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Saturday, October 24th, 2020

आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भूमि पर खड़ा होता भारत- भारत बोध पर विशेष लेख

- डॉ. सौरभ मालवीय -

invc-news-indiaयह एक सुखद संयोग है की भारतीय दृष्टि से अब भारत को समझने की कोशिश की जारही है निश्चित ही इस विमर्श से भारत अपने गौरव पूर्ण अतीत को सजोकर नए पथ का सृजन करेगा।

भारत की आत्मा को समझना है तो उसे राजनीति अथवा अर्थ-नीति के चश्मे से न देखकर सांस्कृतिक दृष्टिकोण से ही देखना होगा भारतीयता की अभिव्यक्ति राजनीति के द्वारा न होकर उसकी संस्कृति के द्वारा ही होगी तभी हम पुनः भारत को विश्व में प्रतिष्ठापित कर पायेंगे। इसी भावना और विचार में भारत की एकता तथा अखण्डता बनी रह सकती है। तभी भारत परम वैभव को प्राप्त कर सकता है।

‘‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’’ पहेली है, यक्ष-प्रश्न है। सिर्फ भारत ही नहीं है, जो नहीं मिटा है। नहीं मिटने वाले ंअर्थात कायम रहने वाले और देश भी हैं चीन है, यूनान है, रोम है, बेबीलोन है, ईरान है। ये देश कायम तो हैं लेकिन क्या भारत की तरह कायम हैं? क्या ये हिंदोस्तां की तरह कायम हैं? शायद नहीं है। इसीलिए इकबाल ने कहा है कि अगर वे कायम हैं तो भी सिर्फ नाम के लिए कायम हैं। उनकी हस्ती तो मिट चुकी है। उनकी मूल पहचान नष्ट हो चुकी है। इन पुरानी सभ्यताओं को समय ने इतने थपेड़े मारे हैं कि उनका सातत्य भंग हो चुका है। जिसे कहते है, परंपरा, वह धागा टूट चुका है। परिवर्तन ने परंपरा को परास्त कर दिया है। कुछ देशों ने अपना धर्म बदल लिया कुछ ने अपनी भाषा बदल ली, कुछ ने अपना नाम बदल लिया और कुछ ने अपनी जीवन-पद्धति ही बदल ली। परिवर्तन की आंधी ने परंपरा के परखचे उड़ा दिए। यह ठीक हुआ या गलत, यह एक अलग प्रश्न है घ् लेकिन भारत में ऐसी क्या खूबी है कि परंपरा और परिवर्तन यहां कंधे से कंधे मिलाकर आगे बढ़े जा रहे हैं नित्य. नूतन सृजन की गर्भ-स्थली बन गई है।

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ को चरितार्थ करने वाली भारतीय संस्कृति है और विश्व के तमाम देश अनेक संस्कृतियां और जातियां उसके पुत्र-पुत्री, पोता-पोती की तरह है। घर सबका यही था, भाषा सबकी भिन्न जरूर थी, संस्कृति यहीं की थी जो कालांतर में बदलते-बदलते और बढ़ते-बढ़ते अनेक रूप और प्रकारों मंे उसी तरह हो गई जैसे आस्ट्रेलियाई मूंगों की तरह दूर-दूर फैली हुई चट्टानें।

विश्व के अनेक विद्याविदों, दार्शनिकांे, वैज्ञानिकों और प्रतिभावानों ने भारत के समर्थ को सिद्ध किया है। किसी ने इसे ज्ञान की भूमि कहा है तो किसी ने मोक्ष की, किसी ने इसे सभ्यताओं का मूल कहा है तो किसी ने इसे भाषाओं की जननी, किसी ने यहां आत्मिक पीपासा बुझाई है तो कोई यहां के वैभव से चमत्कृत हुआ है, कोई इसे मानवता का पालना मानता है तो किसी ने इसे संस्कृतियों का संगीत कहा है। तप, ज्ञान, योग, ध्यान, सत्संग, यज्ञ, भजन, कीर्तन, कुम्भ तीर्थ, देवालय और विश्व मंगल के शुभ मानवीय कर्म एवं भावों से निर्मित भारतीय समाज अपने में समेटे खड़ा है इसी से पूरा  भू-मण्डल भारत की ओर आकर्षित होता रहा है और होता रहेगा। भारतीय संस्कृति की यही विकिरण ऊर्जा ही हमारी चिरंतन परम्परा की थाती है।

विश्व सभ्यता और विचार-चिन्तन का इतिहास काफी पुराना है। लेकिन इस समूची पृथ्वी पर पहली बार भारत में ही मनुष्य की संवेदनाओं चिंतन प्रारंभ किया भारतीय चिंतन का आधार हमारी युगों पुरानी संस्कृति है। भारत एक देश है और सभी भारतीय जन एक है, परन्तु हमारा यह विश्वास है कि भारत के एकत्व का आधार उसकी युगों पुरानी अपनी संस्कृति में निहित है- इस बात को न्यायालयों ने उनके निर्णयों में स्वीकार किया है। सांस्कृतिक चिंतन  एक आध्यात्मिक अवधारणा है और यही है भारतीय का वैशिष्ट्य। राष्ट्र का आधार हमारी संस्कृति और विरासत है। हमारे लिए ऐसे राष्ट्रवाद का कोई अर्थ नहीं जो हमे वेदांे, पुराणों, रामायण, महाभारत, गौतमबुद्ध, भगवान महावीर स्वामी, शंकराचार्य, गुरूनानक, महाराणा प्रताप, शिवाजी महाराज, स्वामी दयानन्द, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और असंख्य अन्य राष्ट्रीय अधिनायकों से अलग करता हो। यह राष्ट्रवाद ही हमारा धर्म है।

दिल्ली में आयोजित 23.25 फरवरी 2017 अंतर्राष्ट्रीय संविमर्श भारत बोध का यही निहतार्थ है  भारतीय शिक्षण मंडल द्वारा आयोजित विमर्श में धर्म.संस्कृतिएज्ञान.विज्ञानं एकलादृष्टिए विश्व दृष्टि एसमुत्कर्ष एवं सर्वविद्या जैसे मौलिक विषयों पर विद्वानों का विमर्श होगा इस आयोजन का उदघाटन भारत के माननीय राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी एवं मानवसंसाधन मंत्री श्री प्रकाश जावडेकर करेंगे।

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drsaurabhmalviaपरिचय – :
डॉ. सौरभ मालवीय
संघ विचारक और राजनीतिक विश्लेषक

उत्तरप्रदेश के देवरिया जनपद के पटनेजी गांव में जन्मे डॊ. सौरभ मालवीय बचपन से ही सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र-निर्माण की तीव्र आकांक्षा के चलते सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए है. जगतगुरु शंकराचार्य एवं डॊ. हेडगेवार की सांस्कृतिक चेतना और आचार्य चाणक्य की राजनीतिक दृष्टि से प्रभावित डॊ. मालवीय का सुस्पष्ट वैचारिक धरातल है. ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मीडिया’ विषय पर आपने शोध किया है. आप का देश भर की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन जारी है. उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी किया जा चुका है, जिनमें मोतीबीए नया मीडिया सम्मान, विष्णु प्रभाकर पत्रकारिता सम्मान और प्रवक्ता डॊट.कॊम सम्मान आदि सम्मिलित हैं.

संप्रति-  : सहायक प्राध्यापक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्ववविद्यालयए नोएडा
मोबाइल: 08750820740 , ईमेल- malviya.sourabh@gmail.com , drsourabhmalviya@gmail.com
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