Thursday, June 4th, 2020

हुसेन के साथ बिताये कुछ यादगार लम्हें : अनीता सहगल

तूलिका के माध्यम से अपने दिल के उद्गारों को किसी कैनवास पर एक सजीव रूप देकर उस कलाकृति को अमर कर देना ही शायद उनकी खूबी ही नहीं, उनकी पहचान थी। उनकी उंगलियों में वो जादू था कि वह जैसी भी आड़ी तिरछी रेखायें खींचते थे, वह भी एक कृति बनकर तैयार हो जाती है। कहा जाता है ``एक चित्र हजार शब्दों के बराबर होता है´´ यह बात चरितार्थ होती है विश्वविख्यात चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन जी पर, जो अपने पीछे बहुत सारी यादे छोड़ गये हैं। ज़िन्दगी के 95 बसन्त पार करने के बाद भी किसी को यह महसूस नहीं होता था कि वह इतने बुजुर्ग हैं। वह हमेशा जिन्दगी को जिन्दा दिली से जीते थे। जिन्दगी के लिये उनके अन्दर जोश था। वह एक उच्च कोटि के विलक्षण प्रतिभा वाले कलाकार थे। वह एक क्रिएटिव इंसान थे, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी का ज्यादातर वक्त अपने सपनों को सजोने में और उन्हें सार्थक करने में लगाया । कला और कलाकार का संगम उनके कैनवास पर होता है। उनकी तूलिका के रंगो और उनकी कल्पना की सोच के साथ हुसेन साहब स्वभाव से बहुत विनम्र, सौम्य, कला के पारखी और सहज कलाकार थे। वह कहते थे कि कलाकार का कोई मजहब नहीं होता है। कला किस तरह से ग्लैमर पर हावी हो जाती है, उसका जीता जागता उदाहरण हुसेन जी ने अपनी कला से प्रमाणित कर दिया था। इन्हीं विशेशताओं से परिपूर्ण उस महान शिख्सयत से मिलने का अवसर मुझे एक कार्यक्रम के दौरान मिला। कुछ वशZ पूर्व जब विश्वविख्यात चित्रकार एम.एफ.हुसेन जी जब पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित कलाकारों की सामूहिक प्रदशZनी के दौरान चित्रकला की बारीकियों पर एक व्याख्यान देने लखनऊ आये थे। उसी प्रेक्षागृह के द्वार पर तथा प्रेक्षागृह के अन्दर मैंने अनेक खूबसूरत रंगबिरंगी रंगोली तथा स्व निर्मित कलश से सजाया था। साथ ही साथ अपने हाथों से बनाये गये खूबसूरत दियों से सजाकर एक पारम्परिक रूप दिया था। प्रकृति के कण-कण से कल्याण के प्रतीक देवता भगवान गणेश की बालू,मौरंग, भूसा जैसी अनुपयोगी वस्तुएं से बनायी गणेश जी की कला कृतियों को देखकर एम.एफ.हुसेन जी ने खूब सराहा और वहीं उन्मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हुए मेरे उज्जवल भविश्य की कामना भी की। इतना ही नहीं इस कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा वाकया हुआ, जिसे मैं जिन्दगी भर नहीं भूल सकती। हुआ यह कि हुसेन जी जब प्रेक्षागृह के अन्दर जाने के लिये बढ़े तो वे सीधे आडीटोरियम न जाकर उस स्थान पर रूके जहां मैंने रंगोली और कलश आदि से सजावट की थी। पहले तो वह जरा ठिठके फिर रंगोली के पास आकर मेरे सजे हुए कलश को बड़े ही गौर से चारो तरफ से देखने लगे। उनसे जब नहीं रहा गया तो उन्होंने मुझसे कहा`` बेटी क्या मैं तुम्हारे सजाये हुए कलश को हाथ से छू सकता हूँर्षोर्षो मैं क्या कहती मेरी तो कुछ समझ में ही नहीं आया कि इतने बड़े विश्वविख्यात चित्रकार मुझसे इजा़जत मांग रहे हैं। मैंने भी हां कहकर सर हिला दिया और फिर क्या था हुसेन जी काफी देर तक रंगोली निहारते रहे और उन्होंने कलश को छूकर भी देखा। कुछ देर रूककर मुस्कराते हुए बोले क्या तुम मेरा घर इसी तरह खूबसूरत सा सजा दोगीर्षोर्षो मैं तो यह सुनने के बाद हतप्रभ रह गई। मुझे तो अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। उन्होंने कई बार मेरे कार्यों की प्रशंसा की यही कहते रहे मैंने तो आज सजीव कला को देखा है, जो वाकई इतनी खूबसूरत है। इसके बाद प्रेक्षागह में प्रवेश करने के बाद भी वहां बनी रंगोलियों पर नज़र डाली और बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हारी उंगलियों में साक्षात सरस्वती का वास है और जिन्दगी में आगे बढ़ते रहने की शुभकामनाएं दी। यह वाकया याद कर आज मेरी आंखे भर आई और कहीं न कहीं गर्व भी महसूस हुआ कि इतने बड़े कलाकार का आशीZवाद आज मेरे साथ है। यही सौम्य स्वभाव, उनकी सहजता उनको सबसे अलग करती है। आज भी हुसेन जी द्वारा दिये गये आटोग्राफ मेरे पास सुरक्षित है।

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yogesh tripathi, says on June 20, 2011, 6:15 PM

bahut bahut mubarakbad. husain ji jaisi nami girami shakisyat ne apki pratibha ka samman kiya . yeh apne aap me bahut mahtvapurna bat hai. apke ujjawal bhavisya ki subhkamnad sahit yogesh

shivali, says on June 20, 2011, 2:18 PM

gr8 news.... congrtz :)

sanchit, says on June 18, 2011, 6:16 PM

awsm news....keep it up.......lko z proud of u anita ji....congratzz......