Monday, November 18th, 2019
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कहानी आत्मग्लानी - भाग 2 : लेखिका सीमा अग्रावाल

आत्मग्लानी

Seema-Agarwal-poetessSeema-Agrawal-writer-writer-Seema-Agrawalstory-written-Seema-Agrawal1 दो साल की अनवरत लेखन यात्रा के पश्चात आज उसके जीवन का वो पल था जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी l पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित हो रही उसकी कविताओं से प्रभावित हो कर एक प्रकाशक  ने उसकी कविताओं का संकलन प्रकाशित करने का प्रस्ताव दिया था l अब वो संकलन प्रकाशित हो कर उसके हाथ में था l  शहर के नामी गिरामी रचनाकारों और पत्रकारों ने उसकी कविताओं पर बहुत अच्छी प्रतिक्रियायें दी थीं l मूर्धन्य साहित्यकार आचार्य सुखदेव जी के हाथों पुस्तक का विमोचन होना तय हो चुका था l उसका उत्साह सातवें आसमान पर था l विमोचन स्थल और अतिथियों को निमंत्रित करने आदि की व्यवस्था स्वयं प्रकाशन घर ने की थीl उसे सिर्फ अपने अतिथियों को आमंत्रित करना था वह सारा काम भी संस्कार और सौम्या ने कर दिया था l कल विमोचन था वो बार बार अपना वक्तव्य पढ़ कर अभ्यास कर रही थी यह पहला अवसर था जब उसे इतने प्रतिष्ठित साहित्यकारों के बीच अपने विचार रखने का अवसर मिला था l मन में चिंता के साथ साथ खुशी भी थी l तभी मोबाइल बज उठा संस्कार की आवाज़ सुनायी दी आवाज़ में परेशानी और हिचकिचाहट दोनों झलक रही थी l

 "माँ कैसी हो...सब तैयारी हो गयी है न?" "हाँ मेरी तो सारी तैयारियां हो चुकी हैं तुम लोग कब  पहुँच रहे हो, और तुम्हारी आवाज़ में इतनी परेशानी क्यों सुनायी दे रही है तबीयत तो ठीक है न" l "हाँ माँ मैं तो ठीक हूँ पर सौम्या की तबियत अचानक ही खराब हो गयी वो अस्पताल में भरती है मैं शायद कल न आ सकूं l"

"क्यों क्या हुआ? नहीं नहीं संस्कार ऐसा नहीं हो सकता..... आज मैं सौम्या को ऐसा नहीं करने दूंगी" अचानक मिले इस पैगाम से वो हडबडा उठी सौम्या के प्रति चिंतित होने की बजाय एक आक्रोश उसके मन में उभर आया l शायद पिछले दो सालों से जो लावा उसके सीने में दफन था सौम्या के विरुद्ध फटने को हो आया l एक वो दिन था जब विवेक के जाने के बाद उसे संस्कार की सबसे अधिक ज़रुरत थी और आज का दिन जब हर हाल में उसे संस्कार का साथ चाहिए था l उस दिन भी सौम्या दीवार बन कर उसके और उसके बेटे के बीच आ गयी थी, और आज भी जब उसके जीवन की सबसे बड़ी खुशी मिलने वाली है तो एक बार फिर सौम्या उसको संस्कार के साथ से महरूम करने वाली थी l

"कैसा नहीं करने  दोगी मां ?????क्या हुआ?" दुःख और क्रोध के कारण उसके गले से आवाज़ नहीं निकल पा रही थी l

"संस्कार सौम्या के इस नाटक को मैं अच्छी तरह  समझती हूँ...... वो चाहती ही नहीं कि तुम किसी भी खुशी या दुःख में मेरे साथ रहो, मुझे अकेले एक नौकरानी के भरोसे छोड़ कर अभी भी उसका जी नहीं भरा क्या जो इस खुशी में भी आग लगाने को बेचैन हैं l तू भी उसकी हर गलत बात में उसका ही साथ देता चला आ रहा है l तुझे कोई आत्मग्लानी न हो इस वजह से मैं पिछले दो वर्षों से चुप हूँ मगर आज मैं उसकी योजना कामयाब नहीं होने दूंगीं तुझे हर हाल में आना है वरना आज के बाद हम दोनों का रिश्ता हमेशा हमेशा के लिए समाप्त"

एक सांस में उसने अपने मन की सारी भड़ास निकाल दी l दूसरी तरफ संस्कार क्या सोच रहा है या क्या कहना चाहता था यह सुने बिना ही उसने मोबाइल ऑफ कर दिया l कमरे से बाहर फूली उसकी सारी बातों को और आक्रोश को देख सुन रही थी, उसने पहली बार अपनी दीदी माँ को इतने गुस्से में देखा था l वो दौड़ कर पानी ले कर उसके पास आ कर  खडी हो गयी.... वहाँ सब ठीक तो है न दीदी माँ सौम्या दीदी को क्या हुआ है? पर प्रज्ञा बिना कुछ जवाब दिए बाहर बगीचे में आ गयी l जैसे स्वयं को आश्वस्त करना चाहती थी, कि कुछ भी ख़ास नहीं हुआ है और उसने जो भी किया है ठीक किया है और इसके बाद सब कुछ ठीक हो जाने वाला था l अब उसे कल का इंतज़ार था देखना चाहती थी संस्कार किसे चुनता है l उसका  विद्रोह आज हार या जीत के फैसले पर अड़ा हुआ था l रात भर ठीक से सो नहीं सकी सुबह सुबह नींद का एक झोंका आया होगा, आँख खुली तो 10 बज रहे थे फूली उठ चुकी थी रसोई से ख़ट-पट की आवाजें आ रहीं थीं लेटे लेटे ही उसने फूली को आवाज़ लगाई.....

"फूली चाय ला दे सर बहुत भारी हो रहा है तूने उठाया क्यों नहीं मुझे?" फूली ने रसोंईं से ही जवाब दिया "दीदी माँ कुल्ला कर लो........ नाश्ता भी बना दिया है कुछ खाकर सर दर्द की गोली ले लीजिएगा"

उसे भी फूली कि बात ठीक लगी l उठकर वो बाथरूम में चली गयी l बाथरूम से निकल कर जैसे ही बाहर आयी, सामने संस्कार चाय की ट्रे लेकर उसका इंतज़ार कर रहा था और उसके पीछे खडी फूली मुस्कुरा रही थी l उसकी तो खुशी का ठिकाना नहीं था l कुछ क्षण तो वो अपनी जगह पर खडी की खडी ही रह गयी l संस्कार बहुत थका हुआ दिख रहा था शायद रात भर की ड्राइविंग की वजह से l संस्कार ने ट्रे बिस्तर पर रख कर झुक कर उसके पैर छुएl  प्रज्ञा ने संस्कार का माथा चूमते हुए गले से लगा लिया l संस्कार वहीं उसके पास बिस्तर पर लेटते हुए बोला... "माँ मैं कुछ देर सोऊँगा आप चाय पी लीजिये कल रात से एक मिनट भी नहीं सो सका हूँ"

कहते कहते उसकी आँखे मुंदी जा रही थीं l उसने ममता से संस्कार के बालों में हाथ फिराते हुए पूछा क्यों क्या हुआ ऑफिस में ज्यादा काम आ गया था क्या?" उनींदी आवाज़ में ही संस्कार ने जवाब दिया..... "नहीं माँ परसों रात ही सौम्या की तबीयत अचानक ही बिगड़ गयी और अचानक ही उसे अस्पताल में भर्ती  करना पडा l अस्पताल ??????????? पर क्यों ??? अचानक ????"  "माँ मैं सोना चाहता हूँ l दो तीन घंटे सो लेने के बाद बात करूंगा"

कहते कहते संस्कार नींद में चला गया l वो समझ नहीं पा रही थी क्या कहे l इसका मतलब बच्चे घर पर अकेले ही होंगे l  सौम्या के साथ अस्पताल में कौन होगा ? उसकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी l कल संस्कार से फोन पर बात होने के बाद उसने गुस्से में अपना मोबाइल भी ऑफ कर दिया था l संस्कार के यह कहने के साथ ही कि सौम्या की तबीयत ठीक नहीं है और वो नहीं आ पायेगा वो उस पर बरस पडी थी l आत्मग्लानी से वो भर गयी....... "ओह कितना परेशान किया उसने संस्कार को" पर ये सब कुछ यूं ही तो नहीं हुआ था? इसकी वजह भी तो सौम्या थी, जिसने संस्कार को इस बात के लिए, मजबूर कर दिया था कि प्रज्ञा को अकेला ही रहने दे पर दूसरे ही क्षण उसे नाज़ हो आया अपने बेटे पर जिसने आज उसके लिए अपनी पत्नी  की तबीयत की भी परवाह नहीं की थी l

11 बजे तक संस्कार सोकर उठा l उठते ही सबसे पहले उसने अस्पताल में फोन किया l कुछ परेशानी के भाव उसके चेहरे  पर देखकर प्रज्ञा भी थोडा परेशान हुयी l फोन रखते ही प्रज्ञा के पूछने पर उसने बताया....... "माँ सौम्या का बी पी  सामान्य नहीं हो रहा है डॉक्टर का कहना है यदि ऐसे ही रहा तो उसकी किडनी या मस्तिष्क पर असर हो सकता है l" संस्कार बता रहा था..... माँ आपकी किताब के प्रकाशन को ले कर सौम्या बेहद उत्साहित थी l और तबीयत खराब होने के बावजूद ऑफिस से सिर्फ इसलिए छुट्टी नहीं ले रही थी क्योंकि उसे आपकी पुस्तक के विमोचन के उत्सव में शामिल होने के लिए अवकाश लेना था........" कहते कहते संस्कार कुछ भावुक सा हो गया l प्रज्ञा सब सुन रही थी पर सौम्या के व्यवहार पर विश्वास बिलकुल भी नहीं कर रही थी l संस्कार को सौम्या के लिए अति भावुक होते देख वो एक बार फिर बिफर पडी.....

"सब झूठ है,  वो आना ही कब चाहती होगी उसे तो तुम्हारे आने से भी दुःख हो रहा होगा l पर शायद भरपूर कोशिश के बाद भी इस बार वो माँ-बेटे के बीच नहीं आ सकी l उसने योजना तो अच्छी बनायी l सोचा होगा माँ को अकेली छोड़ देंगे तो शायद माँ  अकेलेपन  की इस घुटन को ज्यादा दिन नहीं झेल सकेंगी, छुटकारा मिलेगा उसे इस ज़िम्मेदारी से पर उसने  यह कल्पना भी नहीं की होगी कि माँ इतनी कमज़ोर नहीं हैं l  मैंने इस घुटन से निकलने का न सिर्फ रास्ता खोजा बल्कि सफलता की एक अलग ही मंजिल पा ली l उसके रक्तचाप बढ़ने और तबियत खराब होने का एक कारण उसकी  योजना का असफल  रहना  भी होगा '' .

वो बोलती चली जा रही थी जैसे सब कुछ उड़ेलकर खाली हो जाना चाहती थी l संस्कार ने उसे कई बार रोकने की कोशिश की परन्तु आज तो जैसे उसके संयम के सारे बाँध टूट चुके थे उसकी शब्द यात्रा जारी थी......

".........अगर आज तू नहीं आता न संस्कार तो मैं भी ठान चुकी थी कि इसके बाद तुम दोनों से मैं भी अपने सारे रिश्ते समाप्त कर लूंगी l और हाँ सौम्य को भी ये समझा देना कि मैं आज तक सिर्फ अपने बेटे की खुशियों की खातिर ही चुप थी ... आज के बाद से मेरे और सौम्या के बीच के सारे रिश्ते समाप्त समझना.... मर गयी सौम्या मेरे लिए आज से..."

उसके इस आखरी वाक्य के साथ ही संस्कार के चेहरे की पीड़ा जो उसकी बातों के साथ बढ़ती दिख रही थी अचानक ही क्रोध में बदल गयी वो तड़प कर बोल उठा....

"बस करो माँ बस करो...... अब और नहीं सुन सकूंगा सौम्या के खिलाफ एक शब्द भी... तुम्हे भी आज वो सब कुछ सुनना पडेगा जिसको कहने से सौम्या ने पिछले  दो  सालों से मुझे  रोक रखा  है और  तुम्हारे ,सारे इलज़ाम चुपचाप खुद अपने सर पर ढो रही है ,  "

"माँ तुम्हे तो नाम के प्रभाव पर बहुत विश्वास है न ? इसीलिये तुमने मेरा नाम संस्कार रखा था l प्यार के साथ साथ तुमने और पापा ने मुझे हर अच्छे संस्कार से भी अनुप्राणित किया था फिर कैसे अविश्वास कर बैठी तुम अपने दिए गए संस्कार पर....... सौम्या का नाम पंखुरी था तुमने उससे मिलने के बाद पहले ही दिन से उसे सौम्या बुलाना शुरू कर दिया फिर अचानक ही उसकी सौम्यता पर प्रश्न क्यों उठने लगे, तुम तो प्रज्ञा हो न माँ तुम्हारी प्रज्ञा ने सौम्या को समझने से इनकार क्यों कर दिया "

प्रज्ञा संस्कार के इस रूप को देख कर भौचक थी l

"सब कुछ तो.............."वो कुछ बोलना चाहती थी l पर संस्कार तो जैसे अब उसे कुछ भी बोलने का अवसर नहीं देना चाहता था l

"सुनो माँ जिस दिन पापा के बारे में खबर मिली उसी दिन मैंने सौम्या से कह दिया था कि तुम्हे अब अकेला नहीं रहने दूंगा अपने साथ ही ले कर लौटूंगा l मगर माँ सौम्या ने तुम्हारे लिए जिस ढंग से सोचा वो विस्मित कर देने वाला था l मेरे लिए  सब स्वीकार कर पाना कठिन था l एक शक भी मन में था कि क्या जैसा वो सोच रही है सचमुच वैसा हो सकेगा l पर उसे तुम पर पूरा भरोसा था l"

संस्कार थोडा रुक कर आगे बोला

".....उसने मुझसे कहा, 'मनु मैंने अपने मायके में अपनी माँ को देखा है जिन्हें जीवन भर स्वयं के विषय में सोचने के लिए एक पल भी नसीब नहीं हुआ l मज़े की बात तो यह रही कि उनको कभी भी ऐसा करने रोका नहीं गया, पर इतना समय और मौक़ा भी नहीं दिया गया l घर की जिम्मेदारियां निभाना उनका कर्तव्य था मैं मानती हूँ पर अधिकारों का प्रयोग वो सिर्फ तभी कर सकीं जब उनके उस अधिकार से हम सबका भी कोई प्रयोजन सिद्ध हो रहा होता था l जैसे हमारे जन्म दिन की तैयारी कैसे करनी है, घर में खाना क्या बनाना है, नौकरों की तनख्वाह क्या तय करनी है आदि आदि'

हम सब बड़े होते गए भैया की शादी हो गयी .......माँ फिर नयी जिम्मेदारियों में उलझ गयीं, भैया के बच्चों की देख रेख, उनके खाने पीने, पढ़ने, सोने और खेलने की व्यवस्था एक बार फिर अनकहे ही उनके कन्धों पर आ गई कोई उनसे यह कहता नहीं था कि आप को ही यह काम करना है पर क्या घर में रहते हुए इस सब बातों को वो अनदेखा कर सकती हैं , क्या इस नैतिक ज़िम्मेदारी से घर में रहते हुए भी मुँह मोड़ सकती हैं? नहीं न? वो खुशी खुशी सब कुछ करती हैं l पर मनु मैं अपने घर में माँ को मौक़ा देना चाहती हूँ  कुछ अलग कर दिखाने का l मुझे पता चला है शादी से पहले माँ बहुत अच्छा लिखती थी l मैं चाहती हूँ जीवन के इस पडाव पर वो स्वयं को चुका हुआ न समझें l  स्वयं के कुछ ख़ास होने की भावना उनमे होनी चाहिए जिससे वो खुद पर गर्व कर सकें l वो महसूस करें कि वो खुद अपनी वजह से इस समाज का एक अहम् हिस्सा हैं न कि हमारे कारण l मनु मैं माँ की प्रतिभा को खुला आसमान देना चाहती हूँ l जो यहाँ आने के बाद बिलकुल भी संभव नहीं हो सकेगा l वो जाने अनजाने ही बच्चों की प्यारी दादी,मेरी स्नेहमयी सासू माँ और बेटे की  आश्रिता  माँ बन कर रह जायेंगी l जबकि अकेले रहने पर एक और किरदार जो उनके अपने व्यक्तित्व का हिस्सा है उनसे मिलेगा और बतियाएगा l

ये मेरा सिर्फ एक प्रयोग है l मुझे खुद पर भरोसा है, उससे भी ज्यादा भरोसा मुझे माँ पर है l मेरे इस प्रयोग में मुझे आपका साथ बेहद जरूरी है l माँ को यही लगना चाहिए कि हम लोग उन्हें साथ नहीं ले जाना चाहते हैं और अब उन्हें अकेले ही रहना है तभी वो इस अकेलेपन से कुछ सकारात्मक रास्ते तलाश कर सकेंगी l आपको कसम है मनु, अगर माँ गुस्से में मेरे लिए कुछ बोलती भी हैं तो आप चुप रहेंगे l "

और फिर माँ फूली को तुम्हारे पास रखना, उससे तुम्हारी कविता की डायरी तुम्हारे कपड़ों की अलमारी में रखवाना, फूली का तुमसे उसके लिए कविता बनाने की जिद करना आदि सारी बातें उसकी योजना का ही हिस्सा थीं जिन्हें वो फूली के माध्यम से करवाती रही l तुम्हारी सारी जानकारी वो फूली से लेती रहती थी l उसके कहने पर ही प्रकाशन घर वाले तुम्हारे पास पुस्तक प्रकाशन का प्रस्ताव ले कर आये थे और तुम्हारी कविताओं की उत्कृष्टता देख कर उन्हें छापने के लिए तुरंत तैयार हो गए l

माँ इसमे कोई शक नहीं कि तुम अपनी प्रतिभा के बल पर ही यहाँ तक पहुँची हो पर जिस रास्ते पर चल कर तुम यहाँ तक आयी हो उसे बनाया सौम्य ने है अपने बुद्धि बल और विश्वास के सहारे.... तुमने अपने नाम को सार्थक किया और सौम्या ने तुम्हारे दिए हुए नाम का मान रखा l"

"उफ़ !!!!!क्या क्या नहीं कहा उसने सौम्या को, आज प्रज्ञा अपनी नज़रों में खुद को इतना गिरा हुआ महसूस  रही थी कि खुद से ही बात नहीं कर पा रही थी l  उसे पता था सौम्या या संस्कार तो शायद उसके  व्यवहार को  कभी कोई महत्त्व नहीं देंगे पर क्या वो अपनी भूल के लिए खुद को आजीवन माफ़ कर सकेगी ? आत्मग्लानि से भरी प्रज्ञा के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे .....

"माँ माँ चलो उठो अब भूँख लग रही है l कमरे के बाहर से आती संस्कार की तेज़ आवाज़ से प्रज्ञा की चेतना कुछ वापस आयी l पर अब भी प्रज्ञा से हिला भी नहीं जा रहा था आंसू से उसके गाल तर थे, शर्मिन्दगी से वो सर नहीं उठा पा रही थी l तभी संस्कार ने कमरे में आकर उसके गले में अपनी बाहें लपेटते हुए कहा.....

"माँ बात करो, सौम्या तुमसे बात करना चाहती है" प्रज्ञा के गले से तो आवाज़ जैसे विदा ही हो गयी थी रुंधे गले से किसी तरह 'हेलो' बोली ......... सौम्या  जो शायद उसकी स्थिति भांप चुकी थी.....समझाते हुए बोली .....

"माँ रोना बिलकुल भी नहीं , मेरे प्रति आपकी सोच  उन परिस्थितियों के सन्दर्भ  में बिलकुल ठीक थी ...इसलिए आप  अपने को दोषी मत ठहराइए ...मेरी तबीयत भी कुछ दिनों में बिलकुल ठीक हो जायेगी l कल के कार्यक्रम के लिए आपको अग्रिम शुभकामनाएं l कार्यक्रम के बाद संस्कार के साथ यहीं आ जाइए सब लोग एक साथ आपकी सफलता को सेलिब्रेट करेंगे "

प्रज्ञा मूक थी पर उसका मौन मुखर हो हज़ारो आशीर्वाद लिए सौम्या तक पहुँच रहा था l दूसरी तरफ सौम्या की आँखें भी भीगी हुयी थीं उसका प्रयोग सफल रहा था वो माँ के मन की खुशी महसूस कर आनंदित हो रही थी  l

---------समाप्त ----------------
Seema-Agarwal-poetessSeema-Agrawal-writer-writer-Seema-Agrawalstory-written-Seema-Agrawalपरिचय.-:
सीमा अग्रवाल
लेखिका व् कवयित्री

सीमा अग्रवाल का मूल पैतृक स्थान कानपुर, उत्तर प्रदेश है l संगीत से स्नातक एवं मनोविज्ञान से परास्नातक करने के पश्चात पुस्तकालय विज्ञान से डिप्लोमा प्राप्त किया l आकाशवाणी कानपुर में कई वर्ष तक आकस्मिक उद्घोषिका के रूप में कार्य किया l विवाह पश्चात पूर्णरूप से घर गृहस्थी में संलग्न रहीं l पिछले कुछ वर्षों से लेखन कार्य में सक्रिय हैं l इन्ही कुछ वर्षों में काव्य की विभिन्न विधाओं में लिखने के साथ ही कुछ कहानियां और आलेख भी लिखे l

संपर्क -: मोबाइल नम्बर – : 7587233793 , E mail -: thinkpositive811@gmail.com

लेखन क्षेत्र       : गीत एवं छंद, लघु कथा प्रकाशित  गीत संग्रह  : खुशबू सीली गलियों की

प्रकाशित कृतियाँ  : 1.   राजस्थान से प्रकाशित बाबूजी का भारत मित्र में दोहे एवं कुण्डलियाँ 2.   शुक्ति प्रकाशन द्वारा प्रकाशित संकलन “शुभम अस्तु” में गीत संकलित 3.   श्री दिनेश प्रभात द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका गीत गागर में गीत प्रकाशित 4.   मॉरिशस गाँधी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित वसंत एवं रिमझिम पत्रिकाओं में रचनाओ का प्रकाशन 5.   ई-पत्रिका “साहित्य रागिनी” में गीत संकलन

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