Saturday, May 30th, 2020

रद्द-उल-फसाद ही नहीं रद्द-उल-जिहाद भी ज़रूरी

- तनवीर जाफरी -

Dargah-shahbaz-qalandar-aftपाकिस्तान में मानवता के हत्यारों का खूनी खेल अब इस स्तर तक पहुंच गया है कि दुनिया के किसी भी कोने में यदि किसी प्रकार की आतंकी घटना की सूचना मिले तो प्रथम दृष्ट्या यही प्रतीत होगा कि यह घटना पाकिस्तान में ही घटी होगी। इस देश के हालात अब ऐसे हो चुके हैं कि छोटी-मोटी आतंकी घटनाओं या आत्मघाती हमलों का समाचार प्रसारित करना ही विश्व मीडिया ने लगभग छोड़ दिया है। 16 दिसंबर 2014 को पेशावर के सैनिक स्कूल में हुए उस आतंकी हमले के बाद जिसमें स्कूल के 132 मासूम बच्चों सहित कुल 145 लोग मारे गए थे हालांकि सामूहिक हत्याओं व बड़े आत्मघाती हमलों की कई वारदातें ‘नापाक’ में घट चुकी हैं। परंतु गत् 16 फरवरी को पाकिस्तान के दक्षिणी सिंध प्रांत के सेहवन नगर में स्थित मशहूर सूफी संत लाल शाहबाज़ क़लंदर की दरगाह  पर एक आत्मघाती हमला किया गया। हमलावरों ने वीरवार का दिन इसीलिए चुना क्योंकि उस दिन आमतौर पर दरगाहों में काफी भीड़ होती है। इस हमले में अब तक 90 से अधिक लोगों के मारे जाने का समाचार है जबकि 150 लोग घायल अवस्था में अस्पताल में भर्ती हैं। गौरतलब है कि यह वही मशहूर सूफी संत की दरगाह है जिसका जि़क्र विश्व प्रसिद्धअमर कव्वाली-दमादम मस्त क़लंदर में किया गया है। संत शाहबाज़ क़लंदर ने अपने एक शेर में खुद ही फरमाया था कि-‘तू आंँ कातिल की अज़ बहर-ए-तमाशा खून-ए-मन रेज़ी। मन आँ बिस्मिल की ज़ेर-ए-खंजर-ए-खूंख्वार मी रकसम।। फारसी के इस शेर का अर्थ है कि तू वह कातिल है कि मेरे तमाशे के लिए मेरा खून बहाता है और मैं वह बिस्मिल हूं कि खूंख्वार खंजर के नीचे भी रक्स(नृत्य)करता ह।ूं निश्चित रूप से शाहबाज़ क़लंदर की दरगाह पर किए गए इस हमले ने न केवल सेहवन शहर बल्कि सखी शाहबाज़ क़लंदर की दरगाह को भी एक बार पुन: जीवंत कर दिया है।

बहरहाल, पाकिस्तान की सेना ने इस वहशियाना हमले के बाद एक बार फिर करवट ली है और पाक स्थित चरमपंथियों के विरुद्ध ‘रद्द-उल-फसाद’ नामक एक नया अभियान शुरु करने की घोषणा की है। इसके पूर्व पेशावर स्कूल हमले के बाद भी जून 2015 में पाकिस्तान की फौज ने उत्तरी वज़ीरिस्तान में ज़र्ब-ए-अज़्ब नामक अभियान चलाया था। इस अभियान में सैकड़ों चरमपंथी मारे गए थे। और अब शाहबाज़ क़लंदर जैसे महान फकीर की दरगाह पर हुए हमले के बाद सेना ने पुन: आतंकवादियों के विरुद्ध कमर कसने का निश्चय किया है। ज़ाहिर है इस आप्रेशन में भी कुछ न कुछ आतंकियों के मार गिराए जाने की संभावना है। परंतु आतंकियों की वारदातें न तो पहले ऑप्रेशन के बाद रुकी थीं न ही वर्तमान रद्द-उल-फसाद के बाद रुकने की संभावना है। सवाल यह है कि आिखर ऐसी क्या वजह है कि हज़ारों आतंकियों के मारे जाने के बावजूद आतंकवादियों की संख्या उनके हौसले तथा आतंकी घटनाओं में दिन-प्रतिदिन और इज़ाफा होता जा रहा है?  इतना ही नहीं बल्कि इस प्रकार के हादसों का स्तर भी पहले से भयानक व बड़ा होता जा रहा है? हद तो यह है कि अब पाक स्थित आतंकवादी विभिन्न आतंकी संगठनों के नाम से सीधे तौर पर पाक सेना को ही चुनौती दे रहे हैं। सैन्य छावनी,सैन्य चौकी,एयरवेज़ तथा सैन्य स्कूलों व सेना की गाडिय़ों व कािफलों को निशाना बनाया जाना सीधे तौर पर पाक सेना को आतंकवादियों द्वारा चुनौती देना है। और यहां यह कहने में भी कोई हर्ज नहीं कि अनेक आतंकवाद विरोधी आप्रेशन चलाए जाने के बावजूद पाक सेना की आतंकियों के विरुद्ध अपनी पकड़ अब कमज़ोर होने लगी है। इसका सुबूत यह है कि पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ व अन्य जि़म्मेदार पाकिस्तान हुक्मरानों की ही तरह पाक के नए सेनाध्यक्ष जनरल क़मर बाजवा ने भी यह स्वीकार किया है कि स्वदेशी चरमपंथ पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा है न कि कोई विदेशी ताकत।

ऐसे में जबकि पाकिस्तानी शासक अपने ही देश में फल-फूल रहे चरमंथ व आतंकवाद को ही देश के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते हैं फिर आिखर इस समस्या की जड़ों पर प्रहार क्यों नहीं करते? प्रत्येक आतंकी घटना के बाद किसी नए आप्रेशन को अंजाम देकर चंद लोगों को या आतंकियों को मार गिराना तो निश्चित रूप से समस्या को जड़-मूल से खत्म करना कतई नहीं है। यह कार्रवाई तो वैसी ही है जैसे कि किसी पेड़ से पत्तों को झाडऩा और शाख, तना व जड़ें वैसी की वैसी छोड़ देना। नतीजतन आतंकवादियों के रूप में पत्ते पुन: हरे हो जाते हैं। और नतीजे में आतंकवादियों की संख्या पहले से अधिक बढ़ती जा रही है और हमलों में भी दिन-प्रतिदिन इज़ाफा होता देखा जा रहा है। दरअसल पाकिस्तान में चरमपंथ की समस्या एक वैचारिक रूप से फैलने वाले ज़हरीले प्रदूषण का रूप ले चुकी है। इसकी जड़ें वहां की कई मस्जिदों व कई मदरसों से लेकर संसद,सेना,आईएसआई तथा अदालतों तक पहुंच चुकी हैं। ज़ुल्िफकार अली भुट्टो,बेनज़ीर भुट्टो से लेकर सलमान तासीर तक की हत्या में वही वैचारिक प्रदूषण के अंश शामिल हैं। यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने  इस्लामबाद की मशहूर लाल मस्जिद  में 3 जुलाई से लेकर 11 जुलाई 2007 तक चलाए गए 8 दिन के आप्रेशन सनराईज़ को अंजाम देकर चरपंथ की जड़ पर प्रहार करने का प्रयास किया था। इस आप्रेशन में 84 लोग मारे गए थे जिसमें मस्जिद का एक सरगना भी शामिल था।

दरअसल ऐसे ही ठिकानों से जिहाद की परिकल्पना परवान चढ़ती है। ऐसे ही ठिकानों पर ओसामा बिन लाडेन,मुल्ला उमर व हािफज़ सईद जैसे हज़ारों ज़हर फैलाने वाले ‘उपदेशक’ पनपते हैं जो बेरोज़गार,अशिक्षित तथा कम उम्र के युवकों को जन्नत वाया जिहाद का मार्ग दिखाकर उन्हें मरने व मारने के लिए मानसिक रूप से तैयार करते हैं। ज़ाहिर है हािफज़ सईद व मसूद अज़हर जैसी मानवता विरोधी ताकतें घूम-घूम कर पूरे पाकिस्तान में इसी जिहाद का प्रचार करती हैं तथा लोगों को गुमराह करती फिरती हैं। परंतु इन लोगों के पाक सत्ता में रसूख इतने गहरे हैं कि इन पर हाथ उठाना भी कोई आसान बात नहीं है। यहां यह याद रखना भी ज़रूरी है कि चाहे ओसामा बिन लाडेन हो या सद्दाम हुसैन या फिर अबु बकर अल बगदादी जैसा खूंख्वार आईएस प्रमुख। इन सभी ने अपने को पश्चिमी ताकतों से घिरा हुआ देखकर पूरी दुनिया के मुसलमानों से जिहाद करने व जिहाद के नाम पर इकठ_ा होने का आह्वान बार-बार किया है। ज़ाहिर है जिहाद की यह अवधारणा किसी स्कूल की पाठय पुस्तक में या सांसारिक शिक्षा जगत में नहीं बल्कि इन्हीं कठमुल्लाओं की सरपरस्ती में इसका गलत अनुवाद कर व इसकी गलत व्याख्या बताकर दी जाती है। आज दुनिया जिहाद के उन अर्थों को समझने को तैयार नहीं है जो उदारवादी मुसलमानों द्वारा जद्दोजहद या आंखों का जेहाद अथवा मस्तिष्क के जिहाद के रूप में बताई जाती है। यदि ऐसा होता तो हिज़बुल मुजहिद्दीन जैसे संगठन या अफगानिस्तान के मुजाहिदीन हथियार लेकर घूमने के बजाए लोगों को ज़बानी जद्दोजहद करने की ही सीख देते फिरते। परंतु आतंकियों का जेहाद सशस्त्र जिहाद है और जब तक यह अवधारणा कायम रहेगी और इन्हें खुली छूट मिलती रहेगी तब तक बड़ी से बड़ी आतंकी घटनाओं को रोक पाना संभव नहीं हो सकेगा। अत: पाकिस्तानी सेना को केवल आप्रेशन रद्द-उल-फसाद चलाने मात्र से ही यह नहीं समझना चाहिए कि आतंकियों का वह सफाया कर सकेगी बल्कि इसके साथ-साथ र्द-उल-जिहाद जैसे आप्रेशन की भी सख्त ज़रूरत है।

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Tanveer JafriAbout the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author

Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.

He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.

Contact – : Email – tjafri1@gmail.com –  Mob.- 098962-19228 & 094668-09228 , Address – Jaf Cottage – 1885/2, Ranjit Nagar,  Ambala City(Haryana)  Pin. 134003
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