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Friday, September 25th, 2020

प्रियंका की पाँच कविताएँ

प्रियंका  की पाँच कविताएँ 
एक
चलते चलते ठहरा था बादल कोई कभी यूँ ही कर गया नर्म ज़मी सूखी सी पड़ी थी जो अब तक ठहरना फितरत न सही बंध के रहना यूँ मुमकिन भी न था रूठे मौसम सा जाऊँगा पर लौट के फिर आ जाऊँगा देख लेना तू कह देता था ज़मी से अक्सर बदले मौसम,हवाएँ और जीने के तरीके भी शायद सिमट चुकी है नमी भी पलकों की कोरों में बंदिशों में जकड़ी आवाज़ें भी घुट के रह जाती है कहीं खुद ही खुद से भी कह पाती कुछ भी हाँ.... यकीन है तो इतना बस कुछ वादे आज भी कहीं कभी पूरे हुआ करते है.......... _________________________
दो
फिसल ही जाता है वक़्त बंद मुट्ठी से भी रेत की तरह छूट जाती है तमाम ज़िद्दी यादें बीच उँगलियों के मानो जोड़ लिया हो एक रिश्ता मुझसे कल की खुशियों और आज के दर्द तक का सागर सी ज़िन्दगी कभी अलमस्त कभी शांत निभा लेती है रिश्ते जाने कैसे कैसे कभी रेत के घरोंदों जैसे बनते ढहते सपने कभी जाने क्या क्या खुद में समेटे या दफ़न किये बहुत कुछ खुद में रेत के किनारों जैसे या आँख में रेत से चुभते किसी रिश्ते जैसे जिनकी आज ज़रूरत। ही न रही ....... _____________________________
तीन
ए ज़िंदगी शायद मेरी तुझको जरूरत न रही तेरी क्या खुद की भी अब मुझे चाहत न रही जज़्ब हो गया कुछ इस तरह तेरा वज़ूद मुझमे इस आइने में मेरी अब तो वो सूरत न रही मायूस अंधेरों में रूह फिरती है अब तो मेरी ख्यालों में कभी तू ही था और की सूरत न रही इन खामोशियों ने कुछ इस तरह घेरा मुझको तुझसे क्या अब खुद से भी कोई गुफ्तगू न रही अपनी तन्हाइयों से ही इश्क़ हो चला हमको तेरे ख्याल के सिवा अब कोई जुस्तजू न रही बहुत थक गई हूँ लड़ के बेरुखी से तेरी किसी भी सवाल को ज़वाब की आरज़ू न रही क्यों खोजूं तुझे सारे जहाँ की गलियों में हमसाया तू है हर वक़्त मै ही रूबरू न रही _______________________________
चार
सच तमाम जो आँखों से दीखते हैं और वो झूठ जो पोशीदा हैं उनके बीच की खाली जगहों में कही हम मिल लिया करते हैं। बिना शर्त की तमाम शर्तों को ज़िन्दगी की तरह रोज़ाना ही बेशर्त ही जी लिया करते हैं। शोर की चुप,सन्नाटे में छुपी आवाज़ों और तमाम अनकही बातें मन ही मन में चुपचाप सुन लिया करते हैं कुछ न होकर भी बहुत कुछ होने का गुमान ही सही एक अहसास से लबरेज़ ज़िन्दगी रोज़ ही जी लिया करते है............ ____________________________________
पाँच
वो जो दी थी गिन के तुमने कुछ सांसों की मियाद शक्ल में लम्हों की खर्च हो चली बड़ी सर्द सी पड़ी हैं शामें कुछ रोज़ ही छू कर देखा है गुज़रते बर्फ से लम्हों को जाने क्यों कागज़ पर लफ़्ज़ों के उभरते अक्स में हरक़त ही नहीं होती दो आवाज़ कि कहीं कोई जुम्बिश तो हो सुना है एहसास की तपिश से बर्फ पिघल जाया करती है........ ______________
PRIYANKA,POET PRINKAपरिचय :-
प्रियंका
कवयित्री व् लेखिका 
प्रियंका जी एक गृहणी हैं  इन्होने संस्कृत साहित्य से स्नातक एवं समाजशास्त्र से परास्नातक किया है।
संवेदनशील मन की संवेदनाएं... कभी पुष्पों सी सुवासित,कभी मधुरिम, कभी अश्रु बिन्दुओं में परिलक्षित होकर स्वतः ही शब्दों का प्रारूप लेती गईं।
प्रमुख लेखन विधा -समस्त विधाएं ,हिंदी छंद, गीत,छंदमुक्त कविताएं,हाइकू,मुक्तक लघु कथा प्रकाशित संग्रह: शुक्तिका प्रकाशन की तीन साझा काव्य संग्रह  अंजुरी , पावनी एवं निर्झरिका । तीन साझा एवं एक एकल काव्य संकलन शीघ्र प्रकाश्य  सृजनात्मकता को नए आयाम मिले...अन्तर्निहित क्षमताओं को  आत्मविश्वास में परिवर्तित करने वाले शुभचिन्तकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए  अन्तर्मन के नन्हें पंखों से अनन्त आकाश की ऊंचाइयां नापने का एक प्रयास !

Comments

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Users Comment

dr preetika tripathi, says on August 27, 2015, 6:02 PM

अतिसुन्दर बहुत ही सुन्दर रचनाएँ है आपको ढेरों शुभकामनाये

मुकेश कुमार सिन्हा, says on February 24, 2015, 5:39 PM

पांचो बेहतरीन रचनाएं

सुरेन्द्र कुमार सैनी, says on February 21, 2015, 11:37 AM

सुन्दर रचनाएँ, अछूते विषयों को लेकर मोहक से शब्दों से गढ़ीं आक्रशक प्रस्तुति.और प्रभावित ढँग से की गई समाप्ति। फ्रियंका मेरी तरफ से तुम्हें बधाई और आशीर्वाद।

V K Tripathi, says on February 18, 2015, 3:45 PM

nice ones , different shades of poems underlining the core of existence