कविताएँ

1- घास बेचती औरत

रात के आठ बज चुके हैं
घास बेच रही है एक औरत
गाँधी चौक में
एक छोटा बच्चा
बैठा हुआ है उसकी गोद में
बछ्ड़े की तरह मासूम और खूबसूरत
दो जोड़ा आँखें
इंतजार कर रही हैं
ग्राहक का
आठ के कुछ ऊपर
हो चूका है वक्त
दूध पीकर रजाइयों में दुबक चुके हैं
दुनियाँ के अधिकांश बच्चे
आवारा पशु घूम रहे हैं सड़कों पर
लपक रहे हैं
घास के गठ्ठर की तरफ
घर जाने को बेचैन बच्चा
बार – बार उठ रहा है माँ की गोद से
उन्हें दूर भगाने के लिए
निऑन बल्ब की रोशनी में
चमक रही है
सार्वजनिक मूत्रालय की दीवार
जिस पर लिखा है
” गाय हमारी माता है ”
रात के नौ बजे चुके हैं
एक गाय
अपने बछ्ड़े के साथ
खड़ी हुई है
बाजार में ।

2-  शोर मत करो

अभी-अभी आकर बैठी है
एक तितली फूल पर
बहुत खास है
यह दृश्य
शोर मत करो
अभी-अभी
तो आकर बैठे हैं
इस दृश्य में
ये पल

3-  एक विचार

बार बार जारी हों
जिसे मारने की कोशिशें
तय है
वह मरा नहीं होगा
इसीलिए बार – बार
लौटता है वह
हमारी स्म्रति के बीहड़ में
विचार की तरह ।

4-  हँसो

कि विरोध चल रहा है यहाँ
किसी पागलपन का
हँसो
कि यह आत्ममुग्ध मसखरों का
संधिकाल है
लतीफे बनाओ
उन्हें गाओ
आरती की तर्ज पर
और हँसो
कि अब खुलने ही वाला है
सर्जना का दरवाजा
मसखरों के लिए !

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मणि मोहन

लेखक एवं विचारक

असि. प्रोफ़ेसर अंग्रेजी , राजकीय विद्यालय गंज बासोदा, म.प्र.

निवास – गंज बासोदा म.प्र

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