Hachi A Dog's Tale,invc– सैयद एस.तौहीद – 
मानव व पशु का रिश्ता दुनिया का एक प्यारा सा रिश्ता होता है। मनुष्यों की संवेदना उस साथ को आगे भी जिंदा रख सकती है। अधिकतर लोग पशुओं को लेकर संवेदनशील होते भी हैं…बहुत नहीं भी । दरअसल इस रिश्ते को नफा-नुकसान की नजर से देखे जाने से मानवीयता का दायरा बदलता व घटता जा रहा है। पशु व पक्षियों की बहुत सी प्रजातियां या तो मिट चुकी या मिटने की कगार पर हैं। हमारे बीच के ही लोग तत्कालिक मुनाफों के लिए सब नजरअंदाज कर रहे। बेजुबान के लुप्त होने के चक्र में जाने-अनजाने एक कडी हम बन गए हैं। जंगली पशुओं की सुरक्षा को लेकर खासी संवेदनशीलता की कमी हमेशा से रही है। पालतु पशुओं को लेकर भी मनुष्य पहले जितना संवेदनशील नहीं रहा ।
पशु-पक्षियों के साथ व्यवहार में अमानवीयता का स्तर कभी कभी बहुत परेशान कर जाता है। हुक्मरान व मालिक होने के नाते इन बेजुबानों के प्रति हमारी एक जिम्मेदारी बनती है। आपको मालूम होगा कि यह हम पर आश्रित हैं। कोई भी यदि हित की दिशा में इन्हें अपना साथी रख ले तो जीवन बदला हुआ दिखता है। हम जिस पशु –पक्षी को अपना मित्र अथवा साथी बना लेते हैं,वो भी हमें अपना अभिन्न बना देता है। इन साथी-संगी द्वारा किए गए कामों की कीमत नहीं लगाई जा सकती।  इनकी सेवाएं अक्सर बहुत से मामलों में इंसानी फर्जों से महान पाई गयी हैं। इन संगी साथियों का प्यार दुनिया को प्यार करना सीखा सकता है । क्या किसी पशु की वफादारी को बराबरी से लौटाया जा सकता है ?

पशुओं की वफादारी की मिसाल का जायजा लेना हो तो Lasse Hallström की Hachi को देखें। वफादारी में श्वन (कुत्ते) की बराबरी नहीं की जा सकती । उसके वफा के गुणों को एक महान श्रधांजलि हाल्स्ट्रोम की यह फिल्म थी। पशु साथी-संगियों में कुत्ता इंसान के सबसे पुराने साथियों में एक है। इ्नकी वफादारी की मिसाल उसी समय से कायम है। यह अपने शारीरिक हाव-भाव से आनंद के अनेक स्तर को जीना जानते हैं। क्या उसकी प्यारी वफाभरी नजरों को नजरअंदाज किया जा सकता है ? अपने हिस्से की दुनिया को तलाशने या उस पर अनुराग व्यक्त करने का इनका अंदाज बडा ही कमाल का होता है। आज को जिंदादिल उमंग के साथ जीने का सलीका इन वफा के सैलानियों से सीखना जा सकता है। आद्यात्म की एक शिक्षा इनसे दोस्ती कर प्राप्त की जा सकती है। यदि आपने कभी किसी कुत्ते को अपनाया हो या अपनाने की तमन्ना रखते हों…लास हालस्ट्रोम की फिल्म में डूबने से खुद को रोक नहीं पाएंगे। आदर्श नीति-कथाओं की तरह इसे एक आद्यात्मिक दस्तावेज के रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है। किसी अपने को पाने की कामना का सुंदर अद्ययात्मिक चित्रण।

कथा आदर्श हीरो की खूबियों पर क्लासरूम विमर्श से निकलती है । प्रोफेसर का पोता वहां स्वयं के हीरो के बारे में बता रहा… उसका आदर्श एक वफादार पशु है। स्वर्गीय दादा (प्रोफेसर) का वफादार हाची उसका हीरो था। दोस्ती व वफा की बातें उसने उसी फरिश्ते से सीखीं थी। त्याग व समर्पण की यह कथा सिर्फ पार्कर परिवार तक सीमित नहीं रही। एक खूबसुरत बात का दुनिया तक पहुंचना लाजिमी था। कहानी अकिता प्रजाति के बाल श्वन के जापानी मठ में पाए जाने से विस्तार लेती है । मठ वाले उसका नामकरण कर अमेरिका के किसी पते पर रवाना कर देते हैं। लेकिन बीच रास्ते में हाची से लगा एड्रस टेग निकल जाता है । जिस खटोले में उसे सुरक्षित कर ले जाया जा रहा था, लिए जा रहे सामान की खेप से जुदा होकर बेड्रिज स्टेशन के प्लेटफार्म पर गिर जाता है। इस क्रम में नन्हा हाची उससे बाहर निकल स्टेशन पर आ जाता है। आजाद
होकर नयी जगह पर इधर-उधर तफरीह करने लगा…इसी सिलसिले में प्रोफेसर पार्कर विलसन (रिचर्ड गेर) से जा टकराया। प्रोफेसर यह सोंच कर स्टेशन मास्टर के पास उसे ले गए कि किसी सज्जन का यह प्यारा गुम गया था। लेकिन उनकी सोंच में स्टेशन मास्टर ने साथ नहीं दिया। वो उस बिछडे हुए पशु की जिम्मेवारी लेने को तैयार नहीं हुआ। नतीजतन प्रोफेसर जिसे कुत्तों से काफी प्यार था उसे अपने साथ ले गए । प्रोफेसर पार्कर की पत्नी केट पालतु जानवरों को लेकर उदासीन प्रवृत्ति की है। घर की मालकिन का नजरिया पार्कर को मालूम था। यह आश्वासन कि वो इस श्वन को रखने के लिए नहीं लाए…पर दोनों को घर मे जगह मिल जाती है। सुबह होते ही पार्कर उस नन्हे के मालिक की खोज में फिर
से रोड आइलेंड स्टेशन आए। उन्हें यह जानकर थोडा अचरज हुआ कि अब तक किसी व्यक्ति ने नन्हे पर अपना हक नहीं दर्ज किया था। शहर के किसी भी बसेरे में पशुओं की बडी भीड की खबर से प्रोफेसर की खोज थोडा और डूब जाती है।

ऐसे हालात में वो मिले हुए पशु के ऊपर एक विज्ञापन स्टेशन पर लगा कर उसे फिर से घर ले आए। हालांकि हचिको के प्रति पार्कर की बढती जिम्मेदारी को देखकर नहीं लगता कि वो उसे लौटाने को मन से तैयार नहीं थे। मालिक व जानवर के बीच एक प्यारा सा बंधन सांसे ले रहा था । इन खुशमिजाज पलों का दृश्यों में भी लुत्फ उठाया जा सकता है। मालकिन केट भी इन पलों की भावात्मक महानता को कबूल कर हाची को अपनाने के लिए विवश थी। नया मेहमान वक्त के साथ पुराना हो रहा था। मुहब्बत का तकाज़ा बढ रहा था। प्रोफेसर के लिए वफादार साथी बनने की तमन्ना उसके मन में खूब थी। उसने प्रोफेसर के पीछे स्टेशन जाने की आदत बना ली थी। पार्कर जब भी काम पर जाते हचिको साथ लग
जाता था। मालिक की वापसी तक वो वहीं पर इंतज़ार करने लगा था। इंतजार के साक्षी लोगों के सामने महान बंधन का उदाहरण था। बंधन वो जिसे प्यार व वफा के जज्बों में बयान किया जा सके। एक रोज पार्कर काम पर तो गए…लेकिन वापस नहीं लौटे। म्युजिक के प्रोफेसर पार्कर की दिल का दौरा पडने से मौत हो गई। हाची का जान से भी प्यारा साथी दुनिया छोड चुका था। प्रोफेसर की वापसी अब मुम्किन नहीं थी। क्या मुहब्बत के मारे जानवर को भी यकीन था ?वो इंतज़ार करता रहा…बरसों करता रहा। घर वालों को पता था कि मृत्यु ने घर के मुखिया को छीन लिया। वफा के सिपाही को बहलाने की बहुत कोशिशें भी की…लेकिन वो मासूम भाग-भाग कर इंतजार की जगह (रेलवे स्टेशन) चला जाता था।
आखिरी आस तक इंतज़ार करता चला गया।

परदे की यह पेशकश हकीकत की एक घटना से प्रेरित थी।  घटना टोक्यो विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर व उनके अजीज वफादार Hachiko से जुडी है। प्रोफेसर उयुनो व हाची के बीच एक अनूठा बंधन था। वफादार जानवर ने मालिक के साथ रेलवे स्टेशन चले जाने की आदत बना ली थी। हमेशा ही प्रोफेसर के पीछे लग जाता था। वो वहीं देर तक इंतजार करता ताकि वापसी में मालिक के दीदार के साथ घर लौट सके। शिबुया स्टेशन पर के वेंडर इस प्यारे रिश्ते के मुरीद थे। दिल का दौरा पडने से प्रोफेसर की एक दिन अचानक मौत हो गई।

मासूम रोज की तरह उस दिन भी इंतजार कर रहा था…प्यारा साथी वापस नहीं आया। वो वहीं इंतजार करने लगा …जहां अपने मालिक को आखिरी बार देखा था। मालिक के सिर्फ इक झलक खातिर इंतजार…बरसों इंतजार करता रहा। शिबुया स्टेशन में इंतजार की जगह स्थापित हचिको की कांस्य प्रतिमा कहानी को बयान करती है। प्यार-दोस्ती-वफा की यह मिसाल बहुत कम देखने को मिलेगी। फिल्म में कहानी को उसी मार्मिक अंदाज में पेश किया गया। कथा विकास क्रम में पशु के गुणों से एकात्म हो जाता है। आखिर की किस्तों में उसक दुख हमारा दुख बन जाता है । विरह की पीडा का अनुभव काफी मार्मिक हुआ करता है। इंसान की खातिर पशु का प्रेम देख रूमी यही कह गए कि जानवर प्यार के फरिश्ते हैं। लास हालस्ट्रोम की पेशकश पारिवारिक फिल्मों की जीत में विश्वास रखती है। प्रेम-समर्पण-वफादारी व नि:स्वार्थ सेवा के अजय भावों का संदेश देती है। टीवी देखते हुए प्रोफेसर अपना पापकार्न हाची के साथ शेयर करना पसंद करता है। उसे खेल सीखाने की दीवानगी में वात्सल्य उमंग में डूब जाता है। हाची भी मुहब्बत का बराबरी से बढकर निभाना जानता था। समर्पण-वफादारी की मिसाल बन गया। मालिक की वापसी की राह में सालों इंतजार करता रहा । आखिरी आस तक इंतजार करता रहा। फिर से मिलन की बाट जोहता रहा।  हाची को सलाम…खुदा की नायाब दुनिया को सलाम।

सैयद एस.तौहीदपरिचय – :
सैयद एस.तौहीद
जामिया मिल्लिया से स्नातकोत्तर सैयद एस.तौहीद  सिनेमा व संस्कृति विशेषकर हिंदी फिल्मों पर लेखन करते हैं.इंटरनेट मिडिया पर अनेक वैचारिक लेखों का प्रकाशन.

कुछ अपने ही बारे में
पटना से ताल्लुक रखने वाले सैयद एस.तौहीद ने जामिया मिल्लिया से उच्च शिक्षा प्राप्त की. हिंदी सिनेमा के अध्येता.विगत पांच बरसों से सिनेमा व अन्य विषयों पर लेखन .सिनेमा के ऊपर पब्लिक फोरम की एक लोकप्रिय साईट से लेखन की शुरुआत.इन दिनों हिंदी सिनेमा एवं संस्कृति ऊपर लेखन.फ़िल्म के रिव्युज में भी दिलचस्पी. लोकप्रिय वेबसाईट जानकीपुल में आलेखों का प्रकाशन.
लेखन क्यों कर रहा हूँ इसकी खास वजह तो बता नहीं सकता,लेकिन कहना चाहूंगा कि सिनेमा व साहित्य दिल के बहुत करीब रहा..शायद इसलिए उसके बारे में लिखकर उस मुहब्बत को साकार कर रहा.यकीं के साथ कि एक रोज मेरा काम भी मुझसे प्यार करेगा.खुदा का इंसाफ बड़ा प्यारा हुआ करता है !

संपर्क – : syedstauheed ,Rajapur Mainpura Patna Bihar
मोबाइल – : 9867957997, मेल :passion4pearl@gmail.com

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