Tuesday, March 31st, 2020

भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर

- उपासना बेहार -

Dr. Baba Saheb Ambedkar - Founding Father of the Indian Constitutionभारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार, अर्थशास्त्री,समाजसुधारक,दार्शनिक डॉ॰ भीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मऊ में हुआ था। वे रामजीमालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14 वीं संतान थे। ये हिंदू महार जाति से थे, जो अछूत कहे जाते थे। एक अछूत परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सारा जीवन भेदभाव और अपमान सहना पड़ा। आंबेडकर के पूर्वज ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे और उनके पिता मऊ छावनी में थे। इनके पिता ने मराठी और अंग्रेजी में डिग्री प्राप्त की थी। वे षिक्षा के महत्व को अच्छी तरह से समझते थे इसी कारण वे अपने बच्चों को हमेशा पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये प्रोत्साहित किया करते थे। लेकिन अछूत जाति का होने का कारण इनके साथ स्कूल में भेदभाव होता था। इन्हें अन्य बच्चों से अलग बिठाया जाता था और अध्यापक उन पर ध्यान भी नही देते थे।

इनको कक्षा के अन्दर बैठने की भी अनुमति नहीं थी। आंबेडकर का सरनेम सकपाल था जिसे बाद में हटा कर अपने गुरु महादेव अम्बेडकर के अम्बेडकर को जोड़ लिया। इन्हें बाबा साहब भी कहा जाता था। अम्बेडकर साहेब का परिवार बाद में मुम्बई आ गया। वहॉ वे गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र थे। वहॉ भी उनके साथ भेदभाव होता रहा। 1907 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद उन्होनें कॉलेज की पढ़ाई के लिए बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और देष में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अछूत बन गये। इनकी काबिलयत देख कर बड़ौदा के गायकवाड़ शासक सहयाजी राव तृतीय ने अमेरिका में उच्च अध्ययन के लिये इन्हें वजीफा दिया। इन्होनें राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की। 1916 में उनके शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को उन्होंने पुस्तक ‘‘इवोल्युशन ऑफ प्रोविनिशअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया’’ के रूप में प्रकाशित किया, आगे चल कर वकालत की पढ़ाई की और ब्रिटिश बार में बैरिस्टर के रूप में प्रवेश पाया। दलित अधिकारों को लेकर उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया और संगठन भी बनाये जिनके मुख्य उद्देष्य भारतीय दलितों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत करना था। बाबा साहेब ने 1920 में बंबई में साप्ताहिक मूकनायक का प्रकाषन किया। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिंदू धर्म में बनायी चतुवर्ण प्रणाली और जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। वे चतुवणर््ा व्यवस्था के खिलाफ थे। इसे वे शोषणकारी मानते थे। उन्होनें दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका और आरक्षण की मांग की थी। बाबा साहेब षिक्षा को हमेषा प्रमुखता देते थे, उनका मानना था कि षिक्षा ही दलितों पर होने वाले अत्याचार का तोड़ है। इसकी कारण उन्होेनें नारा दिया था ‘‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’’।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की थी जिसका प्रमुख उद्देष्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। उन्होंने आंदोलनों के माध्यम से अछूतों को सार्वजनिक पेयजल से पानी लेने, हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने इसके लिए महाड सत्याग्रह किया। डॉ. अम्बेडकर 1926 में बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बने, सन 1927 में उन्होनें छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया, इसी साल उन्होंने अपनी दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत भी शुरू की।
वे राजनीतिक दलों के जाति व्यवस्था को खत्म करने के प्रति उदासीनता को लेकर खिन्न थे, ये दल देष की आजादी की बातेें तो करती थी लेकिन जाति व्यवस्था के उन्मूलन को लेकर कोई बात नही होती थी, दलों का समाज में व्याप्त इस कुरुति के प्रति रवैया उदासीन ही रहा, तब अंम्बेडकर साहब ने 8 अगस्त, 1930 को एक सम्मेलन के दौरान कहा था कि ‘‘हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मंे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा, उनको शिक्षित होना चाहिए।’’
अम्बेडकर धीरे धीरे दलित समुदाय के नेता के रुप में उभरने लगे, उनके प्रति इस समुदाय का जन समर्थन को देखते हुए 1931 मंे लंदन में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। जहॉ पर उन्होेनें अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की बात उठाई और सम्मेलन में इस पर बहुत बहसबाजी हुई। तब 1932 में ब्रिटिश सरकार ने अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की। लेकिन गांधीजी ने इसका विरोध किया और वे उस समय पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में बंद थे वही उन्होेनें आमरण अनशन शुरु कर दिया। भारी दबाव के चलते अंबेडकर को पृथक निर्वाचिका की माँग वापस लेनी पड़ी। लेकिन इसके बदले अछूतों को सीटों के आरक्षण, मंदिरों में प्रवेश, पूजा का अधिकार एवं छूआ-छूत खत्म करने की बात मान ली गयी। 1936 में अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की जिसने 1937 में हुए केन्द्रीय विधान सभा के चुनावों मे 15 सीटें जीती थी। वे रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे। इसी साल उन्होंने अपनी पुस्तक ‘‘जाति के विनाश’’ प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। अपनी पुस्तक शुद्र कौन थे? के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के बारे में लिखा है और इस व्यवस्था में सबसे नीचे क्रम में स्थित शुद्रों के बारे में व्याख्या की है। अम्बेडकर ने अपने जीविन काल में विभिन्न विषयों पर अनेकों किताबें लिखी हैं जो आज भी लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है।
भारत की स्वतंत्रता के बाद अम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया गया, 29 अगस्त 1947 को अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए गठित संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। देष के संविधान में सभी नागरिकों को संवैधानिक गारंटी के साथ साथ सभी नागरिकों को स्वतंत्रतायें जैसे धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर साहब ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए नौकरियों में आरक्षण प्रणाली की वकालत की। 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अम्बेडकर ने कहा ‘‘मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अर्धम था।’’
आधुनिक भारत के महानतम समाज सुधारक डॉ. अम्बेडकर ने महिलाओं की स्थिति सुधारने और उनके प्रति होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए 1951 में हिन्दू कोड बिल के मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता को शामिल करने की मांग की थी। लेकिन इसको लेकर संसद में बहुत बहस हुई और इसे पास नही होने दिया जिसके चलते उन्होनें मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया 1952 मंे वे राज्य सभा के सदस्य मनोनित हुए और अपनी मृत्यु यानी 6 दिसंबर 1956 (महापरिनिर्वाण) तक वे इस सदन के सदस्य रहे। डॉ. अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के साथ बौद्व धर्म ग्रहण किया।
1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है।
डॉ. अम्बेडकर ने बचपन से ही अछूत होने का दर्द भोगा था, कदम कदम पर उन्हें उनकी जाति के कारण अपमान सहना पड़ता था। वे नही चाहते थे कि इस तरह के तिरस्कार इस समुदाय के लोगों के साथ हो। वो चाहते थे कि सभी को एक इंसान के तौर पर देखा जाये। ना केवल दलितों के उत्थान बल्कि हर वंचित तबकों जैसे महिलाओं, को भी उनका अधिकार और बराबरी दिलाने के लिये सतत संघर्षशील रहे। वे एक प्रगतिशील व मानवीय समाज की कल्पना करते थे।
उन्होनें कहा था ’’मुझे अच्छा नही लगता जब कुछ लोग कहते हैं हम पहले भारतीय हैं बाद में हिन्दू या मुसलमान, मुझे यह स्वीकार नही है। धर्म, संस्कृति, भाषा आदि की प्रतिस्पर्धा निष्ठा के साथ रहते हुये भारतीयता के प्रति निष्ठा नही पनप सकती। मैं चाहता हूं कि लोग पहले भी भारतीय हों और अंत तक भारतीय रहे, भारतीय के अलावा कुछ नहीं।’’
विंडबंना यह है कि जिन डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपना पूरा जीवन दलित, महिलाओं, वंचित तबकों के अधिकारों के लिए संधर्ष करते हुए बीता दिया और संविधान में इनके हक के लिए प्रावधान किये, वे आज केवल दलित के ही नेता बनकर रह गए हैं। यह ओर दुख की बात है कि बाबा साहेब को धीरे धीरे भगवान बनाया जा रहा है। जगह जगह उनकी मूर्तीयॉ लगा कर पूजा की जा रही है जबकि वे स्वंय मूर्तीपूजा के सख्त खिलाफ थे।
आज आवष्यकता है उनके विचारों को समझने और उस पर अमल करने की। उनके दिये हुए संदेष ‘‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’’ को आत्मसात करने की है। ______________________
upasana-beharwriter-upassana-beharinvc-newsपरिचय -: उपासना बेहार लेखिका व् सामाजिक कार्यकर्त्ता
लेखिका  सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं और महिला मुद्दों को लेकर मध्यप्रदेश में काम करती हैं !
संपर्क – : 09424401469 ,upasana2006@gmail.com
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