Close X
Friday, July 30th, 2021

पुस्तक समीक्षा : पर्यावरण संकट और सुधार के प्रयास: वैश्विक परिदृष्टि


   समीक्षक :     प्रभात कुमार राय


आई एन वी सी न्यूज़  
नई  दिल्ली ,  

सामाजिक मुद्दों पर साहित्य की विविध विधाओं में बेवाक लेखनए टिप्पणी एवं चित्रण करनेवाले सशक्त हस्ताक्षर,  उमेश कुंवर कवि की अद्यतन रचना, 'पर्यावरण मौत या जिंदगी' वैश्विक फलक पर पर्यावरण संकट एवं आसन्न भयावहता को समेकित ढंग से  रेखांकित करता है । प्रमाणिक आंकड़ों एवं वैज्ञानिक सिद्धांतों का हवाला देने से यह बहुचर्चित विषय पर एक संदर्भ ग्रंथ की भांति है । इतने व्यापक वैश्विक परिदृश्य को मात्र 64  पृष्ठों में समेटना वाकई दुरूह कार्य है जिसे लेखक ने बखूबी कर दिखाया है । पर्यावरण से संबंधित समस्याओं, अवयवों और उपादानों का तथ्यपरक विशलेषण किया है । कई जगह स्थानीयता का पुट तथा  लेखक का बाढ़ की विभीषिका का भुक्तभोगी होना, पुस्तक को प्रभावी  बना दिया है। लेखक ने वायु प्रदूषण, जल  प्रदूषण, कचरे के प्रबंधन, गिरते भू.जल स्तरए जैव विविधता को नुकसान, भूमिध्मिट्टी का क्षरण एवं  ध्वनि प्रदूषण आदि प्रमुख पर्यावरणीय मुद्दों की चर्चाए समाधान हेतु उठाए गए कदम, उसकी सार्थकताए विफलता तथा पर्यावरण संतुलन संबंधी विवरण अपनी विशिष्ट शैली में किया है ।

        यह इत्तेफाक ही कहा जा सकता है  कि जब नवंबर 2020 में कवि जी की पुस्तक पढ रहा था, उसी वक्त समाचार पत्रों में इसी ज्वलंत मुद्दे पर दो प्रमुख समाचार मेरा ध्यान आकृष्ट किया, जो स्तव्धकारी था।

      1.  गर्म हुआ सबसे ठंडा इलाका

            साइबेरिया का वर्कहावास्क गाँव आर्कटिक सर्कल के उत्तर में मानव आबादी बाला ठंडा क्षेत्र है । यहां का तापमान -67.8 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है । जून 2020 में इस गाँव ने बिल्कुल उलटा रिकार्ड बना दिया : यहाँ का पारा + 38 डिग्री  सेल्सियस चढ़ गया और यह आर्कटिक सर्कल के उत्तर का सबसे गर्म इलाका बन गया । यानी यहां के न्यूनतम और अधिकतम तापमान के बीच करीब 100  डिग्री सेल्सियस का अंग पाया गया ।

  2.    क्रिसमस पर बीते दिनों की बात हो जायगी बर्फवारी

           जलवायु परिवर्तन के कारण 2040 तक इंग्लैंड के दक्षिणी हिस्से में बर्फवारी होनी बंद हो जायगी । इस सदी के अंत तक दुनिया के अधिकतर स्थानों पर बर्फवारी होनी बंद हो जायगी ।

         ध्यातव्य है कि 1850 से तापमान एवं अन्य मौसम संबंधी सूचकांकों का रिकार्ड रखा जा रहा है । 2015 से 2020 सबसे गर्म साल रहा है। 2020 खासकर जलवायु के लिए अत्यंत असाधारण रहा है क्योंकि भूमि, समुद्र तथा आर्कटिक में चरम पर तापक्रम पाया गया । 2020 में वैश्विक तापमान लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा है । इस साल वैश्विक तापमान को ठंडा करने वाला ला नीनो भी गर्मी रोकने में नाकाम साबित हुआ है । इससे यह आशंका बलवती हो गयी है कि 2024 तक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढोतरी हो जायगी ।

       दुनिया के कुल क्षेत्रफल का 2.4% परंतु विश्व की जनसंख्या का 17.5% धारण किये भारत में प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़  रहा है । खेती योग्य भूमि का बड़ा हिस्सा भूमि कटाव, जल भराव और लवणता आदि से ग्रस्त है । मिट्टी की ऊपरी परत से लगभग 12 अरब टन मिट्टी प्रतिवर्ष हमलोग खो रहे हैं ।  भूगर्भ जल का अत्यधिक दोहन हरित क्रांति के नाम पर विस्मयकारी है । भारत का वनक्षेत्र पूरे भौगोलिक क्षेत्र का 18.34% है जिसका आधा हिस्सा  मध्य प्रदेश एवं पूर्वोत्तर के सात राज्यों में  स्थित है । बढती जनसंख्या भारत के पर्यावरण क्षरण का प्राथमिक कारण है । आर्थिक विकास,  शहरीकरण व औद्योगिकरण,  प्राकृतिक संसाधनों का रिक्तीकरण, जैव विविधता का ह्रास, पारिस्थितिकी प्रणालियों के लचीलेपन में कमी से वर्ष, का स्वरूप बदल गया है तथा जलवायु परिवर्तन प्रकट हो गया है ।

         भारत में पर्यावरण संरक्षण का इतिहास पुरातन है । हड़प्पा संस्कृति पर्यावरण से ओतप्रोत थी। वेदों में सभी प्राकृतिक शक्तियों को देव-तुल्य माना गया है । अथर्ववेद ने जल को अमृत और औषधियों से परिपूर्ण माना है । सरिताओं को जीवन दायिनी कहा गया है है । पीपल, बरगदए  केला,  तुलसी, आंवला, बेल आदि वृक्षों की पूजा की जाती है । ऊर्जा के स्रोत सूर्य को देवता मान ' सूर्यदेवोभव्ष् कहकर पुकारा जाता है । आधुनिक विज्ञान जिसे इकोलोजिकल सायकिल  या पर्यावरण चक्र कहता है,  ॠग्वेद में उसे ' पर्जन्य ' कहा गया है । यानी मेघों के देव । आकाश पिता है और पर्जन्य उसका अमृत रस है जो धरती माता की हरितिमा का अनगिनत आख्यान गढता है:

       वि वृक्षान् हन्य्युत हन्ति रक्षसो

        विश्वं विभाय भुवनं महावयात् ।

       उत्तानामा ईधते वृष्णयावतो

     यत्परजन्य: स्वनयन् हन्ति दुष्कृतः ।।

जीर्ण वृक्ष/ टूटकर गिर पड़े हैं, /ध्कुटिल वृतियां हताहत है, / पर्जन्य के तप से भयभीत है भुवन,/ निष्पाप उठ खड़े हुए हैं/ पाप की जघन्य कृतियाँ/ जंगल की ओर भाग रही हैं।

(संस्कृत मर्मज्ञ डॉ मुरलीधर चांदनीवाला का सटीक रुपांतर)

 गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं को वृक्ष कहा है - ' समस्त वृक्षों में मैं अश्वत्ध हूँ ।' और बुद्ध ने जातक उपदेशों में स

स्वयं को  ष्वृक्ष देवता' कहकर इंगित किया है ।

 पर्यावरण मूलतः जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है । अलबर्ट आइंस्टाइन का कथन है : 'पर्यावरण वह हर चीज है जो मैं नहीं हूँ ।' व्यष्टि और स्वार्थपरता का पर्यावरण में कोई स्थान नहीं है। मारग्रेट मीड ने कहा है, ' हमारा कोई समाज नहीं होगा, अगर हम पर्यावरण  को नष्ट करते है।' विलासपूर्ण जीवन वृति और संसार को जितना दिया है उससे अधिक लेने की चेष्टा - ये निम्न कोटि की प्रवृतियां है । पर्यावरण का सीधा संबंध प्रकृति से है। पृथ्वी पर पाये जानेवाले भूमि, जल, वायु, वन, पेड़-पौधे,  जीव-जंतु समूह तथा जैविक एवं अजैविक घटकों के बीच अंतःक्रिया पारिस्थितिकी तंत्र का भाग है। मनुष्य चमत्कार भी कर सकता है और समस्याएं भी  उत्पन्न कर सकता है । जेम्स लवलैड ने सही कहा है, ' अफसोस है कि जंगल की तुलना में रेगिस्तान बनाना आसान है ।' जीव जगत में  मानव सबसे सचेतन एवं संवेदनशील प्राणी है, तथापि वह अपनी अनंत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अन्य जीव-जंतुओं, पादप, वायु, जल, और भूमि पर आश्रित है । अतः पर्यावरण पृथ्वी पर प्रकृति की असीम उपादेयता है । महात्मा गांधी ने कहा है, 'परमात्मा परिग्रह नहीं करता है,  वह अपने लिए आवश्यक वस्तु रोज-रोज पैदा करता है ।' साझी संपदा सबका है और उसे अपना बनाकर रखना परिग्रह है । पृथ्वी सभी जीव-जंतुओं की आवश्यकता की पूर्ति करने में पूर्णतः सक्षम है लेकिन लालच के लिए नहीं । यह हमें  हमारे स्वास्थ्य और विकास के लिए बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन प्रदान करती है लेकिन हम विवेकहीन और स्वार्थी होकर पर्यावरण को प्रदूषित करते जा रहे हैं । लेखक ने इस पर जोर दिया है कि पर्यावरणीय समस्याएं मनुष्य को अपनी जीवन शैली बदलने का प्रबल संदेश  दे रहीं है। पर्यावरण संरक्षण इंसानों और पृथ्वी के बीच सामंजस्य की स्थिति है । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ने कहा था, 'पेड़ एक तरंह से सुनने के लिए तैयार, स्वर्ग से बात करने के लिए, पृथ्वी का कभी न खत्म होने वाला प्रयास है ।'

             यह निराशाजनक है कि कोविड की आर्थिक मार से निजात पाने के लिए अधिकांश  देश जीवाश्म ईंधन के उत्पादन में अपेक्षित कमी ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से बचने का कारगर तरीका है । प्रतिवर्ष छह फीसदी की दर से जीवाश्म ईंधन के उत्पादन में कमी निहायत जरुरी है । इस लक्ष्य के लिए कोयला, तेल, और गैस उत्पादन के स्तर को घटाना होगा । वर्तमान संकेत के आधार पर भारत में तेल और गैस की मांग 2050 तक दुगुनी हो जायगी और भारत अत्यधिक तेल और गैस की मांग वाला हाटॅ स्पोट बन जायगा । जीवाश्म ईंधन हवाओं में ज़हर घोलते है तथा स्थानीय आबदियों पर घातक असर डालते हैं। अगर हम अविलंब नहीं चेतते है तो भविष्य में भारत भविष्य में  जलवायु परिवर्तन की लपेट में आनेवाला सबसे खराब अर्थव्यवस्थाओं में एक होगा ।

    निराशा के इस माहौल में आशा की कुछ किरणें परिलक्षित हो रही हैं ।यह आहलादकारी है कि माकॅ कापॅ-26, जो 150 देशों के युवाओं के नेतृत्व वाला संगठन है युवा केन्द्रित जलवायु नीतियों को गंभीरता से लागू करने के लिए विशेष पहल कर रही हैं । किसानों की ऐसी प्रथाओं को दूर करने के लिए भी जोर दे रही है जो मिट्टी पानी ईंधन की कटाई और जैव विविधता के लिए हानिकारक है । पर्यावरण को कुप्रभावित करने वाले पदार्थों को पर्यावरण हितैषी के रुप में  परिवर्तित करने के लिए नवाचार भी सराहनीय है । जल जमाव क्षेत्र के पानी से जलकुंभी को निकालकर जैविक खाद में परिणत करना काफी मददगार होगा। जलकुंभी जल में घुले आक्सीजन को खींच लेती है जो मछलीए  धान आदि के लिए घातक है ।  स्थानीय बरौनी थर्मल पावर स्टेशन का फ्लाई एश (छाय) वहां की वायु, जल और भूमि को बेतरह प्रभावित कर रहा था। चकिया से सिमरियाघाट तक छाय उड़ने से  सडक दुर्घटना भी होती थी । इस साल एलगभग 450 लाख टन फ्लाई एश नौ करोड़ रुपए में बेचा गया। इसका उत्पादक इस्तमाल सडक,  भवन, खदानों की भराई आदि में किया जाता है । मृदा स्वास्थ्य जांच कर उपयुक्त जैविक खाद या उर्वरक का प्रयोग कम लागत में अधिक उत्पादन देता है । मछली पकड़ने के अनुपयोगी उपकरणों  के नदी मे फेंके जाने से बड़े पैमाने में गंगा में प्लास्टिक प्रदूषण हो रहा जो डॉल्फिनए कछुआ आदि के लिए खतरनाक है । हाल में  इंग्लैंड के एक वैज्ञानिक ने  शोध की आवश्यकता बताई है । 9 दिसम्बर 2020 को एक सुखद समाचार सुनने को मिला । वर्षावनों  को बचाने के लिए रियो डी जेनेरिया की आदिवासी महिला नैयोर्दे नेरक्यूमो को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रतिष्ठित पर्यावरण पुरस्कार ष्ग्रीन नोबेल' से नवाजा गया है । इन्होंने अथक प्रयास कर इक्वाडोर के वर्षावनों को बचाने के लिए गहन अभियान चलाया । तेल कंपनियों द्वारा जंगलों में खनन किया जा रहा था जिससे पर्यावरण को व्यापक नुकसान होता । इन्होंने धैर्यपूर्वक कानूनी लड़ाई लड़ी और लगभग पांच लाख एकड़ में में मौजूद जंगलों को कटने से बचा लिया ।

      महान अर्थशास्त्री माल्थस ने 222 वर्ष पूर्व प्रकृति पर मानवीय दबाव को रेखांकित किया था। परवर्ती वैज्ञानिक चेतना ने इसे झुठलाने के लिए कुतर्को का सहारा लिया। नतीजतन जनसंख्या विस्फोट से मानव अपनी सुख-सुविधाओं के लिए प्रकृति का विवेकहीन दोहन करता गया। माल्थस की अवधारणा कोविड-19 के इस  दौर मे  समीचीन है  प्रकृति  महामारीए  आंधी-तूफान, अकाल,  वज्रपात आदि के जरिये अपना नियंत्रण  सोचेगी ।  यह विडम्बना है कि प्रकृति बार-बार आगाह कर रही है लेकिन इंसान इन प्रबल संकेतों को नजरअंदाज कर रहे हैं। हमें प्राकृतिक आपदाओं और प्रकोपों से बचने के लिए निरोधात्मक उपाय तो करने ही है तथा प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन की राहें भी ढूढनी है ताकि पर्यावरण संतुलन कायम रह सके । प्रकृति अद्भूत समावेशी है । तभी तो राजस्थान जैसे रेगिस्तानी प्रदेश को भी माउंट आबू जैसे सुंदर पहाड़ को भेंट देती है  और मध्यप्रदेश जैसे पठार को पचमढी की। लेकिन हम उन्हें प्रकृति की देन न मानकर अपना विशेषाधिकार समभने लगे है । सचमुच कोई तुलना नहीं है हमारे रचे कृत्रिम जगत में और ईश्वर की बनायी प्रकृति में ।

       हमें मानना है कि पर्यावरण विरासत में नहीं मिला है बल्कि हम अगली पीढ़ी से इसे उधार में लिया है ।अत: हमारा यह फर्ज है कि हम इसे चक्रवृद्धि व्याज के साथ अपने बच्चों को सौंप दे । हमें हर संभव प्रयास करना है कि जब हम आये थे उसकी तुलना में पृथ्वी को एक बेहतर स्थान के रुप मे छोड़ जाएँ ।

  लेखक ने विभिन्न पर्यावरण आंदोलनों तथा पर्यावरण संबंधी अंतर्राष्ट्रीय न्यायाचार के बारे मे टिप्पणी की है। वन, जल तथा भूमि से संबंधित आन्दोलनों ने विभिन्न  सरकारों की पर्यावरण नीतियों पर कठोर प्रहार किया है । उत्तरी गोलार्द्ध तथा गरीब और विकासशील देश यानी दक्षिणी गोलार्द्ध पर्यावरण के अलग-अलग एजेंडे के पैरोकार हैं । उत्तरी देशों की मुख्य चिंता ओजोन की परत में छेद और वैश्विक तापवृद्धि को लेकर रही है । वहीं दक्षिणी गोलार्द्ध वाले देश आर्थिक विकास और पर्यावरण प्रबंधनके आपसी रिश्ते को सुलझाने के लिए ज्यादा चिंतित थे। अंतरराष्ट्रीय समझौतों में  भी सम-दम की टेढ़ी घात चलती रहती है । अपुष्ट वैज्ञानिक साक्ष्यो  और समय-सीमा लेकर मतभेद पैदा होते हैं । विकसित देशों ने अनियंत्रित औद्योगिक विकास के कारण पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया  है। अत: उन देशों को उस नुकसान की भरपाई की अतिरिक्त जबाबदेही भी स्वीकार करनी है। विकासशील देश औद्योगिकरण की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं । अत: उनपर उतने कड़े प्रतिबंध,  जो विकसित देशों पर लगाया जाना है, न्यायोचित नहीं होग। पर्यावरण कानून के सूत्रीकरण, कार्यान्वयन, और व्याख्या में विकासशील देशों की विशिष्ट ज़रूरतों को तव्वजो देना जरूरी है ।

     लेखक ने पुस्तक के अंत में 'हर साल अप्रैल और मई, दो माह का लाकॅडाउन सख्ती से पालन करने की हिदायत भी दे डाली है। सख़्त लाकडाउन की अवधि मे वायु, जल, ध्वनि प्रदूषण में आश्चर्यजनक कमी हुई थी क्योंकि वाहन, कलकारखाने आदि बंद हो गये थे । हिमालय की चोटियां दूरस्थ जगहों से दृष्टि गोचर  हो  रहा था। वन्यजीव निर्भय होकर विचरण कर रहे थे । सूनापन और शांत वातावरण के कारण रिहायशी क्षेत्रों में भी वन्य प्राणी पाये गये थे ।

     ज्ञातव्य है कि लेखक की दर्जनाधिक पुस्तकें निबंध, कहानी, मीमांसा, उपन्यास एवं कविता आदि विधाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं ।यह प्रतीत होता है कि लेखक जार्ज बर्नार्ड शा की उक्ति, 'विचारों के युद्ध में पुस्तकें ही अस्त्र है' के प्रबल पक्षधर हैं । समीक्ष्य पुस्तक लेखक की पैनी सामाजिक चेतना और साहित्यिक हुनर का प्रशंसनीय संश्लेष है एवं संग्रहणीय है ।



कृति:  पर्यावरण: मौत या जिंदगी,  कृतिकार: उमेश कुंवर कवि
पृष्ठ 64 , मूल्य 200/- 



समीक्षक परिचय -:

प्रभात कुमार राय

मुख्यमंत्री, बिहार के ऊर्जा सलाहकार

 
Former Chairman of Bihar State Electricity  Board & Former  Chairman-cum-Managing Director Bihar State Power (Holding) Co. Ltd. . Former IRSEE ( Indian Railway Service of Electrical Engineers ) . Presently Energy Adviser to Hon’ble C.M. Govt. of Bihar . Distinguished Alumni of Bihar College of Engineering ( Now NIT , Patna )  Patna University. First Class First with Distinction in B.Sc.(Electrical Engineering). Alumni Association GOLD MEDALIST  from IIT, Kharagpur , adjudged as the BEST M.TECH. STUDENT.
 
Administrator and Technocrat of International repute and a prolific writer . His writings depicts vivid pictures  of socio-economic scenario of developing & changing India , projects inherent values of the society and re-narrates the concept of modernization . Writing has always been one of his forte, alongside his ability for sharp, critical analysis and conceptual thinking. It was this foresight and his sharp and apt analysis of developmental processes gives him an edge over others.
 
 

Disclaimer : The views expressed by the author in this feature are entirely his own and do not necessarily reflect the views of INVC NEWS.

 

                   

 

 

 

Comments

CAPTCHA code

Users Comment