराजमान हो चुके हैं जिस पद से पूरे देश की मान-मर्यादा,इज़्ज़त व स्वाभिमान जुड़ा हुआ है। लिहाज़ा प्रधानमंत्री बनने के बाद अब उनके मुंह से निकला एक-एक शब्द समूचे राष्ट्र की नुमाईंदगी करता है। अब यदि नरेंद्र मोदी अपने राजनैतिक लाभ के लिए झूठ बोलने की कोशिश करते हैं तो यही समझा जाएगा कि गोया देश का प्रधानमंत्री झूठ बोल रहा है। उनकी प्रत्येक गतिविधि पूरे राष्ट्र से जुड़ चुकी है। देश के प्रधानमंत्री को अत्यंत संयमित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। उसे विनम्र तथा उदार नज़र आना चाहिए। और केवल नज़र ही नहीं आना चाहिए बल्कि उसे अपनी कार्यशैली से यह साबित करना चाहिए कि वह राजधर्म का पालन करने वाला सुशील,विनम्र,संवेदनशील,गंभीर तथा उदार हृदय रखने वाला प्रधानमंत्री है। परंतु दुर्भाग्यवश उनके प्रधानमंत्री बनने से लेकर अब तक कई घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं जिससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा पर सवाल खड़ा होने लगा है। उदाहरण के तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत दौर के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कथित रूप से दस लाख रुपये की कीमत का गर्म सूट पहना गया। बताया जाता है कि इस पर सोने के तारों से नरेंद्र मोदी का नाम उकेरा गया था। सवाल यह है कि इस प्रकार का बहूमुल्य सूट पहनकर नरेंद्र मोदी देश या दुनिया को आिखर क्या संदेश देना चाहते थे? यह देश गांधी की खादी,लंगोटी व लाठी जैसी सादगी के लिए जाना जाता है। यह संतों व फकीरों के देश के रूप में अपनी पहचान रखता है। इस देश में राजशाही का खत्मा हो चुका है। देश की साधारण व गरीब जनता किसी प्रधानमंत्री को इसलिए कतई नहीं चुनती कि इसके द्वारा निर्वाचित व्यक्ति लाखों रुपये का सूट पहने या आए दिन रंग-बिरंगे कुरते व जैकेट पहन कर एक फैशनपरस्त प्रधानमंत्री के रूप में अपनी पहचान बनाए। बल्कि इसलिए चुनती है कि निर्वाचित व्यक्ति अपने किए गए वादों को पूरा करे व मतदाताओं की उम्मीदों व आकांक्षाओं पर खरा उतरे।

ओबामा के दौरे के दौरान ही प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व में दो परस्पर विरोधी बातें नज़र आईं। एक और तो वे दस लाख रुपये का कथित सूट पहने दिखाई दिए और दूसरी ओर उन्होंने अपने हाथों से चाय बनाकर राष्ट्रपति ओबामा को पिलाई। व्यक्तिगत् रूप से किसी भारतीय नागरिक द्वारा किसी मेहमान को अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाना निश्चित रूप से उसके बडक़पन का प्रतीक है। परंतु देश का प्रधानमंत्री होने के नाते उनके द्वारा ऐसा किया जाना मुनासिब नहीं था। स्वयं शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जी ने भी उनके इस कदम की आलोचना की है। ओबामा के स्वागत में उन्होंने और भी कई प्रोटोकाल तोड़े जो आमतौर से दूसरे देशों के राष्ट्रप्रमुखों या राष्ट्राध्यक्षों द्वारा नहीं तोड़े जाते हैं। गणतंत्र दिवस परेड के  आयोजन का दिल्ली विधानसभा चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए राजनैतिक दुरुपयोग भी किया गया। जैसेकि भाजपा की दिल्ली की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार बनाई गई किरण बेदी को तो विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया जबकि दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके अरविंद केजरीवाल को आमंत्रित करना उचित नहीं समझा गया। बजाए इसके केजरीवाल द्वारा स्वयं को आमंत्रित न किए जाने का विरोध जताने का भाजपा ने अपने पोस्टरों व विज्ञापनों में मज़ाक उड़ाया। इसे एक उदारवादी शासन का लक्षण नहीं कहा जा सकता। गणतंत्र दिवस किसी एक दल अथवा पार्टी की जागीर नहीं है इसमें शिरकत करने का सभी देशवासियों को बराबर का अधिकार है। मोदी सरकार के पास इस बात का कोई जवाब नहीं हो सकता कि उसने केजरीवाल को क्यों आमंत्रित नहीं किया और किरण बेदी को किस आधार पर बुलाया गया?

दिल्ली के विधानसभा चुनाव मेंं भी नरेंद्र मोदी के तेवर,उनकी भाषा व हावभाव ऐसे दिखाई दिए गोया वह देश के नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री हों। उन्होंने अपने बहुमूल्य समय के साथ-साथ पूरी केंद्र सरकार की ताकत को अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध इस्तेमाल किया। स्वयं दिल्ली में रहते हुए दिल्ली की सीमा के भीतर उन्होंने हेलीकाप्टर का प्रयोग कर राजनैतिक जनसभाएं संबोधित कीं। अपने भाषणों में उन्होंने अपनी आठ महीने की उपलब्धियां गिनाने के बजाए तथा लोकसभा चुनाव में किए गए अपने वादों के विषय में जनता को बताने के बजाए आम आदमी पार्टी व अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध अपने विशेष अंदाज़ में केवल भाषणबाज़ी करते दिखाई दिए। उन्होंने देश का प्रधानमंत्री होते हुए अपने चुनावी भाषण में स्वयं को नसीब वाला तथा अपने विरोधी को बदनसीब बताने जैसा हल्का वाक्य प्रयोग किया। हालांकि वे अपने भाषण में अरविंद केजरीवाल का नाम लेना अपनी तौहीन समझ रहे थे। परंतु उनका पूरा भाषण केजरीवाल पर ही केंद्रित रहता था। हद तो तब हो गई जबकि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में केजरीवाल व उनकी पार्टी को तो इशारों-इशरों में झूठा करार दिया जबकि उन्होंने स्वयं जनता को गुमराह करने के लिए इतना बड़ा झूठ बोला जिसे सुनकर मीडिया भी दंग रह गया। दिल्ली विधानसभा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से घबराकर प्रधानमंत्री ने यह कथा गढ़ डाली कि ‘बाज़ारू’ लोगों ने सर्वे कराकर बनारस में तीन लाख वोटों से मेरी पराजय की रिपोर्ट दी थी। मोदी का यह कथन बिल्कुल झूठा व निराधार था। देश के किसी भी टीवी चैनल ने नरेंद्र मोदी को बनारस में तीन लाख मतों से हारने की रिपोर्ट चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में नहीं दी थी। उन्होंने मीडिया को ‘बाज़ारू’ कहकर भी कतई अच्छा नहीं किया। यह शब्द ऐसा शब्द नहीं जिसेकि भारत जैसे सम्मानित देश का प्रधानमंत्री  सार्वजनिक रूप से अपने भाषण में इस्तेमाल करे और वह भी झूठे दावों के साथ जोडक़र। प्रधानमंत्री के मीडिया को ‘बाज़ारू’ कहने व उनके तीन लाख वोटों से हारने के कथन पर भाजपा नेताओं से जब मीडिया ने सवाल किया तो उनके पास बगलें झांकने के सिवा कुछ नहीं था।

नरेंद्र मोदी जी को अब अपने झूठ और लफ्फाज़ी से कतई बाज़ आ जाना चाहिए। उनकी इस शैली ने उनको उस स्थान तक पहुंचा दिया है जिसके लिए वे अपनी इस शैली में पारंगत थे। परंतु अब वे इस देश के प्रधानमंत्री हैं लिहाज़ा उन्हें एक-एक शब्द बहुत सूझबूझ के साथ व सोच-समझकर निकालना चाहिए। क्योंकि प्रधानमंत्री पद के साथ पूरे देश की गरिमा,सम्मान व मान-मर्यादा जुड़ी होती है। देश का प्रधानमंत्री ऐसा होना चाहिए जिसकी भाषा,शैली व चरित्र पर देश की जनता गर्व कर सके न कि स्वयं को शर्मसार व अपमानित महसूस करे।

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Tanveer-Jafriwriter-Tanveer-Jafriinvc-newsतनवीर-जाफ़री2Tanveer Jafri
Columnist and Author

Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also a recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities

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