images (1)हेमंत पटेल,
आई एन वी सी,
भोपाल,

  • मामला आरटीआई के तहत दी जाने वाली सूचनाओं का
  • 2008 से सोसायटी ने मचा रखी है लूट

सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत जो जानकारी देने के लिए सरकारी कार्यालय प्रति पेज 2 रुपए आवेदक से लेते हैं। उसके स्थान पर रजिस्ट्रार फर्म्स एंड सोसायटी 20 व 40 रुपए प्रति पेज वसूल रही है। आला अधिकारी फीस को लेकर सोसायटी को मप्र शासन द्वारा पारित गजट की बात कर रहे हैं, जबकि इसी से राज्य सरकार को राजस्व की हानि भी हो रही है। प्रदेश सरकार को प्रति वर्ष 50 लाख से अधिक का राजस्व नुकसान हो रहा है। यह आंकड़ा जानकारों के अनुसार है। दरअसल, आरटीआई के तहत यह पूरा पैसा सरकार के खाते में जमा होना चाहिए। जबकि यह रकम चालन क्र. 1475 व 200 के माध्यम से सोसायटी के खाते में जमा हो रही है। हालांकि यह खाता भी अप्रत्यक्ष तौर पर सरकार के पास होता है, लेकिन सवाल यह उठता है, आरटीआई का पैसा सोसायटी के खाते में क्यों जमा हो रहा है? सोसायटी की यह लूट वर्ष 2008 से चल रही है। इस बात का खुलासा मप्र आरटीआई एक्टीविस्ट काउंसिल के अध्यक्ष सै. खालिद केस द्वारा लगाई आरटीआई से हुआ। आरटीआई आवेदन के जरिए उन्होंने सोसायटी से एक फर्म के संबंध में जानकारी मांगी थी।

दिया संशोधन का हवाला :  श्री केस ने दिनांक 14 जून को आवेदन दिया था। सोसायटी ने 6 जुलाई, 13 को श्री केस के आवेदन पर उन्हें सामान्य रूप से जानकारी लेने के लिए 20 रुपए और अत्यावश्यक होने पर 40 रुपए प्रति पेज चालन क्र. 1475 व 200 के माध्यम से जमा करने को कहा। इसके लिए सोसायटी ने ‘मप्र सोसायटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1973 संशोधन नियम 1998’ का हवाला पत्र में दिया। यह राशि असि. रजिस्ट्रार फर्म्स एवं संस्थाएं भोपाल एवं नर्मदापुरम संभाग, भोपल के खाते में चालन स्वरूप जमा करने को कहा।

आम आदमी का हक है  : शहर के आरटीआई एक्टीविस्ट देवेन्द्र प्रकाश मिश्रा का कहना है, अर्धन्यायीक संस्थाओं द्वारा जो भी दस्तावेज न्यायीक आदेश के संदर्भ में प्रमाणित कर दिया जाता है। उसका शुल्क/दर का निर्धारण शासन के अनुसार होता है। उक्त दस्तावेज प्रमाणित प्रति की टीप के साथ दी जाती है, जबकि सूचना के अधिकार के तहत प्रदान किए जाने वाले दस्तावेज आरटीआई निर्धारित दर 2 रुपए प्रति पेज के मान से दिया जाता है। उक्त दस्तावेज पर आरटीआई के तहत प्रदत्त की सील लगाकर उपलब्ध कराई जाती है। इसे प्रमाणति प्रति नहीं माना जाता है। जो भी संस्था आरटीआई के तहत दी जाने वाली जानकारी के लिए अतिरिक्त शुल्क ले रही है। तो वह गलत है और सरकार व विभाग के संज्ञान में लाने की आवश्यकता है। क्यों कि यह अधिकार आम आदमी की सहायता के लिए है, न कि व्यवसाय के लिए।

सरकार का ही नियम है  :  सरकार के जिस प्रकार के आदेश व नियम हैं। हम उसी अनुसार फीस ले रहे हैं, फीस को लेकर मप्र सरकार ने गजट भी पारित किया है। राजपत्र में आवेदक को दी जाने वाली जानकारी के पृष्ठों पर टिकट लगा जाने संबंधित बात का उल्लेख नहीं किया गया है।
शरद तिवारी, पंजीयक, रजिस्ट्रार फर्म्स एंड सोसायटी

आरटीआई मूल भावना खत्म कर दी  : अर्धन्यायीक संस्थाओं को राज्य सरकार के अधीन रहते हुए शुल्क निर्धारण का हक तो है, लेकिन क्या इतना शुल्क रखा जाएगा? जिससे लोग जानकारी ही न मांगे। दूसरा यह पैसा आरटीआई के खाते में न जाकर सोसायटी के मद में मिल रहा है। सोसायटी ने आरटीआई की मूल भावना को खत्म कर दिया ेहै। सै. खालिद केस, अध्यक्ष, आरटीआई एक्टीविस्ट काउंसिल मप्र

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