Wednesday, October 23rd, 2019
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देशभक्ति की वैचारिक बाजीगरी के राजनैतिक खेल में अपरिपक्व मानसिकताओं का अपहरण

- प्रो.(डॉ.) डी.पी. शर्मा “धौलपुरी“ -
Prof.(Dr.)-DP-Sharmaवर्तमान माहौल में ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान एक बार फिर अमन और चैन के मंच से उतर  कर, आपसी नफरत एवं संघर्ष की ओर दुनिया में उतरने की ओर अग्रसर हो चला है / भारत जैसे लोकतान्त्रिक राष्ट्र में आज देश के प्रति प्रेम एवं नफ़रत को दिखाने अथवा छिपाने की नहीं, वल्कि नफ़रत के इस बवंडर को राजनीति एवं प्रायोजित विचारों के सहारे आगे बढ़ने से रोकने की है जो मालूम नहीं देश में संवैधानिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अंतर्राष्ट्रीय सहिष्णुता की पहचान को न जाने किधर ले जा रही है /हैदराबाद यूनिवर्सिटी से उठा ये प्रायोजित बवंडर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से होते हुए आज देश की वैचारिक एवं राष्ट्रीय फिजां को प्रदूषित ही नहीं वल्कि ऐसी दिशा में ले जा रहा है जहाँ हर युवा कुछ न कुछ राष्ट्रीय स्तर की कंट्रोवर्सी /विवाद पैदा कर रातों रात हीरो बनने के सपने को साकार करने के लिए आतुर है/ बात देश के विरुद्ध बोलने अथवा देश की तारीफ की नहीं वल्कि ऐसी प्रवृत्तियों से उपजे राजनीति के नवीन पैंतरों की है जिनसे लोग रातों रात देश की सुर्ख़ियों में आकर सेलिब्रिटी बनना  चाहते हैं / कोई देश के प्रति जहर उगल कर तो कोई उसको तमाचा मारकर / कोई किसी देश की जय बोलकर तो कोई उसको सरेआम पीटकर/ युवा शक्ति का ऐसा दुरुपयोग शायद ही किसी ने भारत के आलावा किसी लोकतान्त्रिक देश में  देखा होगा / अमेरिका, रशिया, इंग्लैंड एवं जापान जैसे देश आज देश के प्रति सम्मान के भाव से  न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गए और हम हैं कि देश की आजादी के लिए प्राण देने वाले शहीदों  को आदर्श मानने के बजाय ऐसे लोगों को 'शहीद ए आजम' कहने एवं सम्मानित करने के लिए बैचेन हैं जिसने हमारे राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी से बदला लेने के लिए चाहे मातृभूमि को गाली ही क्यों न दी हो / क्षेत्रीयता की माला किसी को इसलिए पहनाई नहीं जानी चाहिए कि उसने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ लड़ते हुए देश के प्रति असम्मान व्यक्त किया हो / चाहे वो किसी भी  पार्टी अथवा विचारधारा का क्यों न हो / किसी भी राजनैतिक पार्टी अथवा  सरकार को ऐसे तत्वों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही करनी चाहिए जो देश की फिजाँ में जहर घोलने अथवा राष्ट्रीय अक्षुणता को नष्ट करने के किसी भी कार्य में लिप्त हों / आज हम सीमाओं पर दुश्मनों के नापाक इरादों , कुचक्रों एवं बढ़ते गोला  बारूद के  बीच भारत माता की जय एवं उससे उत्पन्न नफरतों को हवा देने में  मशगूल हैं, तो ऐसा लगता है ये सारा माजरा अख़बार की सुर्खियां बटोरने के लिए प्रायोजित है / वर्ना वैचारिक दृष्टि से "पप्पू" जिनका देश के लिए योगदान न के बराबर हो और महज देश  के प्रति गालीबाजी एवं नफरत को  हवा देकर अथवा देश भक्ति से सरावोर कुछ नारेबाजी कर देश के अखबारी पन्नों पर अपनी फोटो छपवाने में कामयाब न हो जाते  /  भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश के चौथे सबसे बड़े स्तम्भ कहे जाने वाले  मीडिया से भी उम्मीद की जानी चाहिए कि खबर को खबर ही रहने दिया जाये, और ऐसे तत्वों को हीरोगीरी का ताज   पहनने से  रोका जाये /  आज देश के लिए शहीद होने वाले को चौथे पेज पर श्रद्धांजलि देकर वेगुनाह एवं हत्यारे संगठनों के आकाओं को अख़बार के प्रथम पृष्ठ पर सम्मानित कर हम भी आखिर अपनी कलम की ताकत को किधर ले जा रहे हैं ? ये भी अहम एवं विचारणीय प्रश्न है हमारे लिए, क्योंकि हम महज "खबर के लेखक"  ही नहीं वल्कि लोकतंत्र में सही एवं गलत में भेद को "सम्पादित करने के सच्चे प्रहरी" भी  हैं/ आज संविधान  की व्यवस्थाओं की ओट  लेकर हम चिल्ला चिल्लाकर कह रहे हैं कि हमें बोलने ( कुछ भी अनर्गल), खाने ( कुछ भी चाहे वो अखाद्य ही क्यों न हो) और  कुछ भी करने  ( निर्दोषों की जान ही लेना क्यों न हो) का अधिकार है/ ये 'संवैधानिकज्ञानी' लोग ये क्यों भूल रहे हैं कि संवैधानिक अधिकारों के साथ साथ कर्तव्य भी जुड़े  हुये हैं, जरा उन्हें भी पढ़ लेते तो ठीक रहता  / अगर अधिकार एवं कर्तव्यों को समग्रता से पढ़ा होता तो देश में ऐसी हरकत  न होतीं  / अधिकारों के एक  पहिये से उड़ान भरकर देश की फिजां में जहर घोलने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए / ऐसीं मनोवैज्ञानिक एवं संवैधानिक विद्रूपदाओं से देश को खंडित करने एवं गलत को सही साबित करने के प्रयासों पर  अव विराम लगना  ही चाहिए  / देश है तो संविधान है, संविधान है तो देश का कानून है, और कानून है तो कानून को मजहब, जाति  एवं व्यक्ति विशेष को देखे बिना अपना काम करना चाहिए  /  देश एवं इंसानी रिश्तों को चाहे वो इंसानी माँ से हों या फिर मातरे वतन से, हमें अक्षुण्ण  रखना ही होगा / माँ शब्द किसी भी मजहब, देश एवं जीव के लिए सार्वभौमिक रूप से सम्मानीय एवं रचना का ध्योतक है / जो तथाकथित धर्म ध्वज रक्षक अपनी माँ को माँ कहने से इंकार कर  सकते हैं, उसे अपशब्द कहने की हिमाकत कर सकते हैं, वो चाहे किसी भी मजहब के क्यों न हों कम से कम देशभक्त एवं सामाजिक शांति प्रेमी तो नहीं हो सकते / माँ का सम्मान शायद हर मजहब में जायज है / अपनी मात्रृ भूमि को  हानि पहुचने वाला व्यक्ति किसी भी देश की धर्म एवं संस्कृति में प्रंशंसनीय नहीं हो सकता, तो फिर भारत में क्यों? क्यों हम अपने ही देश एवं उसके संविधान की वैचारिक स्वतंत्रता को जग हँसाई का कारण बना रहे हैं ? कुछ वक़्त पहले देश में एक दौर वैचारिक अशहिष्णुता का चला / पुरष्कार लौटाने के नाटक खेले गए/ कुछ विचारकों, लेखकों को अपनी जान गंवानी पड़ी तो कुछ को अद्भुत भारत के छद्म राजदूत के ताज से हाथ धोना पड़ा/ वैचारिक लेखनी एवं पुरष्कार विशुद्ध राजनीति एवं व्यापारिकता की रणनीति से परे होने चाहिए थे  /   लेकिन ऐसा हुआ नहीं और अक्सर होता भी नहीं अथवा धीरे धीरे कम होता जा रहा है / हमने काल एवं इतिहास, सत्य एवं तथ्य को भी पार्टियों की विचारधारा से जोड़कर तोडना मरोड़ना शुरू कर दिया है, आज  से नहीं वल्कि उस वक़्त से जब विचार सिर्फ विचार हुआ करता था, थोपा हुआ तथ्य नहीं / गनीमत है कि शांति के मार्ग का वह दौर अब शांत हो गया है / ज्ञात रहे कि दुनियां में ऐसे भी देश हैं जहाँ एक क्रिश्चियन लड़की का नाम 'मेरुन सईद हुसैन' हो सकता है तो हमारे यहाँ अम्मी को माँ कहने से इतना बवाल  क्यों?  और कुछ लोग यदि नहीं भी कहें तो कोई बात नहीं परन्तु मातृभूमि के खिलाफ बोलने से जिन लोगों की भावनाएं आहत होतीं हैं उन्हें संयम से काम लेकर अमन चैन को कायम रखना चाहिए / ऐसा लगता है कि हम हिन्दुस्तानी लोग ही शायद दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के सबसे नासमझ वाशिंदे हैं/ शायद  इसी आपसी फूट के कारण  हम आक्रांताओं द्वारा परास्त होकर ८०० साल तक परतंत्रता की बेड़ियों में  जकड़े रहे / हमारे देश की छबि दिन व दिन बलात्कारी, गद्दारी एवं स्वेक्षाचारी जैसी क्यों बन रही है, ये एक ज्वलंत मुद्दा है जिस पर हर देशवासी को सोचना चाहिए, हर पार्टी को सोचना चाहिए/  हमें सरकार की जिम्मेदारी से परे स्वयं प्रयास करने चाहिए कि  ये जहर देश की धमनियों में और न फैले/ आज अहम प्रश्न ये है  आखिर हमने सत्तालोलुपता एवं सेलिब्रिटी बनने के असंवैधानिक तरीकों, सामाजिक पिछड़ेपन एवं कौमी फ़साद को देश का  श्रृंगार क्यों बना लिया है ?  इसे विकृत सोच ही कहा जायेगा कि देश की सीमाओं पर क्या हो रहा है? देश में आर्थिक विकास किधर जा रहा  है? कौनसी समस्याएं देश के भूमंडलीकृत  विकास को अवरुद्ध कर रहीं हैं? ये सोचना सिर्फ सरकार का काम है, शायद हमारा नहीं / ईश्वर न करे कि  कुछ गलत हो जाये / यदि हो जाये तो हमारा  काम है,  निंदा, घोर निंदा करना अथवा सड़कों पर राष्ट्रीय अधिकार  के रूप में सरकारों के खिलाफ हिंसक /तोड़ फोड़ वाला आंदोलन करना ताकि सरकारों को समस्याओं एवं सीमाओं से हटकर हमें सम्भालना पड़े  / ऐसा तो सिर्फ बच्चे ही कर सकते हैं, इस बात से बेख़बर होकर  कि  "राष्ट्र (माता - पिता स्वरुप)" किन हालातों से गुजर रहा है / युवा शक्ति को राजनैतिक लाभ के लिए भटकाकर आखिर हम किधर ले जा रहे हैं ? किसी को राजनैतिक आतंकवाद से प्रेम तो किसी को आतंकवादी से प्रेम, किसी को अपने क्षेत्र से प्रेम तो दूसरे को उसके क्षेत्र से नफरत, एक राज्य के वाशिंदे को दूसरे राज्य के 'डीएनए' से नफ़रत; हर राज्य के प्रथक डीएनए के दावों के बीच सवाल उठता है कि इस देश का डीएनए  कौनसा है  ? आखिर ये देश किसका  है ? एक शायर ने ठीक ही कहा है कि - " वतन की फिक्र कर नादाँ , मुसीबत आने वाली है  / तेरी बर्बादियों के  मशविरे हैं, आसमानों में " हमें ये  नहीं भूलना चाहिए कि, एक राष्ट्र पर जब आपदा आती है तो वो ये नहीं देखती कि  किस मोहल्ले में कितने हिन्दू, कितने मुसलमान एवं कितने ईसाई अथवा कितने बिहारी, कितने राजस्थानी एवं कितने गुजराती रहते हैं? आपदा का किसी भी धर्म, क्षेत्र एवं ईमान  से लगाव एवम अलगाव नहीं होता / जैसा कि अभी हाल में  पाकिस्तान के स्कूल में हुआ, केरल के मंदिर में हुआ / मारे गए बच्चे स्कूल के थे किसी मजहब विशेष के नहीं, मारे गए श्रृद्धालु एवं पटाखा मजदूर   देश के थे न कि किसी क्षेत्र अथवा धर्म के / हमें सोचना चाहिए  कि देश के प्रति कमजोर होती हुई देशभक्ति एवं राष्ट्रीय  जज़्बात आज युवाओं को किधर ले जा रहे हैं ? आज बेकारी से जूझते दिक्भ्रमित युवा चंद रुपियों की खातिर खटका होते ही ठांय-ठांय करते हैं और अधकचरे ज्ञान के कारण अपनी ही गोली अथवा अपनी ही बोली से ढेर हो जाते हैं/  आज भी देश में ऐसे हिन्दू एवं  मुसलमान हैं, जिन्हें राजनैतिक शिगूफों में पिरोये मज़हबी शब्द वाणों, फतवों से कोई सरोकार नहीं / उन्हे चिंता है तो सिर्फ देश की खुशहाली एवं इंसानी रिश्तों की, जो कभी भी धर्म की सीमाओं  में  बंध न सके / देश के प्रधानमंत्री का ये हालिया बयान कितना प्रासंगिक है कि हमें देश का विकास चाहिए , सबके साथ भी, सबके लिए भी /  अच्छे बुरे लोग हर काल, हर जगह एवं  हर धर्म में  हैं, क्षणिक लाभ के लिए दिक्भ्रमित युवाओं का कोई भी भविष्य नहीं हो सकता  / हमें युवाओं को सामाजिक सौहार्द से परे दरिंदगी एवं गद्दारी के रास्ते पर भटकने से बचाना होगा  / सुना है कि दरिंदगी एवं ग़द्दारी के 'डीएनए' में ज्यादा फर्क नहीं होता / हमें एक राष्ट्र में अनेक राष्ट्र "...... स्तान   " की अवधारणा को ख़त्म करना ही होगा/ हमें मज़हबी फ़साद के जुमलों एवं दरिंदगी के कुत्सित विचारों से बाहर आना ही होगा/ धर्म एवं जाति का विवेध  मिटाना ही होगा, तभी ये देश आगे बढ़ेगा, समाज आगे बढ़ेगा और खुशहाल समाज नफरतों के बादलों को बिखेरकर कौमी एवं जातीय एकता के साथ साथ राष्ट्र भक्ति का नवीन सन्देश, नया सवेरा लेकर आएगा ..... समय रहते, आ अब लौट चलें.....
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Prof.(Dr.)-DP-SharmaAbout the Author
Prof.(Dr.) DP Sharma
International consultant/adviser (IT), ILO (United Nations)-Geneva
प्रोफेसर  डी पी शर्मा  एक स्वतंत्र स्तंभकार एवं अंतर्राष्ट्रीय कंसल्टेंट /सलाहकार, आई.एल.ओ. ( यूनाइटेड नेशन्स एजेंसी )  के साथ महर्षि अरविन्द इंस्टिट्यूट रिसर्च सेण्टर अंडर राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय जयपुर से  जुड़े हुए हैं / डॉ शर्मा को सूचना तकनीकी एवं पुनर्वास योजनाओं के क्षेत्र में किये उल्लेखनीय  कार्यों के लिए तकरीबन 46 अवार्ड्स एवं प्रशंसा पत्रों से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है जिनमें "गॉड फ़्रे फिलिप्स नेशनल गैलेंट्री अवार्ड, प्रेसिडेंसियल अवार्ड  एवं सरदार रत्न इंटरनेशनल अवार्ड  फॉर टाइम अचीवमेंट्स प्रमुख हैं/
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Prof. M L Kalra, says on December 12, 2016, 1:21 PM

Dear Sharma ji, Thank you for such a daring and thought provoking article.Particularly present youth may learn a lot from this article and utilize their energy for uplift of their dear motherland.Media should also play a creative and responsible role as you have pointed out. May Almighty God give you courage and dedication to serve the nation in such constructive ways. Best Wishes for your every endeavour in the interest of our dear Motherland that is Bharat Mata

Aparajita Dixit, says on December 7, 2016, 11:38 AM

Too good sir. Such a well composed one. It reflects the harsh reality and depicts the actual picture. Worth reading & hats off to your efforts sir. We're proud to see such work of yours.

Prof DP Sharma, says on December 6, 2016, 11:23 PM

Dear Dhanopia Ji Your thoughts are in the line of nation and we Appreciate Much You picked the real nurve regards dps

Prof DP Sharma, says on December 6, 2016, 11:22 PM

Dear Dhanopia Ji Your thoughts are in the line of nation Appreciate Much regards dps

rajendra Singh, says on December 6, 2016, 7:32 PM

Very true. Reflects true situation.

rajendra Singh, says on December 6, 2016, 7:30 PM

Agreed.

Deepshikha, says on December 6, 2016, 3:29 PM

Agree with you.

Deepshikha, says on December 6, 2016, 3:26 PM

Too gud sir...

Sandeep jain, says on December 6, 2016, 2:34 PM

Very true! Very nice Sir!

SUJEET SRIVASTAV, says on December 6, 2016, 2:21 PM

Bhaeya bhut hi achachha likha hai.

Dr. Ashish saravag, says on December 6, 2016, 2:06 PM

Very nice thought sir.

ajay sharma, says on December 6, 2016, 1:53 PM

Bahut achha likha h bhaishahab or hindustan ki sachchai h

Vivek Dhanopia, says on December 6, 2016, 1:45 PM

Very rightly said , depicts true picture of the current scenario. Individual interests have shadowed the national interests.

Prof DP Sharma, says on December 6, 2016, 2:12 AM

Dear Sir Thank you very much for your nice and thought provoking words Kindly share in your circle Regards

Dr. G.R.Kulkarni, says on December 5, 2016, 9:42 PM

अपने हिन्दुस्तान को सारे जहाँ से अच्छा हमें मिलकर बनाना ही होगा, इसके गुलिस्तान को फूलों से सजाना ही होगा। देश हमें स्वयं से पहले रखना ही होगा।