Friday, April 3rd, 2020

सुप्रीम कोर्ट पहुंची जमीअत उलमा ऐ हिन्द

आई एन वी सी न्यूज़
नईदिल्ली ,

 
जमीअत उलमा ऐ हिन्द ने आज नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर की। जमीअत उलमा ऐ हिन्द के महासचिव मौलाना महमूद मदनी द्वारा दायर याचिका में अनुरोध किया गया है कि अधिनियम को निरस्त किया जाए। इस लिये कि यह अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद १४ तथा २१  का उलंघन करता है. इस अधिनियम में 'अवैध प्रवासियों' की परिभाषा में धर्म के आधार पर भेद भाव किया गया है, और इसका इतलाक़ केवल मुसलमानों पर किया गया है, जब कि हिंदू, सिखों, बौद्धों, जैनियों और पारसियों को' अवैध प्रवासियों' के दायरे से बाहर रखा गया है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद १४ के विपरित है। याचिका में आगे कहा गया है कि धारा (१४) के तहत इस अधिनियम में वर्गीकरण इस आधार पर समझ में नहीं आता है कि याचिका में कई धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से बहाई, कालाश,  जिकरी (महदवी) को शामिल नहीं किया गया है। जबकि वे भी धर्म या विश्वास के आधार पर भेदभाव का सामना करते हैं। इसके अलावा, यह तथ्य है कि भारतीय संविधान की मूल संरचना धर्मनिरपेक्षता पर  आधारित है, इस अधिनियम में इस मूल आधार को नुकसान पहुंचाया गया है।

याचिका में कहा गया है कि जो हिंदू प्रवासी असम में एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर हैं उन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम की धारा (6बी) के तेहत तनागरिकता का अधिकार होगा, जब कि समान स्थिति का सामना करने वाले मुसलमानों को यह अधिकार नहीं मिलेगा जो कि सरासर भेद भाव पर आधारित है। हालांकि यह एक तथ्य है कि असम में कई लोग तकनीकी आधार पर नागरिकता साबित नहीं कर सके  जिन में अज्ञानता या आयू या नाम में मामूली अंतर शामिल है। इसके अलावा भारत सरकार ने पूरे देश में NRC लगाने का इरादा व्यक्त किया है।ऐसे में यदि कोई व्यक्ति दस्तावेज़ के आधार पर अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सकता है तो उसे नागरिकता के राष्ट्रीय रजिस्टर से बाहर रखा जाएगा। तब अगर वो गैर मुस्लिम है तो  उसे  इस अधिनियम की धारा (६बी) के तहत नागरिकता मिलेगी और यदि वह मुस्लिम है तो उसे वंचीत किया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का खुला भेद भाव न केवल संविधान के आधार पर गलत होगा बल्कि राष्ट्रीय एकता के प्रभावीत होगा।

याचिका में कई अंतर्राष्ट्रीय डिक्लेरेशन का भी हवाला दिया गया है विशेष रूप से मानवअधिकारों से संबंधीत यूनीवर्सल डिक्लेरेशन का भी हवाला दिया गया है जिस्की अनुच्छेद 15 के तहत सभी को नागरिकता का अधिकार प्राप्त है तथा किसी भी बयक्ती को नागरिकता के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है, इस के  अलावा ये  अधिनियम अंतर्राष्ट्रीय नागरिक अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों (iccpr) की अनुच्छेद (26) का भी उल्लंघन करता है।

इन सभी तर्कों के साथ, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट से अधिनियम को रद्द करने का अनुरोध किया है। आज, एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड शकील अहमद सैयद ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद द्वारा रिट याचिका दायर की।

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