आई एन वी सी न्यूज़ नई दिल्ली ,

Suraj-Badtiya,story-by-Suraसूरज बड़त्या की कृति "कामरेड का बक्सा’" शीर्षक कहानी संग्रह ( पुस्तक )  की सभी कहानियां आई एन वी सी न्यूज़ पर सिलसिलेवार प्रकाशित होंगी l

कहानीकार महेंद्र भीष्म कि ” कृति लाल डोरा ”  पुस्तक और  लेखक  म्रदुल कपिल  कि कृति ” चीनी कितने चम्मच  ”  पुस्तक की सभी कहानियां आई एन वी सी न्यूज़ पर सिलसिलेवार प्रकाशित हुई , यह आई एन वी सी न्यूज़ पर यह पहला और अलग तरह का प्रयास  व् प्रयोग था ,  आई एन वी सी न्यूज़ के पेज़  "  साहित्य जगत " के पाठको ने आई एन वी सी न्यूज़ की इस पहल को बेहद पंसद किया , साथ ही कई लेखको ने अपनी - अपनी कृतियाँ आई एन वी सी न्यूज़ पर प्राकशित करवाने के लियें संपर्क भी किया , आई एन वी सी न्यूज़ परिवार सभी का आभार प्रकट करता हैं l

कई लेखको की पुस्तके प्राप्त हुई जो अपने आप में एक अलग तरह का साहित्यिक स्थान रखती हैं ,काफी मंथन व् चर्चा के बाद तलाश शुरू हुई   एक ऐसी साहित्यिक कृति की जो इंसानी संवेदना की आत्मा तक को हिला डाले  और यह तलाश आकर खत्म हुई  सूरज बड़त्या की शानदार कृति  कामरेड का बक्सा’ शीर्षक कहानी संग्रह पर |  कामरेड का बक्सा की सभी कहानियां दूर कहीं बहुत दूर ले जाकर पाठक को " पटक " देती हैं ,आत्मा की भी अगर कोई आत्मा होती होगी तो उसको भी कहानी के पात्र का दर्द महसूस करने पर मजबूर कर देती हैं

ज़ाकिर हुसैन संपादक आई एन वी सी न्यूज़ ________________

कहानी संग्रह " कामरेड का बक्सा’  के बारे में 

कामरेड का बक्सा’ शीर्षक इस कहानी संग्रह में कुल जमा पाँच कहानियाँ हैं - ‘फीलगुड’, ‘गुज्जी’, ‘गुफाएँ’, ‘कामरेड का बक्सा’ और ‘कबीरन’। वैसे तो केवल पाँच कहानियों के आधार पर किसी लेखक के बारे में एक निर्णयात्मक स्थिति तक पहुँचना जोखिम भरा काम है फिर भी इन कहानियों से गुजरते हुए यह सुखद अहसास जरूर होता है कि सूरज बड़त्या में भविष्य का एक सार्थक एवं बड़ा कहानीकार होने की अनन्त सम्भावनाएँ हैं। इन कहानियों में किस्सागोई की शैली और कहन की विशिष्टता ने पठनीयता के गुण को इस प्रकार से निखारा है कि कहानी को एक साँस में चट कर जाने की उत्सुकता पैदा होती है। दलित समझ से लिखी गयी इन कहानियों में विमर्श सतह पर उतरता नहीं दिखाई देता बल्कि यही कि विचारधारा दृष्टि का उन्मेष करती है। कहानीकार की इस संक्षिप्त कहानी-यात्रा में विकास-प्रक्रिया का संकेत मिलता है जो उत्तरोत्तर निखरती गयी है। संग्रह की अन्तिम कहानी ‘फीलगुड’ सम्भवतः लेखक की भी पहली कहानी है जो जाति छिपाने की हीन-ग्रन्थि को केन्द्र में रखकर लिखी गयी है। घृणा की सीमा तक फैली हुई अस्पृश्यता की समस्या दलित समुदाय की सबसे अपमानजनक समस्या है जिसका सामना पढ़े-लिखे दलितों को कदम-कदम पर करना पड़ता है। ‘सरनेम’ जानने की सवर्ण जिज्ञासा ही जाति छिपाने की प्रेरणा देती है। ‘गुज्जी’ कहानी में गुज्जी के ब्योरेवार वर्णन में नये दलित बिम्बों एवं प्रतीकों का प्रयोग कहानी की सृजनात्मकता में बाधक नहीं है। ऐसे दृश्य अभिजन साहित्य में भले वर्जित रहे हों पर ‘सूअर भात’ देने के विरले अवसर तो दलित समाज के जीवनोत्सव हुआ करते थे। यहीं अभिजन साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र से दलित साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र का अन्तर भी स्पष्ट हो जाता है। अन्य तीनों कहानियाँ अपनी बनावट और बुनावट की दृष्टि से बेहतर कहानियाँ हैं जिनमें ‘कामरेड का बक्सा’को ‘कामरेड का कोट’ और ‘लाल किले के बाज’ के साथ रखकर भी पढ़ा जा सकता है। पर इसकी विशिष्टता यह है कि इसमें ‘मार्क्स’ और अम्बेडकर के विचारों के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों को विरोध और सामंजस्य की युगपत प्रक्रिया में रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। वर्ण बनाम वर्ग के अन्तर्विरोध के बावजूद ‘अपने लोगों के लिए’ बेचैनी दोनों को व्यथित करती है। ‘गुफाएँ’ कहानी दलित समुदाय के अपने अन्तर्विरोधों और उपजातियों की आन्तरिक समस्याओं से जूझती कहानी है। अन्तर्विरोधों से मुक्त होने की छटपटाहट और लेखक की बेचैनी को साफ देखा जा सकता है। ‘कबीरन’ कहानी अद्भुत लेकिन दलित साहित्य को नया आयाम देती हुई उसके फलक को व्यापक करती है। इसमें हिजडे़ समुदाय के दर्द और उनके साथ होते सामाजिक अन्याय के घने और गहरे बिम्ब हैं। निश्चित तौर पर सूरज बड़त्या ने एक युवा कहानीकार के रूप में अपनी अलग पहचान बना ली है, इसमें सन्देह नहीं।  प्रोफ. चोथीराम यादव

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लेखक " सूरज बड़त्या "  के बारे 

हिंदी दलित साहित्य के बेहद जरुरी और चर्चित कहानीकार हैं सूरज बडत्या | इनकी कहानियों का कथानक इनकी वैचारिक वैश्विक समझ को ही नहीं बल्कि भावों  की सहज अभिव्यक्ति और सार्थक कलात्मकता इन्हें दलित कहानीकारों से ही नहीं बल्कि अपनी पीढ़ी के अन्य रचनाकरों में भी विरल बनाती हैं | इनकी वैसे छ: किताबें प्रकाशित हैं |वैचारिक रूप से आंबेडकरवादी विचार को समझाते हुए तीन किताबें हैं | दलित सौन्दर्यशास्त्र पे बेहद चर्चित किताब है  " सत्ता संस्कृति और दलित सौन्दर्यशास्त्र "|  इन्होनें  बहुत सारी क्रांतिकारी दलित कवितायें भी लिखी हैं | तीन पुरस्कार इन्हें अपनी रचनाओं पे अब तक मिल चुके हैं | रचनात्मक लेखन की पहली कहानी की किताब " कामरेड का बक्सा " पे इनको युवा दलित कहानीकार अवार्ड भी मिल चूका है |

इन्होने "संघर्ष" एवम "युद्धरत आम आदमी" पत्रिका का संपादन किया है और अभी "दलित अस्मिता" पत्रिका के सहायक संपादक हैं | हिंदी की बेहद चर्चित पत्रिका "मंतव्य" के दलित विशेषांक के अतिथि संपादक हैं | काबिले-गौर है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदी एम्ए के पहले दलित गोल्ड मेडलिस्ट भी हैं | दिल्ली यूनिवर्सिटी से ही पीएच .डी की है |

इनकी कविताओं का इंग्लिश, पंजाबी , गुजराती मैं अनुवाद हुआ है | इनका कहानी संग्रह " कामरेड का बक्सा " का पंजाबी और गुजराती मैं अनुदित होकर  प्रकाशित हो चुका है| अहमदाबाद यूनिवर्सिटी में बी ए के पाठ्यक्रम मैं इनकी कहानियाँ पढाई जाती है | और बाहरवी में ही इनकी कविताएं भी पाठ्यक्रम में लगी हैं | सूरज बडत्या मूल रूप से दिल्ली से ताल्लुक रखते हैं | कहानियों की दूसरी किताब और " किलडीया" उपन्यास शीघ्र प्रकाशित होने वाला है |

फिलहाल सूरज बडत्या हिंदी के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं | संपर्क - badtiya.suraj@gmail.com - Mobile- : +91- 989143166