Saturday, February 29th, 2020

CAA को तुरंत लागू होने को निरस्त किया जाए

आई एन वी सी न्यूज़              
नई  दिल्ली ,      
नागरिकता संशोधन एक्ट, एनआरसी और एनपीआर जैसे प्रमुख मामलों पर जमीयत उलेमा ए हिंद के महासचिव मौलाना महमूद मदनी सहित 100 से अधिक  प्रार्थना पत्रों पर सुनवाई करते हुए आज सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से 4 सप्ताह के अंदर जवाब तलब किया है । चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एस ए बोबडे, जस्टिस अब्दुल नजीर और संजीव खन्ना की बेंच ने सभी पक्षों  की  प्रार्थना पत्रों की सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया।
 न्यायालय में बुध की सुबह ही इन मामलों की सुनवाई शुरू हुई, प्रमुख पक्ष जमीयत उलेमा ए हिंद (मौलाना महमूद मदनी) की तरफ से सीनियर वकील राजीव धवन ने अपना पक्ष रखा ,उन्होंने अदालत से प्रार्थना की कि यह मामला संवैधानिक बेंच के हवाले किया जाए और एनपीआर, सीएए के तुरंत लागू होने को निरस्त किया जाए, क्योंकि इनसे जो परिणाम निकलेंगे उनको  कानूनन बदला नहीं जा सकेगा। कुछ वकीलों की तरफ से अदालत से यह प्रार्थना की गई कि विशेष रुप से नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए)के अंतर्गत उठाए गए कदमों को अस्थाई रूप से 3 महीने के लिए निरस्त कर दिया जाए लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया। चीफ जस्टिस ने इस संबंध में कहा कि अभी तक सारे प्रार्थना पत्रों पर केंद्र को नोटिस जारी नहीं किया गया है, इसलिए एकतरफा आर्डर जारी नहीं किया जा सकता। संवैधानिक पीठ मे रेफर किए जाने से संबंधित अदालत ने स्पष्ट किया कि संवैधानिक पीठ गठित नहीं हुई है इसलिए अभी तुरंत रेफर करने का कोई सवाल नहीं हो सकता लेकिन अगर आवश्यकता पड़ी तो इसे रेफर किया जा सकता है। इन 4 सप्ताह में संवैधानिक बेंच गठित की जा सकती है। इसके बाद स्थाई रूप से एनआरपी को निरस्त किए जाने के प्रार्थना पत्रों पर संवैधानिक पीठ में ही फैसला होगा। इसके अलावा यह कि अदालत ने सारे उच्च न्यायालयों  पर रोक लगा दी है कि वह इस संबंध में कोई सुनवाई न करें। ऐसी जो भी प्रार्थना पत्र आए उनको सुप्रीम कोर्ट भेज दिया जाए, साथ ही अदालत ने प्रार्थना पत्रों की अधिकता का भी नोटिस लिया और आसानी के लिए इनको 3 वर्गों में अलग अलग करने का आदेश दिया। ( 1) आसाम और त्रिपुरा से संबंधित (2 ) सीएए संबंधित (3 )सिर्फ एनपीआर से संबंधित । न्यायालय ने इस बात पर भी  सहमति प्रकट की ,कि आसाम और त्रिपुरा से संबंधित प्रार्थना पत्रों पर अलग से सुनवाई होगी।
न्यायालय की आज की कार्यवाही पर अपना मत प्रकट करते हुए मौलाना महमूद मदनी महासचिव जमीयत उलेमा ए हिंद ने कहा कि हमारी संगठन  ने 16 दिसंबर 2019 को अपना प्रार्थना पत्र दाखिल किया था ,जिसमें मूलभूत तौर से सीएए को समाप्त कर देने की प्रार्थना की थी क्योंकि यह एक्ट भारतीय संविधान की धारा 14 और 21 के विपरीत है। इस एक्ट में गैरकानूनी शरणार्थी की परिभाषा में धर्म के आधार पर भेदभाव बरता गया है और उसमें सिर्फ मुसलमानों को छोड़ा गया है जबकि हिंदू ,सिक्ख,  बौद्ध, जैन और पारसियों को गैर-कानूनी शरणार्थी के वर्ग से बाहर कर दिया गया है। इसके अलावा एनआरसी के लागू होने के परिदृश्य में यह एक्ट मुसलमानों के साथ बड़ा अंतर करने वाला और भेदभाव वाला साबित होगा।
स्पष्ट रहे कि मौलाना मदनी ने अपनी तरफ से सीनियर वकील राजीव धवन की सेवाएं प्राप्त की हैं। जबकि आज अदालत में उनके अलावा एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड शकील अहमद सय्यद,  एडवोकेट नियाज अहमद फारुकी (सचिव जमीयत उलेमा ए हिंद), एडवोकेट दानिश सैयद , एडवोकेट परवेज दबास और एडवोकेट उजमा जमील भी मौजूद रहे।

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