Friday, December 6th, 2019

हमारे प्रेरक ग़ज़नवी नहीं बल्कि मोहम्मद के घराने वाले हैं

 

- तनवीर जाफ़री -

                                   
'पाकिस्तान ने अपनी रक्षा प्रणाली में जिन मिसाइलों को "सुसज्जित" कर रखा है उनमें से कुछ मिसाइलों के नाम हैं- बाबर, गौरी और ग़ज़नी" ।   पाकिस्तान द्वारा अपनी मिज़ाइलों का इस प्रकार का नामकरण किया जाना ज़ाहिर है उसके इरादों,नीयत व उसकी आक्रामकता को दर्शाता है।पाकिस्तान द्वारा यह नाम अनायास ही नहीं रखे गए बल्कि सही मायने में पाकिस्तान इसी प्रकार के आक्रांताओं व लुटेरे शासकों से ही प्रेरित व प्रभावित रहा है। जबकि भारत में इन शासकों की गिनती लुटेरे आक्रांताओं में की जाती है। ख़ास तौर पर महमूद ग़ज़नवी को तो भारत में आक्रमण के दौरान लूटपाट मचाने व सोमनाथ के  प्राचीन मंदिर तोड़ने वाले एक आक्रामक शासक के रूप में जाना जाता है। ग़ौर तलब है कि ग़ज़नवी  ने सबसे बड़ा आक्रमण 1026 ई. में काठियावाड़ के सोमनाथ मंदिर पर था। विध्वंसकारी महमूद ने सोमनाथ मंदिर का शिवलिंग तोड़ दिया था और मंदिर को ध्वस्त कर दिया था।इस हमले में हज़ारों लोग  मरे गए थे जबकि ग़ज़नवी के लुटेरे सैनिक मंदिर का सोना और भारी ख़ज़ाना लूटकर ले गए थे। अकेले सोमनाथ से उसे अब तक की सभी लूटों से अधिक धन मिला था। ग़ज़नवी जैसे लुटेरे आक्रांताओं ने भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में अपने ऐसे ही लूट पाट के कारनामों से इस्लाम व मुसलमानों की छवि को धूल धूसरित करने का काम किया था। यही वह दौर था जबकि सन 61 हिजरी में करबला में यज़ीद के लश्कर की तर्ज़ पर धर्म के नाम पर अपने इस्लामी साम्राज्य को बढ़ाने की चेष्टा करते हुए लूटपाट,क़त्लो ग़ारत तथा धर्मस्थलों को तोड़ने जैसी अनेक इबारतें लिखी गयीं। कहना ग़लत नहीं होगा कि ऐसे ही शासकों ने अन्य धर्मों के लोगों के दिलों में मुसलमानों के प्रति नफ़रत पैदा की तथा इस्लाम धर्म की छवि धूमिल की।
                                   
जिस प्रकार यज़ीद के समर्थक उसके प्रशंसक व उसे अपना प्रेरणा स्रोत मानने वाले लोग 61 हिजरी के दौर में करबला की घटना के समय मौजूद थे उसी तरह यज़ीद व यज़ीदियत के रस्ते पर चलने वाले आतंकी सरग़नाओं के समर्थक व उनके प्रशंसक आज भी मौजूद हैं। यज़ीद भी तलवार के बल पर इस्लामी हुकूमत को फैलाने का दावा तो करता था मगर हक़ीक़त में वह इस्लाम का इतना बड़ा दुश्मन था जिसने रसूल-ए-पाक हज़रत मुहम्मद के परिवार के लोगों को ही करबला (इराक़) में शहीद कर पूरे इस्लामी जगत के चेहरे पर कला धब्बा लगाने की कोशिश की। इसी साम्रज्य्वादी सोच का प्रतिनिधित्व अलक़ायदा, दाइश,आई एस व तालिबान जैसे इनके अनेक सहयोगी संगठन भी कर रहे हैं। देखने में रंग रूप व पहनावे में चूँकि यह भी कट्टर मुसलमान ही प्रतीत होते हैं लिहाज़ा इस्लाम विरोधी शक्तियों को इनकी हर "कारगुज़ारियों" को मुसलमानों व इस्लाम से जोड़ने में  ज़्यादा वक़्त नहीं लगता। निश्चित रूप से पाकिस्तान की तबाही व वहां अल्पसंख्यकों के साथ वहां होने वाले ज़ुल्मो जब्र का मुख्य कारण ही यही है कि पाकिस्तान इस्लाम के वास्तविक नायकों अर्थात नबी,पैग़म्बर,ख़लीफ़ा,इमाम से ज़्यादा ग़ज़नवी,अब्दाली,लाडेन,जवाहरी,मसूद अज़हर व हाफ़िज़ सईद जैसे उन लोगों से प्रेरित होता है जो इस्लाम व मुसलमानों को हमेशा हीकलंकित करते रहे हैं।
                                 
अभी पिछले दिनों एक बार फिर कश्मीर के ताज़ा तरीन सुरते-ए-हाल के सन्दर्भ में बात करते हुए पाकिस्तान के धार्मिक संगठन जमात-ए-इस्लामी प्रमुख सिराज उल हक़ ने अपनी गिनती "ग़ज़नवी की औलादों" में की है। ख़बरों के मुताबिक़ जमात प्रमुख सिराज उल हक़ ने ये भी कहा कि "कश्मीर पाकिस्तान के लिए ज़िंदगी और मौत का सवाल है। उन्होंने बड़े ही गौरवान्वित लहजे में अपने लिए यह भी कहा कि वो "महमूद ग़ज़नवी की औलाद" हैं। वे स्वयं को किस रिश्ते से ग़ज़नवी की औलाद बता रहे हैं मुझे नहीं मालूम। क्योंकि शाब्दिक अर्थ के लिहाज़ से तो विलादत देने वाले को वालिद और उससे पैदा होने वाली संतान को औलाद कहा जाता है। हो सकता है उनका शजरा ग़ज़नवी से मिलता भी हो परन्तु यदि वे महज़ एक मुसलमान होने के नाते उस आक्रांता से अपना रिश्ता जोड़ रहे हैं तो उन्हें यह बताना ज़रूरी है कि यह लुटेरे और आक्रांता कभी भी भारतीय मुसलमानों के नायक अथवा प्रेरणा स्रोत नहीं रहे। यह क्या कोई भी मुस्लिम सुल्तान या शासक,बादशाह अथवा नवाब कभी भी इस्लाम धर्म का नायक कभी भी न हुआ है न हो सकता है न ही उसे इस्लामी नायक व मुसलमानों का प्रेरणास्रोत माना जा सकता है। भले ही उसने नमाज़,रोज़ा,हज आदि का पालन भी क्यों न किया हो। इस्लाम पैग़म्बर हज़रत मोहम्मद व उनके परिजनों हज़रत अली ,बीबी फ़ातिमा ,हज़रत इमाम हसन व हज़रात इमम हुसैन जैसे हज़रत मुहम्मद के घराने वालों से प्रेरणा हासिल करने वाला धर्म है। इस्लाम, पैग़म्बरों,इमामों व मुहम्मद के घराने वालों को अपना आदर्श मानने वाला धर्म है।इस्लाम उस त्याग,तपस्या और क़ुर्बानी का धर्म है जो करबला में हज़रत इमाम हुसैन की शहादत की शक्ल में सिर चढ़ कर बोला। इस्लाम हुसैनियत के बल पर ज़िंदा है यज़ीदियत के बल पर नहीं। यज़ीदियत के लक्षण तो यही हैं जो ग़ज़नवी,अब्दाली,लाडेन,जवाहरी,मसूद अज़हर व हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों में और इनके चहेतों में दिखाई दे रहे हैं।
                             
यहाँ पाकिस्तान के जमात प्रमुख सिराज उल हक़ के कश्मीर के सन्दर्भ में दिए गए बयान के विषय में यह बताना भी ज़रूरी है कि कश्मीर में कश्मीरियों के साथ उनकी "ग़ज़नवीयत" से भरी हमदर्दी कश्मीर और कश्मीरियत को नुक़्सान तो ज़रूर पहुंचा सकती है फ़ायदा हरगिज़ नहीं। कश्मीर के विषय पर भारत में ही सरकार की कश्मीर नीति से असहमति रखने वालों द्वारा सरकार की हर संभव आलोचना हो रही है। कश्मीरियों और कश्मीरियत का साथ देने वाले लोग भारतीय समाज में बड़ी संख्या में हैं। परन्तु पाकिस्तान के लोगों की हमदर्दी ख़ास तौर पर उनकी हमदर्दी का "ग़ज़वियाना" अंदाज़ कश्मीरी लोगों के लिए नुक़्सानदे होगा।जहाँ तक कश्मीर के विषय पर भारतीय मुसलमानों के पक्ष का प्रश्न है तो पिछले दिनों  जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव महमूद मदनी गत 12 सितंबर को जमीयत उलेमा-ए-हिंद के इस प्रस्ताव के पारित होने की घोषणा कर चुके हैं कि "कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, जम्मू-कश्मीर के लोग भी भारतीय ही हैं। वे हमसे किसी प्रकार अलग नहीं हैं।" महमूद मदनी यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि बावजूद इसके कि "पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर ये बात उछालने की कोशिश कर रहा है कि भारतीय मुसलमान भारत के ख़िलाफ़ हैं। हम पाकिस्तान की इस कोशिश का विरोध करते हैं। भारत के मुसलमान अपने देश के साथ हैं। हम अपने देश की सुरक्षा और एकता के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। भारत हमारा देश है और हम इसके साथ खड़े रहेंगे।” मदनी ने ये भी कहा कि देश में रहते हुए बहुत से मुद्दों पर हमारी असहमति हो सकती हैं, लेकिन जब देश की बात आती है तो हम सब एक हैं।"
                                 
अतः पाकिस्तानी नेताओं और "ग़ज़नवी की औलादों" को कश्मीरी मुसलमानों के हक़ में घड़ियाली आंसू बहाने के प्रदर्शन से बाज़ आना चाहिए और अपने देश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर अपनी ऊर्जा ख़र्च करनी चाहिए। यदि वे अपनी ग़ज़नवीयत भरी सोच का इस्तेमाल पाकिस्तान तक ही सीमित रखें तो ज़्यादा बेहतर है। उनकी ख़ामोशी में ही कश्मीरियों का हित निहित है।

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About the Author
Tanveer Jafri
Columnist and Author
 
Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.
 
He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities. 
 
Contact – : Email – tjafri1@gmail.com –  Mob.- 098962-19228 & 094668-09228 , Address – Jaf Cottage – 1885/2, Ranjit Nagar,  Ambala City(Haryana)  Pin. 134003
 
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