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Friday, September 24th, 2021

बीजेपी की चुप्पी पर चिराग ने जताई हैरानी - तेजस्वी ने  दिया ऑफर

पटना । लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) में सियासी खींचतान जारी है। चिराग पासवान के चाचा पशुपति पारस गुट ने लोजपा पर कब्जा कर लिया है जबकि इसकी नींव जमुई सांसद के दिवंगत पिता ने रखी थी। ऐसे में चिराग पासवान ने बुधवार को बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुंचने की कोशिश की। पिछले साल हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग ने खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताया था।  लोजपा सांसद ने कहा, 'हनुमान का वध होने पर यदि राम चुप रहे तो यह ठीक नहीं है।' उन्होंने कहा कि सतयुग के समय से लेकर आज तक रामायण में देखा गया है कि हनुमान जी ने हर कदम पर भगवान राम का साथ दिया। चिराग ने कहा, 'हर कदम पर हनुमान भगवान राम के साथ चले और उसी तरह हर कदम पर उनकी पार्टी लोजपा हर छोटे-बड़े फैसले पर नरेंद्र मोदी जी के साथ खड़ी रही है। हर फैसले पर भाजपा के साथ मजबूती से खड़े रहने वाले हनुमान की लोजपा पर जब आज संकट की घड़ी आई है तो उम्मीद थी कि राम हस्तक्षेप करेंगे और किसी तरह इस विवाद को सुलझाने की कोशिश करेंगे। लेकिन बीजेपी की चुप्पी ने मुझे दुखी जरूर किया है, फिर भी मैं कहूंगा कि मुझे पीएम पर पूरा भरोसा है कि वे स्थिति को नियंत्रण में लेकर इस राजनीतिक मुद्दे को सुलझाने के लिए हस्तक्षेप जरूर करेंगे।' चिराग ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भाजपा हस्तक्षेप करेगी और लोजपा पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए अपने चाचा पशुपति कुमार पारस के साथ जारी संग्राम को सुलझाएगी। रविवार को सूत्रों ने कहा था कि लोजपा नेता ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर पार्टी के चुनाव चिह्न पर अधिकार मांगा है। यह कदम तब उठाया गया जब पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व वाले लोजपा गुट ने राष्ट्रीय, राज्य कार्यकारिणी और विभिन्न प्रकोष्ठों की समितियों को भंग कर दिया था। चिराग ने लोजपा के अंदर जारी घमासान में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा अपनी किसी तरह की भूमिका न होने को लेकर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा, 'हर किसी को पता है। यह एक खुला रहस्य है। जो लोग इसके पीछे हैं उन्हें पता है। यह पहली बार नहीं है जब सीएम ने हमारी पार्टी में फूट डालने की कोशिश की है। यह उनके काम करने की शैली रही है। 2005 में जब हमारे 29 विधायक जीते थे तब नीतीश कुमार ने हमारी पार्टी को तोड़ा था। उन्होंने 2020 में विधानसभा चुनाव जीतने वाले हमारे एकमात्र विधायक को भी तोड़ने का काम किया। तोड़ने की उनकी परंपरा रही है, फिर वह किस मुंह से कह रहे हैं कि उनकी कोई भूमिका नहीं है।'

तेजस्वी ने चिराग को दिया ये बड़ा ऑफर
पटना । लोक जनशक्ति पार्टी लोजपा में चल रहा सियासी संग्राम थमने का नाम नहीं ले रहा है। इसी बीच नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव  पटना पहुंचे। राजधानी पहुंचते ही उन्होंने चिराग पासवान को साथ आने का ऑफर देते हुए याद दिलाया कि कैसे लालू प्रसाद ने 2010 में रामविलास पासवान को राज्यसभा के लिए नामांकित होने में मदद की थी, जब लोजपा के पास कोई सांसद या विधायक नहीं था। तेजस्वी ने रामविलास को ऐसे समय पर यह ऑफर दिया है जब चिराग पांच जुलाई से हाजीपुर से अपनी बिहार यात्रा शुरू कर खोई हुई राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने की तैयारी कर रहे हैं। उनके चाचा पशुपति पारस के गुट का लोजपा पर कब्जा हो गया है। पटना पहुंचते ही तेजस्वी ने कहा, 'चिराग भाई तय करें कि उन्हें आरएसएस के बंच ऑफ थॉट्स के साथ रहना है या संविधान निर्माता बाबा साहब ने जो लिखा है, उसका साथ देंगे। जदयू का नाम लिए बिना तेजस्वी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए उन्हें लोजपा में मचे घमासान के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा, 'कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो षड्यंत्र रचने में माहिर होते हैं। इसके बाद ये लोग राज्य में राजनीतिक घटनाओं के बारे में अनभिज्ञता भी जताते हैं।' तेजस्वी नीतीश के उस बयान का जिक्र कर रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें लोजपा में जारी घमासान की जानकारी नहीं है। नेता प्रतिपक्ष ने कहा, 'इसी अज्ञानता के कारण ही बिहार इस तरह की स्थिति में आ गया है। यहां बेरोजगारी और भुखमरी हो गई है। आरजेडी ने 2010 में पासवान जी को राज्यसभा के लिए मनोनीत करने में मदद की थी जब लोजपा के पास कोई सांसद या विधायक नहीं था।' चिराग ने जहां तेजस्वी की टिप्पणी पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, वहीं लोजपा नेता ने भाजपा से अपने मोहभंग के स्पष्ट संकेत दिए हैं। चिराग ने अपनी पार्टी को तोड़ने के लिए नीतीश कुमार को दोषी ठहराया था। उन्होंने भाजपा की चुप्पी पर हैरानी जताई है। तेजस्वी यादव के करीबी नेता ने कहा कि 'तुरंत नहीं' लेकिन दोनों के एक साथ आने का राजनीतिक तर्क तो है। पूर्व में भी रामविलास जी ने 2002 के बाद मोदी के साथ मतभेदों के कारण अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट को छोड़ दिया था। 'दोनों अपने-अपने वोटबैंक पर अधिकार रखते हैं और अगली चुनाव प्रक्रिया से पहले उनके पास समय है। दोनों नेताओं और दो मूल आधारों ने एक साथ काम किया है। पासवान और यादव राजनीतिक जातियां हैं जो मुखर हैं और विरोधात्मक नहीं हैं। चिराग और तेजस्वी के बीच अच्छा रिश्ता है। बेशक चिराग एनडीए के करीबी हैं लेकिन ऐसा नहीं है कि दोनों नेताओं में बिलकुल बात नहीं होती। PLC.

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