राजकुमार धर द्विवेदी के मुक्तक

बातें करता गांव-गली की, अमराई , खलिहान की,
गेहूं, सरसों, चना, मटर की, अरहर, कुटकी, धान की।
नेताओं के कपट, छलावे, लिखता दर्द किसान का,
बातें करता सत्य -न्याय की, त्याग और बलिदान की।

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टपक रही जोखू की मड़ई, देखो तुम झरियार में,
चूल्हा जलता नहीं दीन का, तीज और त्योहार में।
बात तरक्की की कोरी है, क्या पाया है देश ने,
खेवनहार नहीं दिखता है, नैया है मझधार में।

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मां की लोरी, लोककथा ने, कुछ लिखना सिखलाया है,
घोर तिमिर में सदा पिता ने, पथ मुझको दिखलाया है।
नहीं फूल -बगिया पर लिखता, नहीं प्यार लिख पाता हूं,
विपदाओं ने आकर आगे, लेखक मुझे बनाया है।
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पहली कविता लिखी भैंस पर, जिसको चूहे खाए,
दूजी लिख दी खरी-खरी तो, पटवारी गुस्साए।
लिखी तीसरी शिक्षक पर जो, सदा देर से आते,
हम तो ऐसे लिखते आए, विद्रोही कहलाए।

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Rajkumar-Dhar-Dwivedis-poemspoems-of-Rajkumar-Dhar-DwivediRajkumar-Dhar-Dwivediपरिचय : –

राजकुमार धर द्विवेदी

लेखक, कवि, पत्रकार

साहित्यिक नाम:–  राजकुमार धर द्विवेदी ‘विद्रोही’

संप्रति :- वरिष्ठ उप -संपादक, नईदुनिया, जेल रोड,रायपुर छत्तीसगढ़

साहित्यिक गुरु (अगर हो)-  स्व.  डा. प्रयागदत्त तिवारी जी( प्राध्यापक हिंदीव्यवसाय)

साथ में :  पत्रकारिता, स्वतंत्र लेखन, कादम्बिनी,हिन्दुस्तान सहित देश की राष्ट्रीय पत्रिकाओं में लेखन

फोन नंबर : –09425484657 ,  ईमेल :- rajkumardhardwivedi@gmail.com

2 COMMENTS

  1. मेरी रचना को यहां स्थान देने के लिए साधुवाद, आदरणीया सोनाली जी। पोर्टल की टीम को सादर नमन।

  2. मेरी रचना को यहां स्थान देने के किए साधुवाद, आदरणीय सोनाली जी। पोर्टल की टीम को सादर नमन।

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