Wednesday, November 13th, 2019
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स्मृति शेष- कम उम्र के बड़े शब्द साधक थे अमन चांदपुरी

- घनश्याम भारतीय -


नित कल-कल करती सरयू तट पर स्थित टाण्डा का महादेवा घाट भी कल उदास था। दिशाएं शांति थीं। सरयू की जल लहरें भी शोकाकुल थीं। उनके अंदर भी एक पीड़ा थी। एक दर्द था। रुदन और क्रंदन था। जिससे वह अपनी भाषा में व्यक्त कर रही थी। यही नहीं सरयू तट पर मौजूद हुजूम की आंखों में अश्रुधार थी। सामने चिता जल रही थी। सभी शोकाकुल उसे निहार रहे थे। वह चिता किसी ऐसे व्यक्ति की नहीं थी जो अपनी आयु पूर्ण कर चुका हो बल्कि यह चिता पद्य साहित्य के आकाश में चमकना शुरू किए उस होनहार सितारे की थी, जिसने अभी उम्र के महज 22 बसंत ही देखे थे। इस उदीयमान सितारे का नाम था अमन सिंह। जिसे साहित्य की दुनिया में अमन चांदपुरी के नाम से जाना जाता था। जो अब लोगों की स्मृति में ही सिमट कर रह गया।


          जी हां, हम जिस अमन चांदपुरी की बात कर रहे हैं, वह उम्र में छोटा जरूर था,लेकिन लेखन में बहुत बड़ा था।चाहे वह प्रेम का साहित्य हो अथवा राष्ट्रभक्ति का,चाहे वह भक्ति साहित्य हो या फिर देश के जवानों, किसानों की पीड़ा की बात हो सभी में अमन की ठोस पकड़ थी। बीते 11 अक्टूबर 2019 की रात  लखनऊ के पीजीआई में सदा के लिए  मौन हुए अमन चांदपुरी का जन्म अम्बेडकरनगर जिले की तहसील टांडा के चांदपुर गांव में 25 नवम्बर 1997 को सुनील कुमार सिंह के पुत्र के रूप में हुआ था। विलक्षण प्रतिभा के धनी अमन के अन्दर बचपन मे ही साहित्य के अंकुर फूट पड़े थे। जवान होते होते गीत, हाइकु, क्षणिका,दोहा और गज़ल में महारत हासिल हो गयी थी। स्नातक तक की शिक्षा पूर्ण करने के बाद अमन लखनऊ में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और साहित्य सृजन में जुटे थे। अभी सहसा यकीन नहीं हो रहा है कि नौजवान और मुनफरिद लब व लहजे के शायर व बेबाक कवि अमन चांदपुरी अब इस दुनिया में नहीं रहे।  

         पिछले दिनों वे लखनऊ से अपने गांव आए थे कि अचानक उनको तेज़ बुखार हो गया। स्थानीय स्तर पर इलाज का कोई फायदा न होता देख घर वाले उन्हें शिखर हास्पिटल इंदिरानगर लखनऊ ले गए। जहां जांच के दौरान डेंगू की पुष्टि होते ही परिजन घबरा गए। प्लेटलेट्स घटकर 6000 के करीब हो गया तो उन्हें लखनऊ पीजीआई  ले जाया गया। जहां भरपूर कोशिश के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। इसी के साथ बहुतों का चहेता अपने चाहने वालों को छोड़ कर इस दुनिया से चला गया। उनका निधन हिंदी साहित्य और उर्दू अदब के साथ गंगा जमुनी तहज़ीब का बहुत बड़ा नुक़सान है। वास्तव में अमन चांदपुरी अभी कली था। उसका फूल बनना तो अभी बाकी था और मुरझा गया।

          यदि अमन के साहित्य सृजन की बात करें तो उनके गीत, हाइकु, क्षणिका, दोहा और ग़ज़ल पाठकों के दिल को झकझोरने की क्षमता रखते हैं। एक दोहे में बचपन के दिन को याद करते हुए वे लिखते हैं-बचपन की वो मस्तियां, बचपन के वे मित्र। सब कुछ धूमिल यूं हुआ, ज्यों कोई चलचित्र।। उनके विचारों में छिपी कबीर की छाप एक दोहे में कुछ यूं दिखती है-संगत सच्चे साधु की,अनुभव देत महान। बिन पोथी बिन ग्रंथ के, मिले ज्ञान की खान।। गरीबी मजबूरी का चित्र खींचने में भी अमन चांदपुरी को महारत हासिल थी। एक दोहे में उन्होंने लिखा है-खाली हांड़ी देखकर, बालक हुआ उदास। फिर भी मां से कह रहा, भूख न मुझको प्यास।। देश के किसानों की पीड़ा अमन चांदपुरी कुछ यूं देखते हैं- डूब गई सारी फसल, उबरा नहीं किसान। बोझ तले दबकर अमन, निकल रही है जान।। अमन जब मां पर कुछ लिखते हैं तो मुनव्वर राना की झलक दिखाई पड़ती है- मां के छोटे शब्द का, अर्थ बड़ा अनमोल। कौन चुका पाया भला, ममता का यह मोल।। टूटते और बिखरते परिवार पर अमन की दृष्टि इस तरह जाती है- जबसे परदेसी हुए, दिखे न फिर इक बार। होली ईद वहीं मनी, वहीं बसा घर द्वार।। देश में बढ़ते बाल श्रम पर अमन की चिंता इस दोहे में झलकती है- नन्हे बच्चे देश के, बन बैठे मजदूर। पापिन रोटी ने किया, उफ! कैसा मजबूर।।  जब प्रेम और श्रृंगार की बात होती है तब भी अमन की कलम शब्द बनकर फूटती है। एक दोहे में वे लिखते हैं- उम्र बिता दी याद में, प्रियतम हैं परदेश। धर कर आते स्वप्न में, कामदेव का वेश।। इसके अलावा अमन चांदपुरी ने गजलें भी खूब लिखी हैं। एक ग़ज़ल में वे लिखते हैं-यह दुनिया दर्द की मारी बहुत है, यहां रहने में दुश्वारी बहुत है। उठा न पाए इसको मीर तक भी, यह पत्थर इश्क का भारी बहुत है। एक दूसरी ग़ज़ल में वे लिखते हैं-अपनी लाश का बोझ उठाऊं नामुमकिन, मौत से पहले ही मर जाऊं नामुमकिन। दुनिया छोड़के जिस दुनिया में आया हूं, उस दुनिया से बाहर आऊँ नामुमकिन। उनकी क्षणिकाएं भी खूब पसंद की गई। जिसमें एक क्षणिका है- कागज की कश्ती सा है, मानव का जीवन, पानी में बड़े आराम से चले, पानी गर बरसे, देह गले, फिर चिता जले।

      वास्तव में अमन चांदपुरी कम उम्र के बड़े कठिन शब्द साधक का नाम है। कवि सम्मेलन और मुशायरा के मंचों से लेकर गोष्ठियों तक उनकी उपस्थिति दिखती रही है। तमाम बड़े शायरों और कवियों का सानिध्य उन्हें ऊंचाई तक ले गया। अभी 11 अप्रैल 2016 को खटीमा में आयोजित एक समारोह में अमन चांदपुरी को दोहा शिरोमणि की उपाधि से विभूषित किया गया है।

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परिचय -:
घनश्याम भारतीय
स्वतन्त्र पत्रकार/ स्तम्भकार
 
राजीव गांधी एक्सीलेंस एवार्ड प्राप्त पत्रकार
 
संपर्क – : ग्राम व पोस्ट – दुलहूपुर ,जनपद-अम्बेडकरनगर 224139 मो -: 9450489946 – ई-मेल- :  ghanshyamreporter@gmail.com
 
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