– सुनील दत्ता – 

सुनील-दत्ताsunilduttaवर्तमान शिक्षा प्रणाली के औपनिवेशिक गुलामी के दौर की शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी भाषा को सर्वोच्च महत्व दिए जाने के बाद भी मातृभाषा को आज जैसा उपेक्षित नही किया गया था | 1854 में औपनिवेशिक शिक्षा के ढाचे के समूची रूप – रेखा को प्रस्तुत करते हुए ‘ बुड्स – डिस्पैच ‘’ के जरिये इस बात की जोरदार सिफारिश की गई थी कि प्राथमिक स्तर पर बच्चो को उनकी मातृभाषा में ही शिक्षा दी जानी चाहिए | इसी सिफारिश के आधार पर विकसित किये गये शिक्षा प्रणाली में यही काम तब से लेकर 1980 तक चलता रहा | लेकिन अब उसे भी साजिश के तहत बदला जा रहा है समाप्त करने का पूरा षड्यंत्र किया जा रहा है ताकि शिक्षा कारपोरेट घरानों के पास सुरक्षित हो और देश का आम आदमी बस मजदुर बन कर जिए उससे उसके शिक्षा का मौलिक अधिकार ही छिनने की कोशिश जारी है |

1905 अंग्रेज शासको द्वारा बंगाल के विभाजन के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्द राष्ट्रवाद की प्रचण्ड लहर पूरे देश में बढने लगका था |

उस राष्ट्रवादी आन्दोलन में बालगंगाधर तिलक के नेतृत्व में स्वराज , विदेशी सामानों का बहिष्कार करने के साथ ही स्वदेशी का अंगीकार के नारों – आंदोलनों के साथ ही राष्ट्रीय – शिक्षा का भी ( नारा ) आन्दोलन जोर पकड चुका था |

उस दौर की राष्ट्रीय व राजनितिक आर्थिक मांगो के साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा की मांग पूरी तरह मुखर हो चुकी थी |

इसका मुख्य कारण कि अंग्रेज शासको द्वारा अंग्रेजी व आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अंतर्गत देश की गुलामी और स्वतंत्रता के बाबत कोई चर्चा नही थी | उसके विपरीत उस समय ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली के जरिये औपनिवेशिक लूट – दमन एवं अत्याचार पर पर्दा डालते हुए यह पाठ निरंतर पढाया जाता रहा कि अंग्रेजी राज इस देश का पिछडापन दूर करके उसके आधुनिक विकास का काम कर रहा है | उनके द्वारा संचालित शिक्षा प्रणाली से मुकी दिलाने तथा अंग्रेजी एवं आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा ज्ञान को फैलाने का कार्य कर रही है |

इसके विपरीत उस समय के राष्ट्रवादियो द्वारा कही गई बाते सभी लोग जानते है कि अंग्रेजो की इस शिक्षा प्रणाली का वास्तविक लक्ष्य अंग्रेजी राज के लिए काम करने वाले अफसरों , कर्मचारियों तथा उसकी हिमायत करने वाले विभिन्न पेशो के शिक्षित वर्गो को खड़ा करना था | स्वाभाविक  था कि इस शिक्षा का उद्देश्य इस राष्ट्र व समाज के हितो के प्रति जागरूक एवं प्रतिबद्द नागरिको को खड़ा करना नही बल्कि शिक्षित होकर स्वंय के निजी हितो स्वार्थो को पूरा करने के साथ अंग्रेजी राज व अंग्रेजी शिक्षा –संस्कृति के प्रशंसको व समर्थको की फ़ौज खड़ा करना था | ‘’लार्ड मैकाले ‘’ द्वारा अंग्रेजी व आधुनिक शिक्षा को इस देश में बढावा दिए जाने की घोषणाओं में इस उद्देश्य को स्पष्ट घोषित भी किया गया था |

अंग्रजी सरकार द्वारा संचालित शिक्षा प्रणाली इसी लक्ष्य के अनुसार 1835 से लेकर 1947 तक काम करती रही | हालाकि इस शिक्षा प्रणाली के जरिये भी अंग्रेजो के समर्थक प्रशंसक हिस्सों के साथ आधुनिक शिक्षा प्राप्त लोगो की एक ऐसी जमात भी खड़ी होती रही , जो अंग्रजी राज का सेवक बनने और इस राष्ट्र को लूटने और परतंत्र बनाने में उनका भागीदार बनने का घोर विरोधी था |

ऐसे शिक्षित राष्ट्रवादियो ने ही आधुनिक युग के प्राकृतिक एवं सामाजिक शिक्षा के विभिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता के तहत अंग्रेजी एवं आधुनिक शिक्षा को स्वीकार करते हुए भी राष्ट्रवादी शिक्षा को बढावा देने का काम किया | इनका मुख्य उद्देश्य मातृभाषा को बढ़ावा देने के साथ राष्ट्र की और जनगण की आवश्यकताओ के अनुसार शिक्षा का बहुआयामी विकास विस्तार करना था | राष्ट्र की स्वतंत्रता प्राप्ति के उद्देश्यों से ब्रिटिश गुलामी के अंतर्गत राष्ट्र के शोषण लूट के साथ उसके दमन दुर्दशा को उजागर करते हुए ब्रिटिश दासता के प्रति विरोध को जागृत करना था | पूरे ब्रिटिश काल के राष्ट्रीय शिक्षा की यह धारा चलती रही हलाकि डी ए वी कालेजो एवं राष्ट्रीय शिक्षा देने के लिए आगे आये अन्य विद्यालयो की थोड़ी सी संख्या के अलावा राष्ट्रीय शिक्षा का आधाभुँत ढाचा मजबूती से नही खड़ा हो पाया |

फलस्वरूप यह राष्ट्रीय शिक्षा की जगह मुख्यत: अनौपचारिक शिक्षा ही बनी रही | इसके वावजूद ब्रिटिश विरोधी स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ – साथ राष्ट्रीय शिक्षा की यह अवधारणा और मजबूत होती रही |

मातृभाषा की शिक्षा को बढावा देने के साथ शिक्षित लोगो में राष्ट्रीय एवं सामाजिक हितो के प्रति जागरूकता एवं प्रतिबद्धता बढाने की शिक्षा देने का काम भी निरंतर होता रहा |

राष्ट्रीय शिक्षा की यह धारा 1947– 50 के बाद सरकारी शिक्षा के रूप में आगे बढाया गक्या | 1947 में स्वतंत्रता के समझौते के बाद अब वह राष्ट्रीय एवं सामाजिक आन्दोलन का हिस्सा नही बना फलस्वरूप अब औपचारिक शिक्षा बनने के बाद भी उसमे पहले जैसी तेजी नही दिखी |

शिक्षा में राष्ट्रीय जागरूकता एवं प्रतिबद्धता के अंतर्निहित उद्देश्य में गिरावट आने लगा |

शिक्षा के क्षेत्र में उन दौर में होते रहे सुधारों तथा मातृभाषा में शिक्षा को बढावा देने के प्रयासों उत्तर भारत में अंग्रेजी हटाओ के आन्दोलनों सुधारों का परिणाम परनिर्भर बनते देश में राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के रूप में नही आ पाया |

उसके विपरीत ऐसे सुधारों आन्दोलनों की धीमी पड़ती दशा – दिशा के साथ 1980–85 में उदारवादी नीति तथा 1986 की नयी शिक्षा नीति के साथ शुरू से ही अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा को बढ़ावा देने का काम शुरू कर दिया गया | राष्ट्रिय शिक्षा के जरिये विद्यार्थियों में मातृभाषा के प्रति और उसके विकास को बढावा देने के साथ राष्ट्रीयता व राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने राष्ट्र एवं समाज के हितो के प्रति जागरूक  एवं प्रतिबद्द बनाने वाले शिक्षा का विकास करने का उद्देश्य अब केवल कभी – कभार के बयानों लेखो तथा शिक्षा व्यवस्था के दिशा – निर्देशन की घोषणाओं तक सिमट गया है |

अंग्रेजी भाषा को अधिकाधिक अपनाने के साथ – साथ विदेशी शिक्षा के बाजारीवादी , निजिवादी उद्देश्यों अर्थात शिक्षा प्रणाली के जरिये लाभ कमाने तथा शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न पेशो में निम्न या उच्च पदों का सेवक बनकर अपने निजी हितो स्वार्थो की अधिकाधिक पूरी करने के उदेश्यों को ही बढावा दिया जा रहा है | 1986 के बाद खासकर डंकल – प्रस्ताव की धारा गेट्स को लागू किये जाने के बाद शिक्षा के कम्प्यूटिकरण अर्थात शिक्षा को यंत्रीकरण , बाजारीकरण निजीकरण के साथ उसके अंतरराष्ट्रीय कारण को खुले रूप में बढावा देने का काम तब से लगातार होता आ रहा है | राष्ट्रीय शिक्षा की प्रणाली का यह नीतिगत एवं अर्थव्यवस्था बदलाव दरअसल विदेशी पूंजी एवं तकनीक पर देश की अर्थव्यवस्था को खुले आम निर्भर बनाई जाती रही उदारीकरणवादी वैश्वीकरणवादी तथा निजीकरणवादी , आर्थिक नीतियों योजनाओं के अभिन्न हिस्से है | इन नीतियों को लागू करने के साथ  जिस तरह राष्ट्र के आत्मनिर्भरता को चर्चा तक से बाहर कर दिया गया | उसे भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में बीते समय की अवधारणा मान लिया गया , उसी तरह से राष्ट्रीय शिक्षा को मातृभाषा को , देश में अपने स्वंय के तकनीकि विकास की वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा को तथा राष्ट्र – समाज के प्रति जागरूक व जिम्मेदार नागरिक बनाने की शिक्षा को अघोषित रूप में बीते समय की अवधारणा अपनाने के साथ – साथ विदेशो में बाजारवादी निजिवादी शिक्षा को अंधाधुंध उच्च वर्गो के लिए स्थापित किया जा रहा है |इसका परिणाम शिक्षा ऐसी बाजारवादी नीजिवादी प्रणाली के विकास – विस्तार में आता रहा है जो अमरीका , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी देशो , उनकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा देश के धनाढ्य उच्च एव बेहतर आय वाले मध्यमवर्गियो के लिए ही उपयोगी है | क्योकि वे ही उसे खरीदने व प्राप्त करने में सक्षम है | देश के मजदूरो , किसानो , एवं अन्य कामो – पेशो से जुड़े जनसाधारण के लिए शिक्षा उनकी पहुच से बहुत दूर होती जा रही है |

इसी के साथ वर्तमान शिक्षा , शिक्षित हिस्सों को राष्ट्र व समाज से उनकी चिंताओं तथा आत्मनिर्भरता विकास के सरोकारों से भी अलग करती चली गई | गौर से देखा जाए तो वर्तमान दौर की यह शिक्षा व्यवस्था ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी के दिनों में संचालित शिक्षा व्यवस्था का नया संस्करण उसे बदतर संस्करण है | इसी;लिए वर्तमान शिक्षा प्रणाली को 1905 के बाद खड़ी होती और कमोवेश 1980 के दशक तक चलती रही राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली को उलटने वाली शिक्षा प्रणाली के साथ विदेशी ताकतों द्वारा निर्देशित शिक्षा भी कहा जाना चाहिए |

इस शिक्षा प्रणाली को राष्ट्र तथा राष्ट्र के जनसाधारण के हितो अनुसार बदलने राष्ट्र की मातृभाषा को महत्व देने राष्ट्र व राष्ट्र के जनगण की आवश्यकतानुसार वैज्ञानिक व समाज शास्त्रीय ज्ञान को विकसित करने का काम अब देश के जनसाधारण हिस्सों एवं उनके प्रबुद्द समर्थको को ही करना पडेगा |

1905 के दौर में खड़ी की गई और स्वतंत्रता आन्दोलन के साथ विकसित होती रही राष्ट्रिय शिक्षा से प्रेरणा ग्रहण करना होगा |

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सुनील-दत्ताsunilduttaपरिचय – :

सुनील दत्ता

स्वतंत्र पत्रकार व समीक्षक
वर्तमान में कार्य — थियेटर , लोक कला और प्रतिरोध की संस्कृति ‘अवाम का सिनेमा ‘ लघु वृत्त चित्र पर  कार्य जारी है

कार्य 1985 से 1992 तक दैनिक जनमोर्चा में स्वतंत्र भारत , द पाइनियर , द टाइम्स आफ इंडिया , राष्ट्रीय सहारा में फोटो पत्रकारिता व इसके साथ ही 1993 से साप्ताहिक अमरदीप के लिए जिला संबाददाता के रूप में कार्य दैनिक जागरण में फोटो पत्रकार के रूप में बीस वर्षो तक कार्य अमरउजाला में तीन वर्षो तक कार्य किया |

एवार्ड – समानन्तर नाट्य संस्था द्वारा 1982 — 1990 में गोरखपुर परिक्षेत्र के पुलिस उप महानिरीक्षक द्वारा पुलिस वेलफेयर एवार्ड ,1994 में गवर्नर एवार्ड महामहिम राज्यपाल मोती लाल बोरा द्वारा राहुल स्मृति चिन्ह 1994 में राहुल जन पीठ द्वारा राहुल एवार्ड 1994 में अमरदीप द्वारा बेस्ट पत्रकारिता के लिए एवार्ड 1995 में उत्तर प्रदेश प्रोग्रेसिव एसोसियशन द्वारा बलदेव एवार्ड स्वामी विवेकानन्द संस्थान द्वारा 1996 में स्वामी विवेकानन्द एवार्ड
1998 में संस्कार भारती द्वारा रंगमंच के क्षेत्र में सम्मान व एवार्ड
1999 में किसान मेला गोरखपुर में बेस्ट फोटो कवरेज के लिए चौधरी चरण सिंह एवार्ड
2002 ; 2003 . 2005 आजमगढ़ महोत्सव में एवार्ड
2012- 2013 में सूत्रधार संस्था द्वारा सम्मान चिन्ह
2013 में बलिया में संकल्प संस्था द्वारा सम्मान चिन्ह

अन्तर्राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मेलन, देवभूमि खटीमा (उत्तराखण्ड) में 19 अक्टूबर, 2014 को “ब्लॉगरत्न” से सम्मानित।
प्रदर्शनी – 1982 में ग्रुप शो नेहरु हाल आजमगढ़ 1983 ग्रुप शो चन्द्र भवन आजमगढ़ 1983 ग्रुप शो नेहरु हल 1990 एकल प्रदर्शनी नेहरु हाल 1990 एकल प्रदर्शनी बनारस हिन्दू विश्व विधालय के फाइन आर्ट्स गैलरी में 1992 एकल प्रदर्शनी इलाहबाद संग्रहालय के बौद्द थंका आर्ट गैलरी 1992 राष्ट्रीय स्तर उत्तर – मध्य सांस्कृतिक क्षेत्र द्वारा आयोजित प्रदर्शनी डा देश पांडये आर्ट गैलरी नागपुर महाराष्ट्र 1994 में अन्तराष्ट्रीय चित्रकार फ्रेंक वेस्ली के आगमन पर चन्द्र भवन में एकल प्रदर्शनी 1995 में एकल प्रदर्शनी हरिऔध कलाभवन आजमगढ़।

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