Sunday, December 8th, 2019

विधायक योग्य होंगे तो सब ठीक होगा

BIHARELECTION,biharchunavinvcnews- संजय स्वदेश - 

बिहार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से पहले ऐसी उम्मीद थी कि इस का चुनाव पंरपरागत मुद्दों को तोड़ेंगे। जाति की बोल मंद पड़ेगी और विकास का मुद्दा तेज होगा। लेकिन उम्मीदवारों की घोषणा होते-होते और प्रचार प्रसार में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति ने एक सकारात्मक उम्मीद पर पानी फेर दिया। बिहार में चुनाव जाति से इतर आधारित हो ही नहीं सकते हैं। जहां जाति बाहुल्य मतदाताओं की अनदेखी कर उम्मीदवार उतरे हैं, वहां जाति को ही मुद्दा बनाकर विपक्ष मैदान में मोर्चो खोले हुए है। हालांकि शुरुआत टिकट के बंटवारे से होती है। बिहार के करीब सभी दलों में यही हाल है। जाति का दंश क्या होता है, यह जाति के छुआछूत और भेदभाव वाले ही समझते हैं। जाति ने अयोग्यता को ढंग दिया। महज जाति विशेष के समीकरण को साधने के लिए मंत्रीमंडल में अयोग्य लोग मंत्री भी बने। निश्चय ही इसका असर बिहार की राजनीति में नाकरा त्मक असर दिखा है।

जाति के नासूर की जड़ बिहार की राजनीति में गहराई तक फैली है। लिहाजा एक -दो बार के चुनाव में यह मिथक टूट जाए और विकास के मुद्दे पर आधारित होकर राजनीति की बयार बह जाए, यह इतना सहज  भी नहीं है। लेकिन पूर्वर्ती चुनावों की तुलना में इस बार के चुनाव में खास बात यह है कि सोशल मीडिया के माध्यम से जागरुकत जनता क्षेत्र के विशेष के उम्मीदवारों पर कहीं न कहीं यह दबाव बनाती नजर आ रही है कि वह अपने एजेंडे को तय करें कि वह जीत के बाद उस विधानसभा में क्या और कैसे करेगा? हालांकि इस बार सोशल मीडिया में स्वत: चली यह मुहिमअब जमीनी हकीकत पर भी थोड़ा बहुत दिखने लगी है। उम्मीदवार जाति समीकरण को ध्यान में रखते हुए स्थानीय मुद्दे पर बात करने लगे हैं। यह बदलाव का प्रथम चरण है, पर सकारात्मक है। परंपरागत मीडिया ने कभी जनता को इस तरह से झकझोर कर उठाने और जागरूकत करने की तैयारी भी नहीं की। पूर्ववर्ती चुनावों में पेड न्यूज का बोलबाला रहा। लेकिन सोशल मीडिया के खुले मंच ने सबकी पोल खोलनी शुरू कर दी है। दूसरी ओर चुनाव आयोग की धीरे-धीरे बढ़ती सख्ती के दबाव में भी बहुत कुछ बदल रहा है। जाति के नाकारात्मक माहौल के बीच धीरे-धीरे इस तरह के सकारात्मक बदलाव भविष्य के कुछ बेहतर होने के सूचक हैं।

जाति आधारित राजनीति पर कुठराघात नहीं होने का एक बड़ा कारण बिहार में मतदान प्रतिशत का कम होना भी है। दूषित राजनीतिक कह कर राजनीति कसे घृणा करने वााले तथा एक मेरे मतदान से क्या होगा कि सोच से मतदान प्रतिशत कम रहा है। इसके अलावा बिहार की एक बड़ी संख्या का पलायन कर बिहार से बाहर जाने का असर भी मतदान पर रहा है। लेकिन इस बार हालात बदलने के आसार है। बिहार के खास पर्व-त्यौहारों के बीच में मतदान की तिथि से शायद फर्क पड़े। दशहरा-दिवाली के लिए प्रवासी लोग जब बिहार लौटेंगे तो निश्चय ही वह मतदान की प्रक्रिया में भी हिस्सा लेंगे। ानता खुद चाहती है कि अब बदलाव हो, इसलिए उम्मीद है कि इस बार मतदान प्रतिशत बढ़ेगा। लेकिन बदलाव का यह नहीं कि किसी दल विशेष की सत्ता उखाड़ कर दूसरे को बैठा देना। विधानसभा स्तर पर निष्क्रिय और जाति की अयोग्य नेताओं को हराना और योग्य तो जीताना ही असली बदलावा होगा। सरकार चाहे किसी की बने। यदि विधायक योग्य होंगे तो निश्चय ही सब कुछ ठीक होगा।

__________________________

Sanjay-Swadesh-Manichhapar-Hathuwa.invc-news1परिचय – :
संजय स्वदेश
वरिष्ठ पत्रकार व विश्लेषक
संजय स्वदेश दैनिक अखबार हरी भूमि में कार्यरत हैं

बिहार के गोपलगंज जिले के हथुआ के मूल निवासी। दसवी के बाद 1995 दिल्ली पढ़ने पहुंचे। 12वीं पास करने के बाद किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक स्नातकोत्तर। केंद्रीय हिंदी संस्थान के दिल्ली केंद्र से पत्रकारिता एवं अनुवाद में डिप्लोमा। अध्ययन काल से ही स्वतंत्र लेखन के साथ कैरियर की शुरुआत। आकाशवाणी के रिसर्च केंद्र में स्वतंत्र कार्य।

अमर उजाला में प्रशिक्षु पत्रकार। सहारा समय, हिन्दुस्तान, नवभारत टाईम्स समेत देश के कई समाचार पत्रों में एक हजार से ज्यादा फीचर लेख प्रकाशित। दिल्ली से प्रकाशित दैनिक महामेधा से नौकरी। दैनिक भास्कर-नागपुर, दैनिक 1857- नागपुर, दैनिक नवज्योति-कोटा, हरिभूमि-रायपुर के साथ कार्य अनुभव। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के अलावा विभिन्न वेबसाइटों के लिए सक्रिय लेखन कार्य जारी…

सम्पर्क – : मोबाइल-09691578252 , ई मेल – : sanjayinmedia@gmail.com
*Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his  own and do not necessarily reflect the views of INVC NEWS.

Comments

CAPTCHA code

Users Comment