Tuesday, February 18th, 2020

प्रेमचन्दः सार्वकालिक एवं सर्वसमावेशी साहित्यकार

articles on munshi prem chand,munshi prem chand news- प्रभात कुमार राय -

मुंशी प्रेमचन्द (31.7.1880-8.10.1936) सार्वकालिक हैं और उनके साहित्य में आज भी नूतनता एवं अर्थगर्भिता की झलक मिलती है। अपने युग के यथार्थ को सही ढंग से परखकर इन्होंने अपनी रचनाओं में प्रतिबिंबित किया जिससे मात्र समकालीन ही नहीं परवर्त्ती पीढ़ी भी प्रभावित हुईं। उन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन खासकर निम्न मध्य वर्गीय एवं कृषक जीवन की सच्ची तस्वीर पूर्ण बेबाकी के साथ अपने उपन्यासों एवं कहानियों में चित्रित की है। उनका साहित्य मानवीय एवं सामाजिक संबंधों का सूक्ष्म विश्लेषण कर घनिष्ठ संवेदन को पाठकों को प्रत्यर्पित कर चिरस्थायी बन गया। उन्हें अपने युग का सर्वश्रेष्ठ दृष्टा कलाकार माना जाता है। साहित्य की सोद्देश्यता में उनकी गहरी आस्था थी। उनका कथा-साहित्य समकालीन युग चेतना को ऐतिहासिक चेतना से जोड़कर उसका प्रामाणिक, कलात्मक एवं विववेकपूर्ण बोध कराता है। लगभग सभी उपन्यासों में उन्होंने किसानों की आर्थिक दुःस्थिति और उससे उत्पन्न व्यथा और करूणा का मार्मिक निरूपण किया है। व्यवहार और आचरण की विसंगति को स्पष्टवादिता के साथ प्रस्तुत किया है।

साहित्य को कालजयी होने के लिए युगीन जनचेतना से उसका गहरा संबंध अनिवार्य है। प्रेमचंद का संपूर्ण साहित्य आम आदमी का संघर्ष से जूझते रहने की सीधी-सच्ची अभिव्यक्ति है। साहित्य के संबंध में उनके विचार है, “मेरे विचार से साहित्य की सर्वोत्तम परिभाषा जीवन की आलोचना हैं चाहे वह निबंध के रूप में, चाहे कहानियाँ अथवा काब्य के रूप में। उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।“ उन्होंने अपनी मर्मस्पर्शी कहानियों में न केवल समाज एवं युग के सत्य को नग्न रूप में प्रस्तुत किया बल्कि यथाशक्य उनके समाधान के रास्ते भी दिखााये। उन्होंने समाज सुधार एवं वर्त्तमान के निर्माण हेतु दहेज, आडंबर, सूदखोरी, वेश्यावृति, छुआछुत, धामिक प्रपंच, सामंती प्रथा आदि गंभीर समस्याओं को अपने लेखन का विषय बनाया। वे वंचितों एवं शोषितों के उद्धार के लिए सदैव प्रयत्नशील रहे। अपने साहित्य के माध्यम से पाठकों को आशावादिता एवं जीवन के प्रति प्रभावी एवं सक्रिय दृष्टिकोण रखने की भावना जागृत करने का प्रयास करते रहे। उनका मानना था कि जिस क्षण हमारे जीवन में व्याप्त जड़ता का लोप हो जायेगा उसी क्षण हमारे देशवासी अपनी हीनता को भाँप कर स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत हो जायगें। स्वतंत्रता प्राप्ति से नवचेेतना का प्रबल संचार होगा जो हमारी दीनता-हीनता को समूल नष्ट करने में सहायक होगा। उन्होंने लिखा हैः “हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौन्दर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो-जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं, क्योंकि अब और सोना मृत्यु का लक्ष्ण है।“ वे व्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वस्थ सामाजिक चेतना से संपृक्त देखना चाहते थे। कई स्थानों पर प्रेमचंद पैनी दृष्टि वाले भविष्यदृष्टा के रूप में प्रतीत होते है। ‘गबन‘ उपन्यास का पात्र देवीदीन एक नेता से जिज्ञासा करता है-“साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आँखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंग्रेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंग्रेजी ठाठ बनाए घूमोगे, इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा?“ वर्त्तमान राजनेताओं और नौकरशाहों की सुविधाभोगी प्रवृति उपर्युक्त प्रश्न की सार्थकता स्वतंत्रता के 68 वर्षों के बाद भी हर पल महसूस कराता है।

भारतीय परंपराओं एवं सांस्कृतिक धरोहर में व्यापत विसंगतियों एवं दूषिताओं को प्रेमचंद ने जम कर विरोध किया। वर्ण और जाति के आधार पर सामाजिक शोषण की अविरत परंपरा का उन्होंने अपने सशक्त कलम से पर्दाफास किया। वे साम्प्रदायिकता और संकीर्ण मनोवृतियों का पुरजोर विरोध करते थे तथा इन्हें वे राष्ट्रीय चेतना एवं स्वराज प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाओं के रूप में अपने साहित्य में अंकित किया है। प्रेमचंद सामंतवाद, औधोगीकरण एवं परतंत्रता के खिलाफ सतत् कलम के सिपाही बनकर लड़ते रहे। उनके साहित्य का मूल स्वर नव्य चेतना एवं नवजागरण रहा; उनके उपन्यासों का फलक कहीं भी विशुद्ध राजनीतिक नहीं है।

उनकी भाषा में सरलता, सहजता तथा व्यावहारिकता है। वे बहुत ही कम शब्दों में अपनी बात कहते थे। उनका मत हैः “जीवित भाषा तो जीवित देह की तरह बराबर बनती रहती है। शुद्ध हिन्दी तो निरर्थक शब्द है, जब भारत श्ुाद्ध हिन्दु होता तो उसकी भाषा शुद्ध हिन्दी होती। जब तक यहाँ मुसलमान, ईसाई, फारसी आदि सभी जातियाँ मौजूद हैं, हमारी भाषा भी ब्यापक रहेगी।“ इसीलिए उन्होंने प्रसाद जी की तरह शुद्ध संस्कृतनिष्ठ, आलंकारिक, कलात्मक भाषा का प्रयोग नहीं कर दैनिक जीवन की बोल-चाल की भाषा में साहित्य रचा जो पाठको के हृदय में विश्ेाष स्थान बना लिया। उन्होंने भाषा की सहजता से हिन्दी को अपना खास मुहावरा और खुलापन प्रदान किया जो उनके साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारने में बड़ी भूमिका निभाई। अपनी मुहावरेदार भाषा से वणर््य-वस्तु, जो जीवनानुभव पर आधारित था, को एक विषिष्ट सामाजिक संदर्भ प्रदान किया। प्रेमचंद अति आदर्शवाद और अति यथार्थवाद के भी विरोधी थे। वे समन्वय के मध्यम मार्ग को अपनाना चाहते थे। यह दृष्टिको्रण अंग्रेजी भाषा के प्रति उनके विचार में परिलक्षित होता है। एक स्थान पर उन्होंने लिखा हैः “अंग्रजी हमारी पराधीनता की वही बेड़ी है, जिसने हमारे मन और बुद्धि को जकड़ रखा है कि उसमें इच्छा भी नहीं रही। हमारा शिक्षित समाज इस बेड़ी को गले का हार समझने पर मजबूर है।“ डा0 प्रभाकर माचवे ने लिखा है कि अंग्रेजी भाषा के इस विरोध में प्रेमचंद इसकी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उपलब्धियों को अस्वीकार नहीं करते। उन्होंने स्पष्ट शब्दो में कहा हैः “दुनिया की तहजीवी या सांस्कृतिक विरादारी में मिलने के लिए अंग्रेजी ही हमारे लिए एक दरवाजा है और इसकी तरफ से हम ऑख नही बंद कर सकते, लेकिन हम दौलत और अख्तार की बेतहासा दौड़ में कौमी भाषा की जरूरत बिल्कुल भूल गये और इस जरूरत को याद कौन दिलाता।“ साहित्य में कृत्रिम भाषा का प्रयोग उन्हें पसंद नहीं था। प्रेमचंद शिक्षा की प्राचीन परिपाटी के हिमायती थे। उन्होंने पाश्चात्य शिक्षा, सम्यता एवं संस्कृति का विरोध अपने साहित्य में अनेक स्थान पर किया है। ‘कर्मभूमि’ में वे लिखते हैंः “किराये की तालीम हमारे केरेक्टर को तबाह किये डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की जरूरत है, डिग्री की नहीं।“

प्रेमचंद ग्राम्य जीवन की सादगी एवं सरलता की प्रतिमुर्ति थे। प्रेम, त्याग, सेवा करूण, क्षमा एवं उदारता आदि उद्धात गुणों को वे मनुष्य के स्वाभाव का अभिन्न अंग मानते थे। उनकी धारणा थी कि गाँव के निर्धन, असहाय और सीधे-सादे लोगों में ये सारे गुण प्रचुरता से मिलते है। डा0 कनर रईस ने अपने निवंध “प्रेमचंद: गाँधीवाद से समाजवाद“ में लिखा है कि उनका यह कल्पित मनुष्य जो उनके बहुत से पात्रों में झलक दिखाता है इन्हीं गुणों से परिपूर्ण नजर आता है। नगर सम्यता के आक्रमण को वे ग्राम्य जीवन की संस्कृति के लिए हानिप्रद मानते थे। परंपरा एवं रूढ़िवादिता पर तीव्र प्रहार के बावजूद प्रेमचंद का ग्राम्य जीवन के प्रति आकर्षण दरअसल उनकी राष्ट्रीय भावना का प्रतीक है। यंत्र की मानवोचित गुणों एवं मूल्यों को खत्म कर देनेवाली गति प्रेमचंद को स्वीकार नहीं था। श्रम से कतराकर भौतिक सुख एवं सुविधा पहुँचानेवाली यंत्र-सभ्यता उन्हें सर्वथा घातक प्रतीत होता था। वे मानव में ईश्वर की प्रतिमूर्ति देखते थे और उन सारी निष्पत्तियों को वे स्वीकार कर चलते थे जो एक आस्तिक व्यक्ति जीवन में आस्था के बल पर मानना चाहता था। मानव और उसके कृतित्व पर उनकी गहरी आस्था थी और इसे वे ईश्वर का पर्याय मानते थे। उन्हें भारतीय सांमजस्यवादी प्रवृति एवं सहिष्णुता में विश्वास था। इसमें गाँधीजी का प्रभाव परिलक्षित होता है। स्वावलंबन को प्रेमचंद स्वराज्य का साधन मानते थे। वे चाहते थे कि भारत अपने पैरों पर खड़ा हो जाए और अपनी आवश्यकता की वस्तुओं का खुद उत्पादन करें। छोटी-छोटी चीजों के लिए परमुखापेक्षिता की भट्ठी में जलना उन्हें बेहद नापसंद था। वे व्यक्ति की मुक्ति के समर्थक थे लेकिन व्यक्ति और समष्टि, जो प्रगतिशील मुल्यों पर आधारित हो, के परस्पर पूरक संबंधों के हिमायती थे। उनके अनुसार सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा समानता के लिए एक वर्गहीन समाज की स्थापना आवश्यक है। इस अवधारणा को बल देते हुए उन्होंने गाँधीजी के विचारों के प्रतिकूल पूंजीपति व्यवस्था के खिलाफ सोशलिस्ट समाज को प्रधानता देते है। प्रेमचंद का दृढ़ मत था कि जमींदार, महाजन या पूंजीपति अपने वर्गीय लाभ को किसी प्रकार छोड़ना नहीं चाहते। अपने लेख ‘अन्धा पूँजीपति’ में उनहोंने स्पष्ट किया हैः “यह आशा करना कि पूँजीपति किसानों की दुर्दषा से लाभ उठाना छोड़ देगें कुत्ते से चमड़े की रखवाली करने की आशा करना है। इस निर्दयी जानवर से अपनी रक्षा के लिए स्वंय ही सशस्त्र होना पड़ेगा।“

उत्सर्ग और त्याग प्रेमचन्द के लिए प्रेम का ही एक दूसरा पहलू था। उनके साहित्य में सामाजिक एवं राष्ट्रीय वेदी पर बलिदान करनेवालों की परंपरा दृष्टिगोचर होती है। वहाँ केवल कर्त्तव्य का शुष्क बोध ही नहीं वरन् प्रेम के साथ कर्त्तव्य का अद्भुत सम्मिश्रण दिखाई देता है। उनका भावजगत व्यापक और हृदय विराट है। वे निर्धन एवं साधनहीन के कल्याणेच्छु तथा शोषक एवं परपीड़क के प्रबल विरोधी हैं। साहित्य एवं राष्ट्र के लिए उनका अवदान अप्रतिम और चिरस्मरणी है। उन्होंने साहित्यकार को इन शब्दों में परिभाषित किया था: साहित्यकार मानवता, भद्रता और दिव्यता का बाना बाँधे होता है। जो दलित हैं, पीड़ित है, वंचित है- वह चाहे व्यक्ति हो या समूह - उनकी वकालत और हिमायत करना ही उसका पेशा है। यह समाज ही उसकी अदालत है और इसी के सामने वह अपना इहतमासा पेश करता है।“ अपने कृतित्व में प्रेमचन्द ने इस परिभाषा का शब्दशः अनुपालन कर सामाजिक जीवन का अंतरंग, व्यापक एवं वैविद्धपूर्ण चित्र उकेड़ा है जो हमारे वर्त्तमान के लिए उद्बोधन है। वे सच्चे अर्थ में समग्र मानवता के सजग प्रहरी है और गोर्की एवं लू शुन की भाँति एक अविस्मरणीय रचनाकार हैं जिसने आम आदमी के लिए अपना जीवन होम कर दिया।

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Prabhat Kumar Rai
Energy Adviser to Chief Minister, Bihar

Former Chairman of Bihar State Electricity  Board & Former  Chairman-cum-Managing Director Bihar State Power (Holding) Co. Ltd. . Former IRSEE ( Indian Railway Service of Electrical Engineers ) . Presently Energy Adviser to Hon’ble C.M. Govt. of Bihar . Distinguished Alumni of Bihar College of Engineering ( Now NIT , Patna )  Patna University. First Class First with Distinction in B.Sc.(Electrical Engineering). Alumni Association GOLD MEDALIST  from IIT, Kharagpur , adjudged as the BEST M.TECH. STUDENT.

Administrator and Technocrat of International repute and a prolific writer . His writings depicts vivid pictures  of socio-economic scenario of developing & changing India , projects inherent values of the society and re-narrates the concept of modernization . Writing has always been one of his forte, alongside his ability for sharp, critical analysis and conceptual thinking. It was this foresight and his sharp and apt analysis of developmental processes gives him an edge over others.

Email: pkrai1@rediffmail.com – energy.adv2cm@gmail.com

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