Thursday, February 27th, 2020

भास्करानन्द झा भास्कर की पाँच कविताएँ

भास्करानन्द झा भास्कर की पाँच कविताएँ

शिव कुमार झा टिल्लू  की टिप्पणी : हिन्दी , अंगरेजी  और अपनी मातृभाषामैथिली  के चर्चित कवि भास्कर झा जी एक स्तंभकार और समालोचक भी हैं . यूं तो ये युगधर्म के  कवि हैं  पर अलंकार और छन्दयुक्त होने के कारण इनके पद्यों को यदि " घृतगन्धा " कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी .सबसे बड़ी बात इनकी काव्यदर्शन में परिलक्षित होती है : "सर्वकामी और सर्वगामी सुगमता "  अतः इनके पाठक व्यापक हैं , किसी ख़ास संदर्भ या किसी ख़ास पाठक- वर्ग के लिए इनकी लेखनी नहीं चलती .अतः सर्वव्यापक लोकप्रियता के कारण मंच  से दर्शकों को सहेज लेते हैं. इनकी आशुत्व में किसी प्रकार का संघर्ष दिखाई नहीं देता और ना ही प्रतिकार का अवांछित व्यंग्य समाहित है . अतः श्रोता , पाठक और  दर्शक सहजता से इन्हें स्वीकार करते रहे हैं.  निरन्तर बहुभाषात्मक   अध्ययनशीलता के कारण अपनी मातृभाषा मैथिली और राष्ट्रभाषा  में बहुत सारे नवल काव्य लक्षणा और व्यंजना को समाहित करके इन भाषाओं के भूमंडलीकरण में इनका भी अपना एक अलग योगदान रहा  है. अभी इन्हे चलते रहना है , इनके साथ साथ साहित्य का भी भविष्य उज्जवल होना प्रासंगिक ही होगा. ( टिप्पणीकार , शिव कुमार झा टिल्लू , जमशेदपुर )

1. प्रेम का अदृष्य घरौंदा
रेगिस्तान है जिन्दगी मैं जानता हूं फ़िर भी बालुओं की ढेर पर प्रेम का घरौंदा बनाता हूं टूटता है… फ़िर भी बनाता हूं क्योंकि मैं प्रेमी हूं अमूर्त प्रेम का, निर्माण का समर्पण और सम्मान का..! मेरी अनुभूति प्रेमिका है प्रेमालाप-प्रलाप है खूद रुठता हूं, खुद मनाता हूं दर्द होता है सहलाता हूं मन को बहलाता हूं खूब निरा प्रेम करता हूं, गैर-मौजूदगी उसकी कभी कभी आंधियां भी लाती हैं उन रेतों की ढेर पर मेरा घरौंदा टूटता है पर मैं जुटता हूं बार- बार उठ कर फ़िर भी मैं बनाये जाता हूं प्रेम का अदृष्य घरौंदा..! विस्मय विषाद से दूर आनंद मग्न विकर्षण से अज्ञात आकर्षणरत विरागहीन अनुराग संग प्रेम का अदृष्य घरौंदा..
2. अवला...
परेशानियों के बीच दबी रहती हैं कुछ जिन्दगानियां सुबकती, सिसकती, दुबकती खुद में निर्वाक, बेवस… लाचार.. बहन, बहु, बेटियां… हंसते चेहरों के बीच दफ़्न हो जाती है उनकी तमाम खुशियां, पल पल मिटती रहती सिमटकर उनके अन्दर की दुनियां और वे रह जाती है दबी, उत्पीड़ित, खामोश, अवला... परम्पराओं, सामाजिक मर्यादाओं की खड़ी दीवारों में युगों युगों से कैद होकर…..
3 संबंध-का संधि विच्छेद
गलतफ़हमी से और भी बढती है संवादहीनता… मन के संबंध होते जाते हैं मधुर से विकट कटु और तब हो ही जाता है संबंध-का संधि विच्छेद.. कर्ता और कर्म ही हैं वे कारक बन जाते हैं जो अकर्मक क्रिया विक्षोभ, सम्मान सर्वनाम बदल जाते हैं संज्ञा अनजान में, लगे रहते चेहरों पर हमेशा विस्मयादिबोधक चिह्न ! मन ही मन व्यग्र, उठती रहती है वेदना विरह की, हॄदयाघात और तीव्र पश्चाताप की… अन्तत: विद्रुपित, विरुपित हो जाता है प्रगाढ संबंध का, अन्तर्मन का सहज सुन्दर व्याकरण…
4 . तुम ही तो हो….
गहरी चेतना की धरातल पर मेरा तन मन तुझसे लिपटकर दुनिया की संवेदनशून्यता, संबंधहीन रीतियों से निपटना चाहता है, तुम्हारे स्पर्श से मेरे अन्दर का हर्षाकाश, इसका हर आयाम विलक्षण और विराट होता जा रहा है… मेरे अन्दर की दुनिया दीवारयुक्त बाहरी दुनिया से कहीं दूर है जहां कोई भी रस्म ओ रिवाज अपनी काली नजर नहीं डाल सकती कभी भी, मेरे अन्तर्मन में रचित उस सनातन प्रेम को छू नही सकती… मेरे पास जज्वात का समन्दर है मेरे हिम- समान हृदय में हर पल मेरी शक्तियां, मेरा अस्तित्व गोता लगा रहा है, हर डुबकी के साथ निखरता जा रहा है स्वच्छ, कोमल, निर्मल, शीतल एहसास! जितनी बार समझने की कोशिश करता हूं बस उलझता ही जा रहा हूं लेकिन इस उलझन में भी सुलझा हुआ है यह प्यारा एहसास जो मुझे बहुत कुछ समझा रहा है- दुख-सुख सम्मिश्रित जीवन की इस अबूझ समझ में मैं अपना सब कुछ जो दुखद है अब भूलता हुआ महसूस कर रहा हूं मेरे पास, मेरे सामने, मेरे अन्दर सिर्फ़ तुम हो, सिर्फ़ तुम तुम्हारी मौजूदगी, तुम्हारा एहसास, तुम्हारी धड़कन की आवाज मुझसे कुछ कह रही है…. सुनसान अन्धेरों में तुम्हारी मौजूदगी जिन्दगी की रंग विरंगी रोशनी को असीम ऊर्जा और उजाला देती नजर आ रही है, मेरी रूह, मेरी मौजूदगी, मॆरी रोशनी में हर क्षण तुम ही तो हो अनवरत समस्त कायनात लेकर सतत विराजमान….!
5. जरा सोच के देखो !
न चाहते हुए भी निकल जाती हैं कुछ बातें अनायास ही जो नहीं निकलनी चाहिए इस नन्हे दिल से क्योंकि… अपनत्व के समन्दर में खींच नहीं पाता हूं मैं सीमा की रेखाएं जड़ - जंगम मर्यादा का कोई दायरा… भले तुम्हें बुरा लगे मुझे कुछ भी बुरा नहीं लगता मैं जानता हूं कि यह गलत है लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि मैं गलत नहीं हूं… तुम्हारे पास है सच्चाई का साफ़ आइना जिसमें उतार कर तुम देख लेना मुझे मगर प्यार से... मैं जैसा हूं असल में वैसा ही नजर आउंगा तुम्हें!
भास्करानन्द झा भास्करपरिचय : 
भास्करानन्द झा भास्कर कवि व् लेखक
निवास :- कोलकाता
सम्पर्क : -  09432386278
ई मेल :- bhaskaranjha@gmail.com

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Nishikant Thakur, says on January 9, 2015, 10:06 PM

सभी संकलित कविताएँ अंतरतम में विक्षोभ पैदा कर रही है। बीना किसी प्रतिफल की आशा में उद्दात प्रेम विस्तृत होते हुए सभी कुछ आच्छादित कर लिया है जहाँ सभी जड़-चेतन, राग-विराग,रूप- अरूप.......... अपनत्व के धरातल पर एकरस हो उठा है। बहुत सुन्दर।

neelmadhav chaudhary, says on January 9, 2015, 6:09 PM

मेरे अन्दर का हर्षाकाश, इसका हर आयाम विलक्षण और विराट होता जा रहा है… मेरे अन्दर की दुनिया दीवारयुक्त बाहरी दुनिया से कहीं दूर है जहां कोई भी रस्म ओ रिवाज अपनी काली नजर नहीं डाल सकती कभी भी, -All the poems are very lovely and heart touching. i find yours english works most impressive.