Thursday, November 21st, 2019
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मनुष्य को अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो मशीनों पर अति निर्भरता से बचना होगा

 

आई एन वी सी न्यूज़ 
नई  दिल्ली ,  

जयपुर के जेईसीआरसी इंजीनियरिंग कॉलेज में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस को ओनलाइन संबोधित करते हुए अपने कीनौट स्पीच में, आई एल ओ (यूनाइटेड नेशंस)के अंतरराष्ट्रीय परामर्शक सूचना तकनीकी एवं स्वच्छ भारत अभियान के राष्ट्रीय ब्रांड एंबेसडर डॉ डीपी शर्मा ने कहा कि " विज्ञान एवं तकनीक का विकास पीछे तो नहीं जा सकता परंतु इसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए मनुष्य को स्वय़ं को री-इंवेंट करना होगा। उन्होंने कहा कि पिछले 60 साल में आदमी ने आरामदेह यानी कंफर्ट जोन में रहना सीख लिया है और श्रम की महत्ता के विरुद्ध अपनी क्षमताओं को मशीन में रूपांतरित कर खुद को उन पर आश्रित बना लिया है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि आने वाले कल में यही मशीनें इनके जन्मदाता मनुष्य का रोजगार एवं चैन छीन लेंगी । उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के लिए तैयार की जाने वाली एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा के इस संदर्भ में दुनिया के वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ एवं समाज विज्ञानी बहुत चिंतित हैं। इन मशीनों यानी रौबोट्स से मानव को स्वयं प्रतिस्पर्धात्मक रूप में आगे बढ़ने के लिए काम करना होगा, खुद को तैयार करना होगा। डॉ डीपी शर्मा कहा कि विज्ञान एवं तकनीक का यह द्रुतगामी विकास पीछे कभी नहीं जाएगा। सिर्फ और सिर्फ मनुष्य को ही अपने अस्तित्व एवं अपनी महत्ता को बचाए रखने के लिए शोध एवं इन्वेंशन के माध्यम से रीइनन्वेट करना होगा, अपनी कैपेबिलिटीज बढ़ानी होंगीं। उन्होंने चीन की फॉक्सकॉन कंपनी का उदाहरण देते हुए कहा कि किस प्रकार एक रात में 60000 तकनीकी कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। उनकी जगह 600 रोबोट्स लगा दिए गए । चिंता की बात तो यह है कि रोबोट्स ने कंपनी की उत्पादन क्षमता 200% बढ़ा दी व डिफेक्ट रेट 78% कम हो गई । उन्होंने कहा कि कोई भी बिजनेसमैन या उद्योगपति सिर्फ सेवा कल्याण को नहीं वल्कि मुनाफे एवं उत्पादकता को प्राथमिकता देते हैं।
उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति 24 घंटे सतत काम नहीं कर सकता परंतु मशीनें कर सकती हैं । उन्होंने कहा कि मशीनें मनुष्य से ज्यादा ईमानदार हैं क्योंकि ना उनका कोई रिश्तेदार ना कोई दोस्त। और मशीनें बिना थके घंटो तक बेहतर दक्षता से काम कर सकती हैं। उन्होंने मार्टिन फोर्ट द्वारा लिखित पुस्तक राइज ऑफ द रोबोट्स टेक्नोलॉजी एंड द थ्रेट ऑफ ए जॉबलेस फ्यूचर का उदाहरण देते हुए कहा कि इन हालातों में सरकारों को स्किल्ड मैन पावर यानी इंजीनियर के लिए मनरेगा जैसी स्कीम चलानी होगीं, भविष्य में यदि मनुष्य ने खुद को नहीं संभाला तो। मनरेगा जैसी योजनाओं में श्रम तो होगा परंतु श्रम का कोई महत्व नहीं होगा जैसे 10 पेज कंप्यूटर पर टाइप करो शाम को डिलीट करो मेहनताना लो और घर जाओ। उन्होंने कहा कि आज ऑटोमेशन एवं डिजिटलाइजेशन एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं जहां से रोजगार पैदा होने की संभावना एक्स्पोनेंशियली कम होती चली जा रही है। उन्होंने कहा कि आज डॉक्टर अपनी मानवीय इंस्टिंक्ट को खोते जा रहे हैं । डॉक्टर सिर्फ मशीनों द्वारा जांच के डाटा प्वाइंट्स पर एनालिसिस कर पेशेंट का इलाज करते हैं । जबकि उनके दिमाग की जो क्षमता है वह किसी भी मशीन की क्षमता के डाटा पॉइंट से ज्यादा होनी चाहिए थी और है भी परंतु अतिवादी समर्पण हमें हमारी क्षमताओं के विपरीत ले जा रहा है और मशीनें हम पर हावी होती चली जा रही हैं।आज डाटा प्वाइंट्स यानी जांच विन्दु आंकड़े के आधार पर बनी रिपोर्ट गलत हुई तो डॉक्टर अपनी इंस्टिंक्ट का इस्तेमाल ना करते हुए उसी डाटा प्वाइंट्स को फॉलो करता है और ट्रीटमेंट करता है जिससे ट्रीटमेंट के खतरे की संभावना कम ना होकर ज्यादा होती है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने अस्तित्व को बचाए रखना है तो उसे अपनी मशीनों पर अति निर्भरता से बचना होगा।

 

 




 

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