Monday, July 13th, 2020

सूफी परंपरा का ध्वजावाहक:राम दरबार,चंडीगढ़

-   निर्मल रानी   - 

भारतवर्ष दुनिया के उन देशों में सर्वप्रमुख है जहां विभिन्न धर्मों,आस्थाओं तथा विश्वासों के लोग रहते हैं तथा अपने-अपने रीति-रिवाजों तथा अपनी धार्मिक मान्यताओं व परंपराओं का अनुसरण करते हैं। गोया हिंदू यदि मंदिर में भगवान की पूजा करता है तो मुसलमान मस्जिद को खुदा का घर समझकर वहां नमाज़ पढऩे में पुण्य मिलने की कामना करता है। इसी प्रकार सिख समुदाय गुरुद्वारों में गुरू ग्रंथ साहब के समक्ष नतमस्तक होता है तो ईसाई समाज चर्च में प्रार्थना कर अपने प्रभु को याद करता है। गोया प्रत्येक धर्म का धर्मावलंबी अपने-अपने धार्मिक स्थलों की सीमाओं में रहकर ही अपने ईश को याद करने या पुण्य अर्जित करने का प्रयास करता है। इसमें भी कोई शक नहीं कि सभी धर्मों से संबंधित धर्मग्रंथ अथवा महापुरुष मानव जाति को सद्मार्ग पर चलने तथा मानवता का कल्याण करने का संदेश देते हैं। सभी धर्म इंसानों में सद्भाव,भाईचारा व एकता का संदेश देते हैं। सभी धर्म बुराईयों व अत्याचार,झूठ आदि के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं। ऐसे में एक सवाल यह ज़रूर उठता है कि जब सभी धर्मों के धर्मग्रंथ अथवा महापुरुष लगभग एक जैसे ही संदेश देते हैं फिर आिखर सब के धर्मस्थान अलग-अलग क्यों हैं? क्यों मंदिर में नमाज़ नहीं पढ़ी जा सकती या मस्जिद में आरती नहीं की जा सकती? क्यों गुरुद्वारे में ईसाई बाईबल की प्रार्थना नहीं कर सकता तो क्यों चर्च में शब्द कीर्तन नहीं हो सकता? जब सारे ही धार्मिक संसाधन ईश्वर को याद करने के लिए ही हैं फिर आिखर उसे याद करने या उसके समक्ष नतमस्तक होने के लिए अलग-अलग धर्म या अलग-अलग नामों के धर्मस्थानों की ज़रूरत क्या है?

इसका जवाब हमें सूफी परंपरा के वाहक फकीरों व संतों से बड़ी आसानी से मिल जाएगा। नानक हों या कबीर,ख़््वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती हों या शिरडी वाले साईं बाबा, हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया हों या अमीर ख़ुसरो या फिर गुरू नानक देव के सहयोगी बाला,मरदाना या फिर स्वर्ण मंदिर की बुनियाद रखने वाले मियां मीर अथवा इन जैसे और अनेक महान संत,इन सभी ने इंसान को हिंदू-मुसलामन,सिख अथवा इसाई की नज़रों से देखने के बजाए केवल इंसान के रूप में देखने का संदेश दिया है। यही वह परंपरा था जिसने गुरू नानक देव के शिष्यों में हिंदू व मुसलमान का भेद नहीं रखा। इसी परंपरा ने स्वामी रामानंदाचार्य को कबीर को अपना शिष्य बनाने से नहीं रोका। यही वह परंपरा थी जिसने रहीम-रसखान व मलिक मोहम्मद जायसी जैसे अनेक ऐसे मुस्लिम महाकवि प्रदान किए जिन्होंने सारा जीवन हिंदू धर्म के आराध्य देवी-देवताओं का गुणगान किया। इसी परंपरा ने शिरडी वाले साईं बाबा को इतना लोकप्रिय व स्वीकार्य बना दिया कि आज अनेक रूढ़ीवादी धर्माधिकारियों को अपनी सत्ता पर खतरा मंडराता दिखाई देता है। इस प्रकार के और न जाने कितने उदाहरण ऐसे हैं जो सूफी परंपरा तथा सर्वधर्म संभाव का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसी सूफी परंपरा के ध्वजावाहक स्थानों में एक प्रमुख स्थान चंडीगढ़ स्थित राम दरबार भी है। पाकिस्तान के महान सूफी संत स्वर्गीय मोहम्मद शाह द्वारा राम दरबार में फकीरी परंपरा की शुरुआत करते हुए अपने शागिर्दों माता राम बाई अम्मी हुज़ूर तथा बाबा सख़ी चंद को सर्वधर्म संभाव की इस महान परंपरा अर्थात् सूफी मत को आगे बढ़ाने की जि़म्मेदारी सौंपी गई। यह स्थान पूरी श्रद्धा व आस्था के साथ सूफी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। राम दरबार स्थित माता रामबाई चेरिटेबल ट्रस्ट दरअसल इस समय वह काम कर रहा है जो देश की सरकारों तथा देश के जि़म्मेदार लोगों को करना चाहिए। राम दरबार धार्मिक,सामाजिक,आर्थिक तथा जातीय आधार पर भेदभाव समाप्त करने,सबको एक साथ मिलकर बैठने,धार्मिक व जातिवादी वैमनस्य समाप्त कर सामूहिक रूप से अपने-अपने ईष्ट अथवा पीर-ो-मुर्शिद का स्मरण करने की प्रेरणा देता है। आज राम दरबार की गद्दी पर बेशक अम्मी हुज़ूर व सखी चंद जी मौजूद नहीं हैं परंतु उनके वारिस तथा इस स्थान के गद्दीनशीन शहज़ादा पप्पू सरकार अपनी कारगुज़ारियों से राम दरबार की परंपराओं को कायम रखने में अपनी ओर से कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते हैं। राम दरबार देश के उन स्थानों में से एक प्रमुख है जहां सभी धर्मों के लोग न केवल आते हैं बल्कि अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं का भी अनुसरण करते हैं।

राम दरबार के वारिस व गद्दीनशीन शहज़ादा पप्पू सरकार दरबार में अपने गुरुजनों माता रामबाई अम्मी हुज़ूर व बाबा सखी चंद जी महाराज की स्मृति में एक ऐसा विशाल मकबरा तैयार करवा रहे हैं जो केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ की एक ऐतिहासिक व आकर्षक इमारत साबित होगी। गत् दस वर्षों से सर्वधर्म संभाव के प्रतीक इस विशाल भवन का निर्माण चल रहा है। आशा है कि बीस जनवरी 2020 को इस विशाल भवन का विधिवत् मुहूर्त भी किया जाएगा। राम दरबार के इसी प्रांगण में प्रत्येक वर्ष अपने पूर्वज गुरूजनों के नाम पर एक सप्ताह का सर्वधर्म समागम एवं उर्स का आयोजन 14 जनवरी से 20 जनवरी के मध्य किया जाता है। इस साप्ताहिक कार्यक्रम में श्रीमद् भागवद का पाठ भी होता है और श्री गुरू ग्रंथ साहब का अखंड पाठ भी किया जाता है। यहां भजन-कीर्तन भी होता है और राम चरित मानस का अखंड पाठ भी होता है। यहां कव्वालियां भी होती हैं और नात तथा कसीदे आदि भी पढ़े जाते हैं। मेंहदी की रस्म व सूफी परंपरा का ध्वजारोहण भी होता है। गोया इस आयोजन में व इस स्थान पर आने वाला कोई भी व्यक्ति यहां हिंदू-मुस्लिम,सिख-ईसाई आदि की संकुचित भावनाओं से नहीं बल्कि मानवता की भावनाओं से आता है तथा इन आयोजनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है।

राम दरबार चंडीगढ़ की इस पवित्र व महान गद्दी से िफल्म जगत के लोगों का बहुत गहरा नाता रहा है। आज भी इस स्थान पर िफल्म अभिनेता प्राण द्वारा अम्मी हुज़ूर को भेंट की गई फि़एट कार मौजूद है। यह स्थान मुसीबतज़दा,परेशान व दु:खी लोगों को राहत पहुंचाने वाले स्थान के रूप में जाना जाता है। यहां के आशीर्वाद से अनेकानेक लोगों को स्वास्थय लाभ मिला, संतान रत्न की प्राप्ति हुई तथा नौकरियां लगीं व कारोबार फूले-फले। यहां के गद्दीनशीन शहज़ादा पप्पू सरकार जिन्हें केवल उनके गुरूजनों अर्थात् अम्मी हुज़ूर व सखी चंद जी द्वारा ही अपना शिष्य नहीं बनाया गया बल्कि स्वयं महान सूफी संत मोहम्मद शाह जी ने भी शहज़ादा पप्पू सरकार को राम दरबार का असली वारिस व गद्दीनशीन घोषित किया। निश्चित रूप से आज पप्पू सरकार के आशीर्वाद व उनकी दुआओं में भी एक सच्चे फकीर का रूप दिखाई देता है।

शहज़ादा पप्पू सरकार अप्रवासी भारतीय हैं। इनके कई व्यवसाय अमेरिका में संचालित हो रहे हैं। चूंकि सरकार को राम दरबार का वारिस व गद्दीनशीन बचपन में ही बना दिया गया था इसलिए वह अपने गुरूजनों की इच्छाओं का पालन करते हुए इस स्थान पर न केवल अपनी निजी कमाई के करोड़ों रूपये खर्च कर रहे हैं बल्कि अमेरिका में अपना कामकाज छोड़ कर इस स्थान के निर्माण व यहां की परंपराओं व रीति-रिवाजों की रक्षा करने व उन्हें आगे बढ़ाने के लिए काफी समय चंडीगढ़ में भी बिताते हैं। देश में शायद ही किसी भी गुरू का कोई शिष्य ऐसा हो जो अपनी निजी कमाई के पैसों से अपने गुरू की परंपराओं का निर्वहन इतनी गंभीरता व ईमानदारी से करता हो। आज पूरे देश में ऐसे ही स्थानों की ज़रूरत है जहां ऐसी सूफी परंपरा का पालन होता हो जिसमें सभी धर्मों,संप्रदायों व जातियों के लिए समान रूप से दरवाज़े खुले हों।

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परिचय –:
निर्मल रानी
लेखिका व्  सामाजिक चिन्तिका
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर निर्मल रानी गत 15 वर्षों से देश के विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व न्यूज़ वेबसाइट्स में सक्रिय रूप से स्तंभकार के रूप में लेखन कर रही हैं !
संपर्क -: Nirmal Rani  :Jaf Cottage – 1885/2, Ranjit Nagar, Ambala City(Haryana)  Pin. 4003 E-mail : nirmalrani@gmail.com –  phone : 09729229728
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