शिव कुमार झा टिल्लू की पाँच कविताएँ 

1 संविदात्मक जीवन

हम हो गए संवेदक
जी रहे है जीवन
संविदात्मक जीवन
परन्तु ! संवेदना से दूर
जो लड़े थे विरोधी बनकर कभी
आज बनी उनकी संविद सरकार
एक दूसरे को नाल दिखाकर
कर रहे हैं संविद व्यापार
कैसी हो गयी व्यवस्था
है कोई स्थायी योजन
कोई चिर नियोजन
संविद वीक्षक
संविदपरीक्षक
यहाँ तक की विद्वत मंडली को भी
जनतंत्र के ठेकेदारो ने
बना दिया संविद शिक्षक ..
संग संग हाथ धो लिए
बहती गंगा में
चोरी से अर्जित प्रशिक्षण लिए
चंद चाटुकार …
आज विद्यालय में है सबकुछ
” शिक्षा ” को छोड़कर
घर की भी वही कहानी
आधुनिकता की मनमानी
संविद माँ कर रही स्नेह अर्पण
हो गयी ममता दफ़न
पुत्रधर्म का शमन
कैसे मिलेंगे उस काल कफ़न
मत बनाओ भाड़े की माँ
क्या ममता हो सकती संविद ?
अरे नहीं है कोख में शक्ति
तो दूसरे के नवजात को
दृदय से लगा लो
अपने लिए निष्कंटक बाट बना लो
वह भी रखेगा स्मरण
कर्ण की तरह
सम्पूर्ण राधेय बनकर
कर देगा समग्र समर्पण …
यदि कर सकती सो सृजन
तो मत बेचो ममता को
धाय माँ ! मात्र विवश के लिए
अभागे बालक के लिए
शौक से अपनी ममता को
मत बांटो माँ !
जब तुम भी खोजोगी संविद कोख
कैसे करेगा न्योछावर तेरा लाल
देश पर अपना प्राण !!!
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2 उसे तो नहीं बांटो !

अपना विलग समूह बनाकर
बनो वादी !
जाति-धर्म सम्प्रदाय का
कौन रोक सकता है तुम्हें ?
आखिर तुम्ही तो हो विडंबना
हिदुस्तान के !
बंटाधार ही नहीं कर दिया
चकनाचूर !
मानवीय मूल्य हो गये
ताड़ताड़ !
मैं भी पहले तो दोष मढ़ देता था
नेताओं पर !
लेकिन आज दूर हो गया भ्रम
दो कटे हाथ वाले आगे- पीछेे
चल रहे थे भिखारी बनकर
वहाँ भी सम्बल बौद्धिक वर्ग बन गए
पंथवादी !
बाँट दिया उन बेचारों को
धर्म के धागे से
एक ने की विशेष अनुकृपा
अपने पंथी का
दूसरे ने रखा विशेष ख्याल
अपने सम्प्रदाय के विदूषक का
अरे भाई नेताओं का क्या दोष ?
जब हो गयी है कलुषित
हमारी प्रवृति !
वो तो फायदे उठायेंगें ही ..
स्वयं पंथ जाति सम्प्रदाय का वादी बनो
पर मत बांटों उन लाचारों को
क्योंकि !
संगठन ही है उनकी ताकत
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3 यूनिवर्सल डोनर

बीच सड़क पर कर रहे रहे थे परस्पर वाद-विवाद
दो कट्टर पन्थांध ! अपितु थे दोनों मित्र
अपने ” ऊपरवाले ” के सापेक्ष में !
पीछेे से एक बेउरा कार चालक निकला गया
उन्हें जोरदार धक्के मारकर ..
दोनों को अस्पताल में चाहिए रक्त
एक ही समूह का अमर और आदिल दोनों को
पर देने वाले तब तो कोई उपलब्ध नहीं थे
संयोग से मिला एक सरदार
दोनों में से कोई नहीं थे तैयार
अपने जाति धर्म का खून चाहिए उन्हें
हँसा सरदार ..अरे बन्दे अल्लाह और ईश्वर के
तुम दोनों का समूह है ..”यूनिवर्सल एक्सेप्टर”
मैं तो महज हूँ ..यूनिवर्सल डोनर
सबको देने की लिए
तुम्हे तो बना दिया उसने ” सर्वग्राह्य ”
सबको अपने में स्वीकार कर सकने की क्षमता
उन्हें तो कलंकित नहीं करो भाई ..
तुम दोनों महासागर की तरह हो
सबको समा लो अपने गागर में
चिकित्सक तैयार नहीं था एकवारगी खून चढाने
एक व्यक्ति के रक्त से दो को जिलाने
कर दिया हस्ताक्षर सरदार ने स्मारपत्र पर
कुछ नहीं बिगड़ेगा मेरा क्योकि
मैं हूँ बन्दा नेकी का
जिसे तुम जैसे समझो वैसे पाओगे
हर जगह हर रूप में !
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4 चिर सन्देश

“नवल धवल नव लता वितान
सदा पुलकित हो कांतिल प्राण
प्रतिपल मिले सौरभ -सम्मान
गात -गात में मधुरी मुस्कान
ह्रदय से निकले कोमल तान
मातु पिता -गुरु सृष्टि सम्मान
याम याम में हो शांति बसेरा
नववर्ष सजे खुशियों का डेरा
अपना घर हो या पर परिवेश
पर हिय बसे मातृ -स्वदेश
नहीं किसी से कोई क्लेश
शान्ति अहिंसा चिर सन्देश
गात्र गात्र में नेह की पूजा
रीति के आगे कोई ना दूजा
पात्र पात्र से भाव प्रांजल रख
नित्य जले  मानवधर्म अलख
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5 श्रद्धा -विश्वास

चंद दूरियाँ लिए यह शाब्दिक मित्र
हर विचारमूलक साहित्य में
होते हैं प्रयुक्त …
जैसे विलग गोत्रधारी नरनारी
क्षण में एक संग ध्रुव के आभारी
निशावेला का एकभुक्त
आर्य ब्रह्मदर्शन का सूक्त !
दोनों विरक्त और स्वछन्द
कितने फर्क हैं इनमें
कोई नहीं परस्पर तारतम्य
शब्दांकुर उच्चारण- अर्थ -मूल और भावों में
लेकिन जीवन के गुंथिल उन्मुक्त
रहस्यों में …
रहते हैं जीते हैं
साथ साथ ……
सहचरी दम्पति की तरह
किसी आशु कवि के साधना की तरह
विह्वल वैरागी के आराधना की तरह …
श्रद्धा है…. तुमसे धरती
तुम्ही से आकाश
तुम्हीं से उच्छ्वास
तुम्हीं से विश्वास …
एक के बिना दूजे का कोई मोल नहीं
एक मूक तो परकंठ में बोल नहीं ..
इन पवित्र जोड़ियों का करो आलिंगन
नहीं होगी क्षणिक भी विचलन
इन आरोही -अवरोही जीवन पथ पर
ना भय तुम्हें किसी का !
ना कोई अवसाद
ना कोई अनर्गल लांछना
ना किसी से विवाद
जियोगे उन्मुक्त जीवन
गगन की तरह
पर क्षणिक वायु -बादल का भी नहीं भय
आत्मा का तृण तृण निर्भय
तुम्हारी ही वसुन्धरे
तुम्हारा ही आकाश
मात्र जगा लो अपने विचार से
रीति से व्यवहार से
अपने प्रति लोगों का
नहीं नहीं चलाचल जैव जगत का
‘श्रद्धा और विश्वास ‘
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shiv-kumar-jha-ki-kavitaenSHIV-KUMAR-JHAपरिचय -:
शिव कुमार झा टिल्लू
कवि ,आलोचक ,लेखक

शिक्षा : स्नातक प्रतिष्ठा,: स्नातकोत्तर , सूचना- प्राद्यौगिकी
साहित्यिक परिचय : पूर्व सहायक संपादक विदेह मैथिली पत्रिका (अवैतनिक )

सम्प्रति – : कार्यकारी संपादक , अप्पन मिथिला ( मुंबई से प्रकाशित मैथिली मासिक पत्रिका ) में अवैतनिक कार्यकारी संपादक
साहित्यिक उपलब्धियाँ : प्रकाशित कृति

१ अंशु : मैथिली समालोचना ( 2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली २ क्षणप्रभा : मैथिली काव्य संकलन (2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली )इसके अतिरिक्त कवितायें , क्षणिकाएँ , कथा , लघु-कथा आदि विविध पत्र -पत्रिका में प्रकाशित

सम्प्रति :जमशेदपुर में टाटा मोटर्स की अधिशासी संस्था जे एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड में महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत

वर्तमान पता : जे. एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड ,मैन रोड बिस्टुपुर  ,जमशेदपुर : ८३१००१ संपर्क – : ०९२०४०५८४०३,

मेल : shiva.kariyan@gmail.com

5 COMMENTS

  1. सारी कविताएं समसमायिक विषयों पर वर्तमान की परिस्तिथियों को सपष्ट करती ,, विचारों की गहराई में भावों की प्रधानता कहीं कम नहीं हुई .. बेजोड़ रचनाएं सलाम आपकी सशक्त लेखनी को सम्मानित शिव कुमार झा जी

  2. बहुत खूब! विचारों की गहराई और शब्दों का चयन दोनों ही प्रशंसनीय हैं। संविदात्मक जीवन और यूनिवर्सल डोनर कविताएँ सराहनीय हैं।

  3. कई लोगों को उपयुक्त शब्द खोजने होते हैं लेकिन कुछ सौभाग्यशाली भी होते हैं जिनके सामने शब्द स्वयं आकर खड़े हो जाते – उन्हीं चन्द सौभाग्यशाली की फेहरिस्त में हैं अनुज शिव कुमार। बहुत कमाल का शब्द-भाव संयोजन हर कविता में। ऐसा लगता है कि कविता स्वयं सम्वाद कर रही है – शुभमस्तु

  4. शानदार कविताएँ ,झा जी आपकी आलोचना भी बहुत ही अच्छी होती हैं !

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