–  तनवीर जाफरी –

देश के अन्य राजनैतिक दलों की तुलना में भारतीय जनता पार्टी हमेशा से ही स्वयं को एक अलग पहचान रखने वाले राजनैतिक दल के रूप में प्रचारित करती रही है। भाजपा ने स्वयं भी अपने परिचय हेतु ‘पार्टी विद् डिफरेंस’ का नारा भी गढ़ा था। स्वयं को अन्य राजनैतिक दलों की तुलना में सबसे अधिक राष्ट्रवादी,राष्ट्रभक्त,हिंदुत्ववादी,ईमानदार व अनुशासित बताते रहना भाजपा की प्रारंभ से ही मुख्य रणनीति रही है। 2014 में यूपीए सरकार की नाकामियों का लाभ उठाकर किसी तरह भाजपा ने पहली बार देश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। और वरिष्ठ पत्रकार अरूण शौरी के शब्दों में डेढ़ लोगों के हाथ में जबसे यह देश गया तबसे भाजपा का वास्तविक चाल,चरित्र और चेहरा उजागर होने लगा। स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि भाजपा देश के अन्य सभी राजनैतिक दलों से कितनी भिन्न है। भिन्नता खासतौर पर वैचारिक भिन्नता की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो यह दावा कर रहे हैं कि बड़ी मुश्किल से साठ वर्षों बाद देश को तरक्की की राह पर लाया गया है। अब किसी और को बीच में मत आने देना। उधर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी अपने भाषणों में अपनी उपलब्धियां बताने से ज़्यादा ज़ोर कांग्रेस की चार पीढिय़ों का हिसाब मांगने में लगा रहे हैं। और अरूण शौरी इन्हीं को डेढ़ व्यक्ति बता रहे हैं। इनमें एक व्यक्ति तो वे अमित शाह को बताते हैं और आधा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को।





इसमें कोई दो राय नहीं कि इस समय भाजपा की पार्टी से लेकर सरकार तक की सारी रणनीतियां अकेले अमित शाह व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा तय की जा रही हैं। उसी सोची-समझी तथा गुजरात में एक दशक से भी लंबे समय तक आज़माई गई रणनीति का ही नतीजा है जो हमें दिल्ली दरबार में देखने को मिल रहा है। अर्थात् विकास की माला जपते रहना,विपक्षी दलों के नेताओं को किसी भी कीमत पर दल-बदल कराना,नेहरू-गांधी परिवार व कांग्रेस पर तुष्टिकरण  करने,वोट बैंक की राजनीति करने व हिंदू विरोधी होने जैसे झूठे-सच्चे लांछन लगाते रहना,देश में धार्मिक व सांप्रदायिक उन्माद को बढ़ाना या इन्हें बनाए रखना,देश के लगभग साठ वर्षों के कांग्रेस के शासनकाल की बड़ी से बड़ी उपलब्धियों की अनदेखी करना तथा अपनी छोटी से छोटी बात को बड़ी कर पेश करना,अपनी नोटबंदी जैसी नकारात्मकता को भी सकारात्मकता के रूप में पेश करना यहां तक कि भारतीय सेना की गतिविधियों का भी राजनीतिकरण करना भाजपा की ‘पार्टी विद् डिफरेंस’ की हकीकत को बेपर्दा करता है। भाजपा के नेताओं ने इसी सोची-समझी रणनीति के तहत ही अब एक नया फार्मूला यह भी ढूंढ लिया है कि जो भी नेता,राजनैतिक दल,अधिकारी,लेखक,पत्रकार, बुद्धिजीवी या कोई समाजसेवी भाजपा की नीतियों की आलोचना करता है या सरकार के किसी फैसले को अनुचित बताता है तो भाजपा के यही रणनीतिकार अपने उस आलोचक या विरोधी को पाकपरस्त बता देते हैं।

पिछले दिनों भाजपा ने अपनी पीठ थपथपाने की इसी प्रकार की एक कोशिश में भारतीय सेना की एक पराक्रम पूर्ण गतिविधि को भी शामिल करने का अनैतिक प्रयास किया। गौरतलब है कि 28 व 29 सितंबर 2016 को भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैन्य घुसपैठ व वास्तविक नियंत्रण रेखा के आसपास चलाए जाने वाले आतंकी प्रशिक्षण शिविरों से तंग आकर सीमा के उस पार जाकर आतंकियों के कई शिविर ध्वस्त किए थे। सामरिक भाषा में सर्जिकल स्ट्राईक के नाम से जानी जाने वाली यह कार्रवाई भारतीय सेना पूर्व में भी करती रही है और पहले भी कई बार इसके अच्छे परिणाम आ चुके हैं। परंतु चूंकि 28-29 सितंबर 2016 को की गई सर्जिकल स्ट्राईक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में रहते हुई थी इसलिए भाजपा ने इसे सेना के बजाए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा की उपलब्धि के रूप में प्रचारित करना ज़्यादा ‘लाभदायक’ समझा। हालांकि सितंबर 2016 को हुई इस सर्जिकल स्ट्राईक के बाद से ही भारतीय सेना के वर्तमान एवं निवर्तमान अधिकारियों ने मीडिया के समक्ष यह कहना शुरु कर दिया था कि इस ऑप्रेशन को राजनैतिक रंग न दिया जाए,यह भारत की ओर से दुश्मन देश के विरुद्ध की जाने वाली एक ऐसी कार्रवाई है जो भारतीय सेना दुश्मन के दांत खट्टे करने के लिए समय-समय पर करती रहती है।

परंतु भाजपा ने तो 29 सितंबर का दिन ‘लक्षित हमला दिवस’ के रूप में मनाए जाने का निर्णय ले लिया। हद तो यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा सर्जिकल स्ट्राईक की इस दूसरी वर्षगांठ पर देश के समस्त विश्वविद्यालयों को परिपत्र जारी कर दिए गए। देश के 51 प्रमुख शहरों में सर्जिकल स्ट्राईक की वर्षगांठ मनाए जाने का निर्देश रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी किया गया। इस आयोजन ने एक सवाल यह भी खड़ा किया कि सर्जिकल स्ट्राईक की वर्षगंाठ मनाए जाने का विचार सितंबर 2017 में क्यों नहीं आया? 2018 के अंत में ही भारतीय सेना के इस पराक्रम को याद करने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई? यदि यह 2019 के लोकसभा चुनाव तथा 5 राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के पूर्व अपनी पीठ थपथपाने का प्रयास नहीं तो और क्या है? और इन सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या देश की स्वतंत्रता के बाद से लेकर अब तक भारतीय सैन्य पराक्रम की गाथा लिखे जाने हेतु सबसे बड़ी उपलब्धि 28-29 सितंबर 2016 की उपलब्धि ही है या फिर भारतीय सेना ने इससे भी बड़े ऐसे कई पराक्रम दिखाए हैं जिसने पूरे विश्व में तथा विश्व इतिहास में देश के जवानों के पराक्रम का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज कर दिया है? निश्चित रूप से उन ऐतिहासिक भारतीय सैन्य पराक्रमों के समक्ष 28-29 सितंबर 2016 की घटना तो हमारी सैनिकों की वीरता की एक छोटी सी मिसाल मात्र है।

यदि भारतीय सेना का पराक्रम दिवस देश को मनाना ही है तो 6 दिसंबर 1971 को याद कर के भी मनाया जा सकता है। यही वह दिन था जिस दिन भारतीय सेना के हस्तक्षेप से पाकिस्तान दो टुकड़ों में विभाजित हो गया था और विश्व के इतिहास में बंगला देश नामक एक नए राष्ट्र ने जन्म लिया था।  भारतीय सेना के पराक्रम में 16 दिसंबर 1971 का वह दिन क्यों नही दर्ज किया जाना चाहिए जबकि पाकिस्तानी सेना ने ढाका के रामना रेसकोर्स गार्डन, ढाका में विश्व इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमपर्ण किया था और विश्व में लड़े जाने वाले सबसे संक्षिप्त 13 दिवसीय युद्ध का अंत करते हुए भारतीय सेना ने अपनी विजय पताका लहराई थी? कारगिल की जीत की महान उपलबिध को तो हम विजय दिवस के रूप में पहले ही मनाते आ रहे हैं। 1947,1965,1971 तथा 1999 गोया एक दो नहीं बल्कि कई बार देश का गौरव समझी जाने वाली भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस व पराक्रम का परिचय दुश्मन देशों को बार-बार दिया है। परंतु एक ऐसी विवादित सर्जिकल स्ट्राईका का श्रेय लेना जिसपर कि कई वर्तमान व पूर्व सैन्य अधिकारी भी सवाल खड़ा कर चुके हैं कतई मुनासिक नहीं है। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में जब 1971 की लड़ाई भारतीय सेना ने जीती थी उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमतिी इंदिरा गांधी को दुर्गा बताने वाला राजनेता कोई और नहीं बल्कि भाजपा के ही सबसे वरिष्ठ नेता पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ही थे। अमितशाह को कांग्रेस की चार पीढय़ों से हिसाब मांगने से पहले स्वर्गीय वाजपेयी जी के उपरोक्त कथन पर स्वयं गौर कर लेना चाहिए। भाजपा सहित प्रत्येक राजनैतिक दल को यह याद रखना चाहिए कि भारतीय सैन्य पराक्रम की घटनाएं पूरे देश का गौरव हैं किसी दल विशेष की जागीर नहीं।

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About the Author

Tanveer Jafri

Columnist and Author

Tanveer Jafri, Former Member of Haryana Sahitya Academy (Shasi Parishad),is a writer & columnist based in Haryana, India.He is related with hundreds of most popular daily news papers, magazines & portals in India and abroad. Jafri, Almost writes in the field of communal harmony, world peace, anti communalism, anti terrorism, national integration, national & international politics etc.

He is a devoted social activist for world peace, unity, integrity & global brotherhood. Thousands articles of the author have been published in different newspapers, websites & news-portals throughout the world. He is also recipient of so many awards in the field of Communal Harmony & other social activities.

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