Friday, May 29th, 2020

गद्य लघु नाटिका : दृष्टिकोण

 

 गद्य लघु नाटिका : दृष्टिकोण

- लेखक शिव कुमार झा टिल्लू - 
* विशेष रूप से आगामी अंतराष्ट्रीय महिला दिवस  पर जमशेदपुर की एक चर्चित " नारी संस्था " में अल्पकालिक एकांकी मंचन हेतु रचित 
पात्र परिचय :
१ शील : नायक :उम्र ३५ वर्ष : किसी विभाग में लिपिक , (अर्थोपार्जन हेतु घूस से कोई परहेज नहीं , ज्ञानी पर अहंकार से परिपूर्ण , भौतिकता की अविरल आह और चाह २ शालिनी : नायिका , और शील की धर्मपत्नी , उम्र ३० वर्ष , निस्संतान जमशेदपुर में टाटा परिवार की कंपनी में अभियंता . नाम के अनुरूप शालीन पर नारी शोषण और घूसखोर की प्रबल विरोधी ३ माँजी : शील की माँ , उम्र ६० बर्ष , पर शरीर से तंदुरुस्त . फुर्तीली विधवा महिला , अशिक्षित . मिथिला की बेटी और भोजपुर की बहू माँजी की भाषा ठेठ गोया बिहार की सारी भाषाओं का मिश्रण .परन्तु सुलझी हुई महिला ४ जहुरिया : घर की नौकरानी . उम्र २५ वर्ष , शादीशुदा , सुबह से शाम तक माँजी के घर में रहती है . गुजराती परिवार की मात्र साक्षर विवाहिता लड़की . हास्य कलाकार . कभी गुजराती तो कभी हिन्दी बोलती है ५ भावना : शील की कुंवारी बहन उम्र२० वर्ष . स्वच्छंद विचार पर अपने भाभी से द्वेष ..मात्र चमक दमक पसंद करती है . **********************************************************************************************************
प्रथम दृश्य
नेपथ्य संवाद :यह कहानी वर्तमान समाज में व्याप्त एक अलग किस्म के अंतर्द्वंद्व की है , जहाँ पुरुष अपनी पत्नी से धन की आश, लोभ या संत्रास में में उसके कामकाजी रूप को स्वीकार तो लेता है , परन्तु धीरे -धीरे एक अकथ्य आत्मग्लानि के आवरण में घुसकर छद्म अविश्वास और पुरुषार्थ के क्षय के डर से उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर करना चाहता है . पुरुष प्रधान समाज में नारी " सहचरी " है ...जिसे परम्परावादी भक्ति पसंद नहीं .विजयी कौन ? यह तो महज काल के आगोश में है.....वैसे हमारा अतीत भी नारी शोषण का आदेश नहीं देता " यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः क्या २१ सदी में भी यह वाणी हमारे ग्रंथों की तरह शुष्क पुष्पगुच्छ के तले दबकर रह जायेंगीं............. ( रविवार का दिन है ,सोफ़ा पर बैठी मांजी चावल चुन रही है नेपथ्य से गाना गाती हुई जहुंरिया का प्रवेश ..यदि ईश्वर में विश्वास ना हो ..जीनेका कोई आश ना हो ,,रे मूढ़ सत्य को पहचानो पत्नी को परमेश्वर मानो ........ जहुरिया : शू करे छे माँजी माँजी : आहि रे माइ ! अरे छौड़ी तोरा सरम नइखे लागत , एहि उमिर में सोफे प' मूतत बाड़िस छिह/... जहुरिया : हंसते हुए क्या बोलूं माँजी ? आप कुछ भी ना समझती.. मैंने पूछा क्या कर रही है माँजी : लाख बार बोलली फारसी नइखे बोल' देशी मुर्गी विलायती बोल ..देशी मुर्गा देखले खुलल पोल जहुंरिया : अरे माइ ...ई गुजराती है......अब नहीं बोलूंगी .. माँजी : लउकत नइखे , चाउर चुनत बानी आछा , छोड़' ई बताव्' शील बाबू का कर रहल बाड़ें ? जहुरिया : अरे फिर वही बात ! का बोलें हम .दोनों में कोई मेले नहीं है शालिनी मेम साहेब टाटा त' साहेब अहमदाबाद ...सब फेर हो गया आ दिने में अन्हेर हो गया .. दृष्टिकोण का फेर है . माँजी : अरे छौंड़ी , हमार बाबूजी कहले रहन की चारे गो दिशा होला पुरुब , पच्छिम , उत्तर दक्खिन आ चार कोन..ईशान कोन , बायु कोन , नेरित्ता कोन आ अगिन कोन ..त' ई " दृष्टिकोण " कउन कोना बा.. की ई तोर गुजरात में जनमल रहे ? जहुरिया : अरे माजी आप सही में ना ..क्या बोलूँ ? दृष्टिकोण का मतबल है सोच ....शील बाबू पढ़लिखकर नारी को " पैर की जूती समझते हैं . भला शालिनी बहूरानी कैसे कबूल करे ! अरे कुछ तो सोचना चाहिए ..कोनो मेरे आपके जैसे बहूरानी बोकी और जाहिल थोड़े हैं .उसपर साहेब किरानी कतबो घूस कमा ले बहू से परतर थोड़े होगा . माँजी : हां , जहुरी ! हमार बहू लछमी है लछमी .टाटा कम्पनी में इंजीयर अबसर .कोनो घमंड नइखे .. जहुरिया : बहू पता नहीं ....क्यों चुप है ..हमको तो डर लग रहा है ...माँजी . ( भावना का प्रवेश ) भावना :मम्मी को क्या अपना ज्ञान बखार रही है जहुरिया .लगता है .इस घर से तुम्हारा दिन लद गया है ....भैया को पता चलेगा तो.... माँजी ( गुस्से में बेटी की तरफ उंगली दिखाते हुए ).चु...चुप ..छौंड़ी !!!!!! जाहि घरे जइब' आगि लगइब' ..जीउए पकड़ के खींच लेब !!!!!! अंदर से कोलाहल की अावाज..... शील और शालिनी के मध्य जोड़ जोड़ से चिल्लाहट..........( पर्दा गिरता है )
दूसरा दृश्य : शील : आइ वांट डाइवोर्स ,,,,,,,,मुझे छुटकारा चाहिए ....तुम समझती क्या हो ..जितना तुम महीने में कमाती हो ..वह मेरा रोज का सिटिंग एक्सपेंस है .......... शालिनी ( हँसते हुए ) : सही बात है ....लेकिन सोचिये यह आता कहाँ से है . खैर कोई बात नहीं ....डेट्स योर लाइफ .....लेकिन एक बात और ....मैं डाइवोर्स नहीं दूंगी ..वरन का अर्थ .शोषण और अहंकार नहीं ..आपको देना है स्वयं भेज दें .....सहन शक्ति की क्षमता अब मुझमे नहीं है..... शील : जा जा ....... शालिनी ( बीच में ही रोककर ) : बहुत पछताओगे ...रोने के लिए आँसू भी नहीं मिलेंगे ..अब मजबूरी का नाम नारी नहीं !!!!!! आज की नारी सिनेह और परिहास दोनों का बराबर मूल्य चुकाती है......जब अभी तक निस्संतान का दर्द बर्दास्त कर रही हूँ ..तो एकाकीपन का दर्द क्या सताएगी ..............आप पेपर भेज दें मैं एक क्षण में ही इस सम्बन्ध का पराभव कर दूंगी...........( माँजी का प्रवेश हाथ में बैग ) माँजी : बहू हम थोड़े साथ जाइब ..जहाँ चलब' जल्दिये चल.....रावण आ शूपनेखिया के छोड़' शील : यह क्या माँ ! अब संतान पराया .. माँजी ( अति गुस्से में ) : चुप ! कोन संतान .....तोरा जन्म द' के ..कोन पाप के फल भेंटले.....तोर बाप ..पुरुख होखे त' राउर जइसन ( ऊपर की ओर देखती है ) ...काहे एहि कपूत केँ मोर मुहें मंतर दिऔनी .......( बेटे की तरफ देखकर ) हद हो गइल .शीलबा ...जा आइ से तोरा गुरु आ माय ..दोनों से मुक्त कइनी ...चल बहू ...... शालिनी : मैं तो आज अपने सहेली के घर जाउंगी माँजी .कल क्वार्टर का अप्लाय ......हां आप अपने बेटे के साथ ...लेकिन यदि मेरे साथ रहना चाहेंगी तो मुझे कोई ऐतराज़ भी नहीं होगा ....... शील : नहीं माँ ! इतना कठोर मत बनो .सोचने का मौक़ा दो ..........( जहुरिया का प्रवेश ) जहुरिया : हां माँजी ..समाधान ही समस्या को भगाता है ना ...अरे साहेब ( शील की तरह ) मैं नौकरानी हूँ .....दिन भर आपके जैसे अमीर के घर ..लेकिन शाम को ...क्या बोलूँ ..मेरा मरद विश्वास के साथ गला नहीं .आत्मा से लगाता है ....पहले आता है तो उहे भात चढ़ा देता है ...मेरा इंतज़ार भी नहीं करता..हां मेरे आने तक ना उ खाता है .ना पाहिले हम्म ! यही प्रेम है.....हमलोग मूर्ख हैं ,बेबकूफ नहीं ..आपलोग बेबकूफ है पर मूर्ख नहीं ..केतना अंतर है दोनों में .......आपका प्रेम गोल -गोल है.....हमारा अनमोल है .. हम गरीब लोग प्रेम करते है ...आप लोग समझता करते हैं ...मेरा मरद लाठी से मारा होगा, लेकिन आपके जैसे कभी मीठा जहर नहीं दिया.... माँजी : ( जहुरिया को गले से लगाकर ) : बस बेटी ! भगवान हमार कोख बेटी ..जहूर के ना बनइलन ( अफसोस का दीर्घसांस शील रोने लगता है ..शालिनी के आँख से भी आंसू की बौछार ( नेपथ्य की ध्वनि ...सारे पात्र सुनने लगते है.......... आर्य देश का यही फ़साना सृष्टि को खून के आंसू रुलाना ... कब तक रहेगी मेरी माँ अवला कितना दुःख शास्त्र की अचला .. ....प्रश्नवाचक चिन्ह ..एक खाली जगह .एक अधूरा एहसास .हमारी बनिता का विश्वास ...मात्र .एक दिन नारी -नारी चिल्लाओ........सालोंभर उसे रुलाओ .... दुखद ऐसी शालिनी का क्या हुआ कहाँ गयी ;;;;कौन पूछा ..अरे कितना याद रक्खेगा........ऐसी घटनाएं तो रोज़ होती है ....... लेकिन विचारणीय इस शालिनी का क्या कसूर था ? मानसिक प्रताड़ना के ऐसे कारणों की समीक्षा तो होनी चाहिए ..निर्णय की प्रतीक्षा किसे और कहाँ ? इस समाज में ऐसे व्याधि के कारण विगलित हो रहा है हमारा दृष्टिकोण , कलुषित हो रही है हमारी मानसिकता . इसके मूल कारण है .हमलोग अवांछित तत्वों को अपना आदर्श बना रहे हैं , नक़ल कर रहे हैं इसलिए तो किसी ने कहा था एक ही उल्लू काफी है बर्बाद गुलिश्तां करने को.हर डाल  पर उल्लू बैठा हो अंजामे गुलिश्तां क्या होगी .चाँद दिन पहले ही तो दामिनी के दामन को वैश्विक पटल पर दुर्वासित नग्न कर हमारे भविष्य ने हमें कलंकित किया है..लेकिन उस घटना का परिणाम क्या ? जब दिल्ली बाली हवा-हबाई ...कौन सुने शालिनी की रुलाई .......वाह रे पुरुष प्रधान समाज ..कुछ तो विचार करो ......(पर्दा अंतिम रूप से गिरता है ) _______________________________
shiv-kumar-jha-ki-kavitaenSHIV-KUMAR-JHA2परिचय -: शिव कुमार झा टिल्लू कवि ,आलोचक ,लेखक शिक्षा : स्नातक प्रतिष्ठा,: स्नातकोत्तर , सूचना- प्राद्यौगिकी साहित्यिक परिचय : पूर्व सहायक संपादक विदेह मैथिली पत्रिका (अवैतनिक )
सम्प्रति – : कार्यकारी संपादक , अप्पन मिथिला ( मुंबई से प्रकाशित मैथिली मासिक पत्रिका ) में अवैतनिक कार्यकारी संपादक साहित्यिक
उपलब्धियाँ : प्रकाशित कृति १ अंशु : मैथिली समालोचना ( 2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली २ क्षणप्रभा : मैथिली काव्य संकलन (2013 AD श्रुति प्रकाशन नई दिल्ली )इसके अतिरिक्त कवितायें , क्षणिकाएँ , कथा , लघु-कथा आदि विविध पत्र -पत्रिका में प्रकाशित सम्प्रति :जमशेदपुर में टाटा मोटर्स की अधिशासी संस्था जे एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड में महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत
संपर्क -: जे. एम . ए. स्टोर्स लिमिटेड ,मैन रोड बिस्टुपुर  ,जमशेदपुर : ८३१००१ संपर्क – : ०९२०४०५८४०३, मेल : shiva.kariyan@gmail.com

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