अबके हम बिछड़े तो...

Mehdi Hasan articles, articles on Hassan Mahdi, Mahdi Hassan article- संजय रोकड़े -

राजस्थान की मिट्टी से उठी पुरसुकून आवाज ने भारत-पाक ही नही बल्कि अनेक देशों की सरहदें पार करके तमाम अवाम के दिलों में दशकों राज किया। यह थी खुदा की आवाज, शहंशाह ए गजल, मेंहदी हसन की आवाज। तीन दशक तक दिलों को धडक़ाने वाली यह आवाज जब खामोश हुई तो लगा गजल उदास हो गई। आज से ठीक तीन बरस पहले 30 जून 2012 को वे कराची के आगा खान अस्पताल में हमे छोडक़र चल बसे। वह 85 वर्ष के थे अंतिम समय में उन्हें फेफड़ों का संक्रमण हो गया था, पेशाब में खून भी आने लगा था और एक के बाद एक अंगों ने काम करना बंद कर दिया और इस तरह गजल से ‘मेंहदी’ का रंग उतर गया। गजल आज भी गाई जाती है लेकिन अब उनमें मेंहदी की रंगत नही होती है। मेहंदी हसन ने अपनी गायिकी से गजल की दुनिया में एक अलग ही पहचान बना रखी थी।

लेकिन 18 जुलाई को उनको याद न करना हमारे लिए दुर्भाग्यपूर्ण हीहोगा। राजस्थान के लुणा में सन 1927 को इसी दिन उन्होंने जन्म लिया था। वे आज भले ही हमारे बीच नही है लेकिन जब उनके नग्मों की बात होती है तो यकीन मानिए... वो हमारे दिलों में जिंदा हो उठते है। आ मुझे फिर से छोड़ जाने को आजा...रंजिश ही सही दिल को दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ। हसन साहब भले ही हमें इस दुनिया से अलविदा कर गए हो लेकिन उनकी यह गजल हमारे दिलों में उनको हमेशा जिंदा रखेगी। उनकी याद ताजा बनाए रखेगी।

   एक कहावत मुझे याद है - किसी कलाकार की कला की दिल खोलकर तारीफ करने वाला व्यक्ति एक कलाकार न होते हुए भी कलाकार से कम नहीं होता। हसन साहब एक ऐसे ही व्यक्त्तिव के धनी रहे है। एक तरफ तो उनमें किसी दूसरे गजल गायक को सुनने का उत्साह एक कला प्रेमी की तरह रहा, और दूसरी तरफ बतौर गजल गायक उनकी प्रतिभा-नि:संदेह महानतम और सर्वश्रेष्ठ। आज इस बात का बेहद रंज है कि गजल को दिलोजान से चाहने और समझने वाला एक शहंशाह-ए-गजल हमारे बीच नहीं है। अब उनके जैसी प्रतिभा दुनिया में शायद ही देखने को मिले। आखिर वे शहंशाह-ए-गजल क्यों कहे जाते हैं। वे हर समय गजल में डूबे रहते थे। उनका चेहरा ही बता देता था कि वे गजल और शेरों-शायरीं में कितने गहरे डूबे हुए रहते थे... हर वक्त शायराना मिजाज और गायकों वाली भाव-भंगिमा। काबिलेगौर हो कि हसन साहब भारत-पाकिस्तान के बीच अमन और शंाति के लिए भी काफी चिंतनरत रहा करते थे। हसन साहब ने अपने जीवन में जितने भी नगमे पेश किए उनमें, पाया कि एक न एक गजल तो ऐसी होती ही थी, जो दोनों मुल्कों के प्रति यदा-कदा उत्पन्न वाले तनावों का दर्द बयां करती थी और दोनों को आपसी मेल-जोल कायम रखने के लिए समझाइश देती थी। ऐसी एक गजल मुझे याद है, जो अहमद फराज साहब ने लिखी थी और जिन्हें वे खूब गाया करते थे - किस किस को बताएंगे जुदाई का सबब हम, तू मुझसे खफा है तो जमाने के लिए आ जा। वे अक्सर डॉ. बशीर बद्र की उस गजल को भी गुनगुनाया करते-उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, ना जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए। उनकी इस तरह की जिंदा दिल गजलों से, यह विचार आना सहज है कि हसन साहब न केवल गायिकी बल्कि अमन के लिए भी समर्पित इंसान थे।

शहंशाह-ए-गजल मेंहदी हसन खान सिर्फ पाक में ही नहीं, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप में गजल गायिकी के पैरोकार थे। उन्हें जितने दिल और जतन से पाक में सुना जाता था, उतने ही शिद्दत से भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और बर्मा में भी सुना जाता था। वैसे उनकी आवाज में राजस्थान की मिट्टी की सौंधी खुशबू थी जो सबको जोड़ देती थी। उनने गायकी की शुरूआत टुमरी से की थी क्योंकि उस दौर में गजल गायन में उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुख्तार बेगम का नाम चलता था। धीरे-धीरे वह गजल की ओर मुड़े और उनके फन की ही ये काबिलियत थी कि उन्हें शहंशाह ए गजल कहा जाने लगा। हसन साहब ने गजल को बेजोड़ अल्फास दिए। मुझे नहीं लगता कि कोई गायक गजल को उनके जैसे अल्फास अदा कर पाएगा। उनकी आवाज का जादू इस कद्र था कि चाहे वे रात भर क्यों न गा ले, एक भी श्रोता उठकर प्रोग्राम को बीच में छोडक़र जाने का विचार भी नहीं करता था। यकीन मानिए उनको सुनने के बाद ऐसा महसूस नहीं होता कि गजल को सुन रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता था कि गजल को महसूस और किसी चित्रकथा की भांति देख रहे हैं। गजल को रूप और आकार देने का जो हुनर मेंहदी हसन साहब के पास था, वो दुनिया में किसी के पास नहीं हैं। उनकी गजलों को सुनते वक्त ऐसा लगता था कि गजल से रूबरू हो रहे हैं। बेगम अख्तर के बाद सिर्फ और सिर्फ मेंहदी हसन का नाम ही पूरी दुनिया में गजल सम्राट के रूप में विख्यात है। मेहंदी साहब न केवल एशिया, बल्कि पश्चिमी देशों में भी काफी लोकप्रिय हुए थे। एक बार उनके शिष्य अफजल सुभानी टोरंची में थे, तो उन्हें एक कालोनी में अपने गुरू की आवाज सुनाई दी। सुभानी आश्चर्यचकित रह गये, क्योंकि जिस इलाकें से ये आवाजे आ रही थी, वहा एशियाई मूल का कोई बाशिंदा नही रहता था। उन्हें ढूढना शुरू किया, तो सामने आया कि एक महिला उनके रिकार्ड सुन रही है। महिला ने बताया कि एक दिन वह एक देसी बाजार में गयी थी, तभी उसे किसी गाने की आवाज सुनाई दी, हालांकि भाषा समझ नहीं आई, पर आवाज से मत्रमुग्ध होकर उसने दुकान से वो रिकार्ड खरीद लिये। यह अनुभव मेंहदी साहब की आवाज का जादू बयां करता हैं। हालाकि उनकी आवाज का यह जादू 16 पीढिय़ों की साधना का कमाल था। वे अक्सर कहा करते थे कि उनका परिवार 16 पीढिय़ों से गायन कर रहा है और उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा इस्माईल खान पारंपारिक ध्रुपद गायक हुआ करते थे। खुद मेंहदी ने 20 बरस की उम्र में स्टेज शो देने शुरू कर दिया था।

20 साल की उम्र में पाक में बसने वाले मेंहदी साहब की माली हालत बेहद खराब थी। पाक में बसने पर उनके परिवार के पास हमेशा पैसों की तंगी रहती थी। इससे उबरने के लिए मेंहदी साहब ने एक साइकिल की दुकान पर नौकरी भी की, जहां वो साइकिलें सुधारते थे। इसके बाद उन्होंने ट्रैक्टर के इंजन सुधारने का भी काम किया। हसन साहब वैसे तो हिन्दुस्तान की माटी में पैदा हुए, लेकिन सियासी मजबूरियों के चलते बंटवारें के बाद उन्होंने पाक से नाता जोड़ लिया। जहां उन पर दुखों का पहाड़ टूटा, पर इस दौरान भी उन्होंने संगीत नहीं छोड़ा। मेहंदी साहब लगातार गायन करते रहे, बाद में उन्हें 1957 में रेडियो पाकिस्तान में पहली बार ठुमरी गाने का मौका दिया गया। इस मौके ने उनकी आवाज को आम आवाम के बीच लोकप्रिय कर दिया। फिर रेडियो पर गजल गाने की शुरूआत की। इसके बाद उनकी गजल गायकी का वो रंग जमा कि उनके जाने के बाद भी लोगों के दिलों दिमाग से उतरने का नाम नही ले रहा है।

भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर और पुरसुकून आवाज के मालिक मेंहदी हसन साहब की आवाज कभी मिल न सकी। दरअसल दोनों ही कलाकार एक दूसरे के साथ गाने के तम्मनाई थे, पर ऐसा मौका न आ सका। पर फिर भी आधुनिक तकनीक की मदद से ऐसा संभव हो पाया और 2010 में एचएमवी ने दोनों का डुएट साग तेरा मिलना मुझे अच्छा लागे है.. लता जी के एल्बम सगहदें में रिलीज किया। इस गीत को खुद हसन साहब ने तैयार किया था और 2009 में अपने हिस्से की रिकार्डिंंग कर इसे लताजी के पास भेज दिया था। बाद में लताजी के हिस्सें की रिकार्डिंग की गई और फिर अक्टूबर 2010 में इसे एल्बम में रिलीज किया गया। यह एक अलग बात है कि इस गाने के लिए दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई।

मेहंदी साहब के जाने के बाद लता ने कहा कि यह मेरा दुर्भाग्य था कि जब वो स्वस्थ थे और गाते थे, तब मैं उनके साथ गा नहीं सकी। एक मौके पर लता ने हसन की आवाज को खुदा की आवाज भी कहा था।  हसन साहब ने सन1978 में अटल बिहारी वाजपेयी के आवास पर भी अपनी प्रस्तुति दी है। उस दौरान अटल जी विदेश मंत्री थे। हसन की गायन की शैली धुपद, खयालात राजस्थानी लोक संगीत का मिलाजुला रूप थी। मेंहदी हसन साहब ने जब अपनी गायिकी का सफर शुरू किया, तब पाकिस्तान में गजल गायक उतने अधिक नहीं थे। पर उनकी गायिकी ने पाकिस्तान में गजलों की एक नई परंपरा की नींव डाल दी थी। मेंहदी साहब ने न केवल गजलें, वरन पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री, बालीवुड को भी अपनी महान आवाज से धन्य कर दिया। ये मुकाम उन्हें इतनी आसानी से नही मिला है जितना हम सोचते है। मेंहदी साहब ने ये जो मुकाम हासिल किया था उसे पाने में बड़ा संघर्ष और अनेक दुख तकलीफों का सामना करना पड़ा था। संघर्षों में तप-तप कर वे हमें सुकुन की आवाज तो दे गए लेकिन अब चुपके से हमशे दूर कहीं दुर चले गए है।

सम्मान

अयूब खान ने हसन साहब को तमगा ए इमतियाज। जनरल जिआ उल हक ने प्राइड ऑफ परफार्मेस। जनरल परवेज मुशरर्फ ने हिलला ए इमतियाज से सम्मानित किया। निगार एंड ग्रेजुएट अवार्ड भी मिला। 1979 में भारत में सहगल पुरस्कार। 1983 में नेपाल में गोरखा दक्षिण बहु पुरस्कार।

चंद धडक़ती गजलें आज तक याद है वो प्यार का मंजर... दुनिया किसी के प्यार में जन्नत से कम नही... अपनों ने गम दिए याद आ गए... जिंदगी में तो सभी प्यार करते हैं... चराग-ए-तूर जलाओं बड़ा अंधेरा है... मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे है... मै नजर से पी रहा हूं... गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं... ये रोशिनियों के शहर... पत्ता-पता, बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है... जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं... सनुहरी आवाजों का एकमात्र नगमा तेरा मिलना बहुत अच्छा लागे हैं, मुझे तू मेरा दुख जैसा लागे है। चमन सारा कहे है फूल जिसको, मेरी आंखों को तेरा चेहरा लागे है। ये तेरा आलम है के जिंदगी है, तुझे छू लूं तो दिल जिंदा लागे है। रंगो में तेरी ख्याहिश बह रही है, जमाने को वो लहू दिल का लागे है। मुझे तू मेरा दुख जैसा लागे हैं, तेरा मिलना बहुत अच्छा लागे हैं।

कुछ लजवाब एलबम्स

1. कहना उनसे, 2. नजराना, 3. लाइव ऑफ रॉयल अल्बर्ट हॉल, 4. अंदाज ए मस्ताना, 5. दिल जो रोता है, 6. गालिब गजल, 7. गोल्डन ग्रेट्स, 8. खुली जो आंख, 9. मेंहदी हसन, 10. सदा ए इस्क, 11. शरहदें, 12. सुर की कोई सीमा नहीं, 13. द फाइनेस्ट गजल्स, 14. द लीजेंट्स, 15. तर्ज, 16. लाइव कसर्ट इन इंडिया।

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संजय रोकड़े
पत्रकार ,लेखक व् सामाजिक चिन्तक

लेखक पत्रकारिता से सरोकार रखने वाली पत्रिका मीडिय़ा रिलेशन का संपादन करने के साथ ही सम-सामयिक मुद्दों पर स्वतंत्र रूप से लेखन करते है।

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