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Tuesday, January 19th, 2021

दावे लोकहित के, प्राथमिकताएं निराली

- निर्मल रानी  -       
                                                                                                
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी तथा भारतीय जनता पार्टी के नेतागण प्रायः ऐसी भाषाएं बोलते सुनाई देते हैं गोया आज़ादी के बाद देश में पहली बार अब कोई ऐसी सरकार आई है जिसे लोक हित की सबसे अधिक चिंता हो। चुनावी भाषणों से लेकर,मन की बात तक में तरह तरह के लोकलुभावन 'बोल वचन' सुनने को मिलते हैं। पूरी सत्ता का ज़ोर देश को यही समझने में लगा रहता है कि देश अब बिजली की गति से आगे बढ़ रहा है। देश का मस्तक जो शायद गत 70 वर्षों से नीचे झुका हुआ था उसे वर्तमान सरकार ने ही ऊँचा उठाया है। सवाल यह है कि देश आख़िर कहते किसे हैं ? देशवासी ही तो देश की इकाई होते हैं? यदि देशवासी ख़ुश हाल हैं तो देश स्वयं ही ख़ुश हाल हो जाएगा। इसी लिए तो पार्टियां चुनाव पूर्व यही वादे करती हैं कि सत्ता में आने के बाद मंहगाई कम करेंगे,लोगों को नौकरियाँ व रोज़गार देंगे,देश का विकास करेंगे। 2014 के पहले इन सत्ताधारियों ने भी वादा किया था की दो करोड़ लोगों को रोज़गार दिया जाएगा। विदेशों से काला धन लाएंगे। और सभी के खातों में 15-15 लाख रूपये डाले जाएंगे। इस तरह के वादे तो कम से कम यही साबित करते हैं कि वादा करने वाली पार्टी लोकहित के प्रति चिंतित व गंभीर है। किसानों,मज़दूरों,बुज़ुर्गों व महिलाओं के लिए विशेष योजनाएं बताई जाती हैं। परन्तु हमारे देश की वर्तमान सरकार के लोकहित संबंधी दावों में कितनी हक़ीक़त है और उसकी कारगुज़ारियां क्या हैं,तथा किस 'दर्शन' व प्राथमिकताओं पर वह काम कर रही है यह देखना व समझना भी प्रत्येक देशवासी के लिए बहुत ज़रूरी है।
                                        निश्चित रूप से केवल हमारा देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व इस समय कोरोना महामारी की चपेट में है। दुनिया के तमाम देशों में अर्थव्यवस्था का संकट खड़ा हो गया है। अनेक देश अपने फ़ुज़ूल या ग़ैर ज़रूरी ख़र्च को नियंत्रित करने में लगे हैं। ज़ाहिर है भारत सरकार ने भी ख़र्च कम करने और आय बढ़ाने संबंधी अनेक उपायों पर काम किया है। लोकहित के लिए समर्पण का दावा करने वाली इस सरकार ने कोरोना की आड़ लेकर वरिष्ठ नागरिकों को रेलवे में दी जाने वाली 50 प्रतिशत की छूट समाप्त कर दी है जो पिछली यू पी ए सरकार द्वारा काफ़ी समय से दी जाती रही है। महिलाओं को 58 वर्ष की आयु में और पुरुषों को 60 वर्ष की आयु में यह रियायत दी जाती थी। इसी तरह देश के कई रेलवे स्टेशन जो निजी हाथों में सौंपे जा चुके हैं वहां प्लेटफ़ॉर्म टिकट की क़ीमत 50 रूपये कर दी गयी है। अब ख़बर है कि नवरात्रि के बीच 20 अक्टूबर से दीपावली व छठ के बाद 30 नवंबर तक भारतीय रेल विशेष सौ से अधिक फ़ेस्टिवल स्‍पेशल ट्रेन्स चलने जा रहा है। परन्तु सूत्रों के मुताबिक़ रेलवे इन स्‍पेशल ट्रेनों में यात्रा करने वालों से सामान्‍य से ज़्यादा किराया वसूल करेगा। पिछली सरकारें भी त्यौहारी विशेष ट्रेन्स चलाती थीं परन्तु यात्रियों से कभी भी अतिरिक्त किराया नहीं लिया जाता था। रेलवे के निजीकरण की ख़बरों के बीच समाचार यह भी है भरी भरकम रेल किराए के अलावा चुनिंदा स्टेशन  के प्रयोग करने पर अतिरिक्त 'यूज़र चार्ज' भी यात्री को देना होगा। डीज़ल,पेट्रोल तथा गैस की क़ीमत में गत 6 वर्षों में कितनी बढ़ोतरी हुई है यह पूरा देश देख ही रहा है। लॉक डाउन के दौरान देश के करोड़ों लोग किस तरह बेरोज़गार हुए,किस तरह देश के चारों ओर से कामगार लोग बेरोज़गारी के आलम में ख़ाली जेब भूखे प्यासे अपनी गृहस्थी का बोझ उठाए हुए हज़ारों किलोमीटर का पैदल सफ़र कर अपने शहरों व गांव को पहुंचे यह भी पूरी दुनिया ने देखा। देश के लाखों दयालु देशवासियों द्वारा यदि रास्तों में उनके जलपान व सहायता का प्रबंध न किया गया होता और देश के ये 'लावारिस' सपूत इस तथाकथित 'लोकहितकारी ' सरकार के भरोसे होते तो शायद लाखों पैदल यात्री अपनी जान से हाथ धो बैठते।
                                    अब ज़रा सत्ताधीशों की उन प्राथमिकताओं पर भी ग़ौर कीजिये जो चुनावी वादों में नहीं होतीं परन्तु उनपर अमल करना ये सबसे ज़रूरी समझते हैं। मिसाल के तौर पर देश के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति की तर्ज़ पर अपना 'एयर इंडिया वन' विमान ख़रीद लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति के विमान एयरफ़ोर्स वन जैसी विशेषताएँ व सुविधाएं रखने वाला बोइंग 777 विमान भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री की सेवा में रहेगा. दो अदद अति विशिष्ट विमान ख़रीदने के लिए भारत ने लगभग 8400 करोड़ रूपये ख़र्च किये हैं।इसमें मिसाइल एप्रोच वार्निंग सिस्टम,इलेक्ट्रॉनिक वॉर फ़ेयर जैमर,डायरेक्शनल इंफ़्रा रेड काउंटर मेजर सिस्टम,चाफ़ एंड फ़्लेयर्स सिस्टम,मिरर बॉल सिस्टम,सुरक्षित सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम तथा हवा में ईंधन भरने जैसी आधुनिक सुविधाएँ मौजूद हैं। जिस नेहरू गांधी परिवार को 'नामदार' राजकुमार और शहज़ादा जैसी उपाधियाँ देकर वर्तमान सत्ताधारी व्यंग्य कसते थे उन्होंने इस विमान को ख़रीदने की ज़रुरत कभी नहीं महसूस की परन्तु स्वयं को फ़क़ीर और देश का चौकीदार बताने वाले संत रुपी प्रधान सेवक को इतनी  महंगी  क़ीमत व अत्यधिक ख़र्चीले रखरखाव वाले विमान की ज़रुरत आख़िर क्यों महसूस हुई इसकी वजह देश ज़रूर जानना चाहेगा।  
                                       इसी तरह सरकार एक नया संसद भवन निर्माण करने की तैयारी में है। ख़बर है कि टाटा ग्रुप के टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड ने लगभग 862 करोड़ रूपये की लागत में नए भवन के निर्माण का अनुबंध प्राप्त कर लिया है। 1927 में अंग्रेज़ों द्वारा निर्मित वर्तमान संसद भवन आज भी अपनी भव्यता व मज़बूती के लिए विश्व विख्यात है। देश की किसी भी पूर्व सरकार ने नए संसद भवन के निर्माण जैसे महंगे व अनावश्यक ख़र्च की ज़रुरत महसूस नहीं की। न ही इस विषय पर कोई प्रस्ताव या विचार आया। परन्तु मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में नया संसद भवन क्यों और कैसे आया ? स्मार्ट सिटी,गंगा सफ़ाई और स्वच्छता अभियान पर अब तक बेहिसाब पैसे ख़र्च करने के बावजूद आज देश में यह तीनों ही योजनाएं या इनके परिणाम ढूंढने से भी नहीं मिलते । जहाँ तक इनके 'दर्शन' का सवाल है तो शिक्षित युवाओं के लिए पकौड़ा रोज़गार योजना,नाले में पाइप डालकर गैस निकालकर चाय पकौड़ा बनाने  हेतु मुफ़्त ईंधन हासिल करना,ट्रैक्टर के ट्यूब में नाले वाली गैस भरकर पंपिंग सेट चलाकर खेतों की सिंचाई करना या पूर्वांचल विश्वविद्यालय के संघ प्रचारक रहे उप कुलपति राजा राम यादव की 'खंजरी बजाओ-भीख मांगो-आत्म निर्भर बनो' जैसी योजना इनके 'दिव्य-दर्शन' की प्रमुख झलकियाँ हैं। आश्चर्य है कि तमाम फ़ुज़ूल ख़र्ची करने वाली वर्तमान सरकार, पिछली सरकार द्वारा देश के वरिष्ठ नागरिकों को रेल यात्रा में दी जा रही रियायत समाप्त कर देती है और ज़रुरत पड़ने पर इसी सरकार के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने लिए एक ऐसा बेशक़ीमती सूट सिलवाते हैं जो विपक्ष के भारी हंगामे के बाद साढ़े चार करोड़ रुपए की क़ीमत में नीलाम होकर अपनी विश्व में सबसे ऊँची क़ीमत के लिए गिन्नीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ। इन तथ्यों के आधार पर आसानी से इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि वर्तमान सरकार के लोकहित के दावे कितने खोखले हैं तथा वास्तव में इनकी प्राथमिकताएं व दर्शन कितने अजीबो ग़रीब व निराले हैं।
 
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परिचय –:
निर्मल रानी
लेखिका व्  सामाजिक चिन्तिका
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर निर्मल रानी गत 15 वर्षों से देश के विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व न्यूज़ वेबसाइट्स में सक्रिय रूप से स्तंभकार के रूप में लेखन कर रही हैं !
संपर्क -: E-mail : nirmalrani@gmail.com
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