विलुप्त होती कला को पुनर्जीवन देता एक मानव विज्ञानी

आई एन वी सी न्यूज़  
नई  दिल्ली ,

डॉ वीरेंद्र प्रताप यादव कहने को तो महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के मानव विज्ञान विभाग में वरिष्ठ सहायक प्रोफ़ेसर हैं। लेकिन उनके अध्ययन, अध्यापन और अध्यवसाय का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। जितनी गहरी रूचि और पकड़ उनकी मानव विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में है। उतनी ही गहरी पकड़ और रुचि हिंदी के प्रसिद्ध कवि मुक्तिबोध के स्तर की कविताएं लिखने और उसकी व्याख्याओं के निरूपण में है। इसके अलावा उतनी ही गहरी रुचि है वह मानवशास्त्रीय आधार पर उपन्यास लिखने में करते हैं। उनकी कहानियों का आधार मानवशास्त्र के आधार पर आदिवासी जनजीवन, कला व संस्कृति, पर्यावरण और पशु पक्षी हैं, साथ में प्रकृति प्रेम और उसके संरक्षण की जिजीविषा और उसे बचाने की छटपटाहट उनकी कहानियों व उपन्यास में दिखाई देती है।

डॉ वीरेंद्र प्रताप यादव से आप न्यूजीलैंड के जंगलों में पाए जाने वाले तोतों से लेकर अलसल्वाडोर में पाई जाने वाली गिलहरी पर बात कर सकते हैं और ग्रैंड कैनियन में पाया जाने वाला जहरीला बिच्छू की प्रजाति के बारे में और उत्तरी ध्रुव व साइबेरिया के क्षेत्र में पाए जाने वाले सनोबर पेड़ की लकड़ी और उसकी विशेषताएं भी वे तुरंत बता सकते हैं। भारत के अंडमान निकोबार दीप समूह में पाए जाने वाले जारवा व करेन आदिवासी समुदाय पर आप बात कर सकते हैं, अपनी एम ए की लघु शोध परियोजना के सिलसिले में कभी उन्होंने दो माह करेन आदिवासी समुदाय के साथ अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में बिताए हैं। आप उनसे पेड़ पौधों की विविध प्रजातियों के बारे में आप बात कर सकते हैं, या फिर अमेजॉन के जंगलों में पाए जाने वाले उंगली बराबर मेंढक से लेकर, भारत के पश्चिमी घाट में पाए जाने वाले रंगीन मेढक को लेकर आप उनसे बातें कर सकते हैं। विदर्भ के क्षेत्र में पाए जाने वाले जीव जंतु के बारे में आप उनसे बात कर सकते हैं, बात करते समय पर लगेगा कि उनके पास जो ज्ञान है उसे साझा करने कि उनके पास कितनी उत्कंठा है। डॉ वीरेंद्र प्रताप यादव से आप शरीर में होने वाली बीमारियों के बारे में भी आप उनसे बात कर सकते हैं।

इस बार लॉकडाउन में उन्होंने अपनी पत्नी आदरणीय वंदना भाभी जी के साथ व अपनी दो प्यारी बेटियां पाखी और पीहू के साथ मिलकर पत्थर की इस कला को पुनर्जीवित किया है। भारत में तो यह कला लुप्त प्राय ही है, जिस तरह इन पत्थरों में उन्होंने जान डाली है, उससे उनकी मानव विज्ञान के प्रति गहरी रूचि और संवेदना का पता चलता है। वे कहते हैं कि मानव विज्ञान केवल सेमिनार और पुस्तकालय का विषय न बनकर सचमुच में जनकल्याण का विषय बने। इस उपेक्षित विषय पर उन्होंने अपनी कूची चलाई है। इस तरह उनकी रूचि इन आकृतियों में या पेंटिंग में दिखाई देती है। इन पेंटिंग्स में विभिन्न आयामों का विस्तार है, जहां एक तरफ सदियों से आदिवासियों के जनजीवन का प्रतीक एक पत्थर को उन्होंने एक मानव मुख के रूप में उतार दिया है। एक निर्जीव पत्थर को स्वान के रूप में कर दिया है। वहीं पर मानव के विभिन्न मुखोटे इस बात की तस्दीक करते हैं कि मनुष्य की यात्रा में मानव ने कितनी लंबी दूरी तय की है, जैसे होमोसेपियंस से लेकर पाषण मानव आदि से लेकर वर्तमान मानव तक।

डॉ वीरेंद्र प्रताप यादव की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी अभी लॉकडाऊन खुलने के बाद लगाई जाएगी और उसके बाद इन पत्थरों की पेंटिंग की आकृतियों की ऑनलाइन नीलामी एवं बिक्री की जाएगी और उससे होने वाली आय को अंडमान निकोबार द्वीपसमूह की सुदूर सात आदिवासी समूहों के विकास और संरक्षण के लिए खर्च किया जाएगा।

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