Friday, December 6th, 2019

साक्षात्कार : हिन्दी साहित्य एक पार्ट-टाइम एक्टीविटी है : तेजेंद्र शर्मा

interviews-bu-sonali-bose,tहिन्दी साहित्य के क्षेत्र में तेजेंद्र शर्मा  का नाम आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है | जो भी हिन्दी साहित्य से थोडा बहुत भी सरोकार रखता है उसके लिए तेजेंद्र शर्मा जी का नाम नया नहीं है| तेजेन्द्र शर्मा की कहानियां उनके सजग साहित्यकार होने का प्रमाण है। उनके आसपास जो कुछ घटित होता है वह उनके मानसिक रूप से उद्वेलित करता है। तमाम सवाल उनके ज़हन में कुलबुलाने लगते हैं और तब उनकी कलम खुदबखुद चलने लगती है। अपने आसपास से वे ऐसे चरित्र चुन लेते हैं जो पन्नों पर उनकी लड़ाई लड़ते हैं। विषय वैविध्य और विषयों की सामायिकता तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों की एक अन्य विशेषता है। कथा साहित्य में शिल्प एवं शैली के स्तर पर जो परिवर्तन हुये हैं, उनकी झलक तेजेंद्र शर्मा की कहानियों में देखने को मिलती है। पिछले कुछ वक़्त से मैं तेजेंद्र जी से मिलकर उनका साक्षात्कार लेने के लिए सही समय की फ़िराक में जुटी हुई थी लेकिन किसी न किसी वजह से मुलाक़ात संभव नहीं हो पा रही थी | एक तो उनका लन्दन में निवास इस भौगोलिक दूरी को पाटने में असमर्थ है और समय समय पर किसी कार्यवश या सम्मान समारोह में शिरकत के लिए उनका भारत में आना जाना तो लगा रहता है लेकिन समय की कमी यहाँ भी अक्सर हो ही जाती है | लेकिन तमाम मजबूरियों और समयाभाव के बावजूद तेजेंद्र जी के इस बार के भारत प्रवास के दौरान उनसे मेरी मुलाक़ात संभव हुई 20 मार्च 2016 को 15वें बंगाली पुस्तक मेले के दौरान जहां उनके  बांग्ला कहानी संग्रह तेजेन्द्र शर्मा की निर्वाचित कहानियां का लोकार्पण और उस पर चर्चा का आयोजन था| पेश है तेजेंद्र जी से मेरे सवाल और उनके बेबाक़ जवाब :  सोनाली बोस ( सह -संपादिका आई एन वी सी न्यूज़ )

सोनाली बोस - : प्रवासी भारतीय होने के नाते विदेश में भारतीय साहित्य को विश्व साहित्य में आज भी दोयम दर्जा क्यों हासिल है? आपकी राय और सुझाव।

तेजेंद्र शर्मा -:यह ग़लतफ़हमी आपको किसने डाल दी है कि विश्व साहित्य में हिन्दी साहित्य दोयम दर्जे का माना जाता है ? सच तो यह है कि वैश्विक स्तर पर हिन्दी साहित्य की स्थिति ना होने जैसी है। उसका सबसे बड़ा कारण है कि हिन्दी साहित्य एक पार्ट-टाइम एक्टीविटी है। एक पार्ट-टाइम नौकरी के भी कुछ उसूल होते हैं, तयशुदा काम करने का समय होता है। यहां तो हिन्दी लेखक फ़ुल-टाइम नौकरी करता है; परिवार की सारी ज़िम्मेदारियां पूरी करता है; नून तेल आटे के चक्करों से निकलता है तो घर के दूसरे काम सामने खड़े होते हैं। शोध करने वाले तो इक्का दुक्का लेखक ही हैं। अधिकांश हिन्दी साहित्य भावनाओं का पिटारा है, रिश्तों की परिभाषा। भला ऐसे में हम उससे वैश्विक स्तर के साहित्य की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं। दूसरी समस्या है प्रकाशकों की। जिस साहित्य का प्रकाशक पहला संस्करण 300 से 500 पुस्तकों का निकालता है, वो भला आपके साहित्य को वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कैसे करवा सकता है। अधिकांश हिन्दी साहित्य लायब्रेरियों में डंप होने के लिये लिखा जाता है। हैरानी तो तब हुई कि जब कुछ लोगों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार वापिस करने की घोषणा की तो पता चला कि इन लोगों ने भी कुछ लिखा है जो पुरस्कृत हो चुका है।

जब तक हिन्दी साहित्य में भी अंग्रेज़ी की तरह प्रकाशन का सिस्टम नहीं अपनाया जाता तब तक हमारा साहित्य छपेगा, मित्रों में बंटेगा और ग़ायब हो जाएगा। पिछले करीब तीन दशकों तक हिन्दी साहित्य एक ख़ास विचारधारा के दबाव में लिखा गया। इस विचारधारा को विश्व स्तर पर सराहने  वाला कोई है नहीं। अनुवाद इतना मंहगा है कि लेखक तो करवा नहीं पाता और प्रकाशक को उसमें रुचि नहीं है। जब तक आपका साहित्य अंग्रेज़ी में अनूदित हो कर विश्व भर के देशों में उपलब्ध नहीं करवाया जाएगा हिन्दी साहित्य कुएं की टर टर बन कर रह जाएगा। सवा अरब की आबादी वाले देश में हिन्दी साहित्य केवल दो से चार हज़ार लोगों का शुगल मेला है। भारत की त्रासदी यह है कि यहां संजीव जैसे लेखक को स्वयं बताना पड़ता है कि वह लेखक है जबकि चेतन भगत को पूरा भारत जानता है।

  सोनाली बोस - : मौजूदा राजनीतिक हालात ने क्या हमारे साहित्य के साथ साथ हमारी भाषा को भी असंयत और उग्र बनाया है?

तेजेंद्र शर्मा -:बात यह है सोनाली कि जहां तक वामपंथ का सवाल हे वे तो किसी भी अन्य सोच के प्रति हमेशा से असहिष्णु रहे हैं। आप हमें एक भी उदाहरण ऐसा नहीं दिखा सकते कि पहल जैसी पत्रिका में किसी ग़ैर वामपंथी को ज्ञानरंजन ने अपने पूरे जीवन में छापा हो। जहां जहां कोई भी पुरस्कार या सम्मान मिलता था वहां वामपन्थी लोग ही गद्दियों पर कब्ज़ा किये रहते थे और अपने जैसी सोच के लेखक को ही सम्मान देते थे। इनका मानना था कि या तो आप वामपन्थी है अन्यथा आप दक्षिण पन्थी हैं यानि कि आर.एस.एस. के साथ हैं। किसी लेखक में हिम्मत नहीं थी कि इन मठाधीशों को बता सके कि भाई साहित्य में दो पार्टी रूल नहीं चलता है। लेखक के लिये आम आदमी का दर्द ही लेखन की सामग्री है। उसके लिये किसी राजनीतिक पार्टी के एजेण्डा की कोई आवश्यक्ता नहीं है। भारत में सरकार बदलने के साथ साथ इन पुरोधाओं की गद्दियां हिलने लगीं, आसन डोलने लगे। सरकार ने अपनी पसन्द के लोगों को अकादमियों की अध्यक्षता सौंपनी शुरू कर दी। विश्व हिन्दी सम्मेलन में इन लेखकों को कोई महत्व नहीं दिया। अब अचानक देश में असहिष्णुता बढ़ने लगी। साहित्य अकादमी के सम्मान लौटाने की घोषणाएं होने लगीं। (लौटाया शायद तीन चार ने ही) बस बहती गंगा के पानी पर अपना नाम लिख कर ये लोग शहीदों की सूचि में नाम लिखवाने लगे। यदि गिनीस बुक ऑफ़ रिकॉर्ड्स वाले इस बात का सर्वे करवाएं कि विश्व के किस नेता को सबसे अधिक गालियां खाने को मिलीं तो आसानी से नरेन्द्र मोदी उस मुक़ाबले का स्वर्ण पदक जीत लेंगे। आज हालात ये हैं कि जेएनयू में देश-विरोधी नारे लगाए जाते हैं; अफ़ज़ल गुरू को हीरो घोषित किया जाता है। एक सिरे से वामपन्थी उन भटके हुए विद्यार्थियों की अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देते हैं मगर तिनामिन स्कवेयर में चीनी सरकार द्वारा लोकतन्त्रीय विद्यार्थियों के विरुद्ध टैंक के इस्तेमाल का समर्थन करते हैं। याद रहे कि वामपन्थी अपने मसीहाओं के लिये देश के बाहर चीन की ओर देखते हैं।  हमारी सेना के जनरल रो रो कर दुहाई दे रहे हैं कि हम अकेले पड़ गये हैं। इन हालात में ज़ाहिर है कि जो भी जिस तरफ़ खड़ा है वह दूसरी तरफ़ खड़े लोगों के लिये उग्र एवं असंयत भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। यहां तक कि साहित्यकार एवं पत्रकार भी शराफ़त सहिष्णुता का दामन छोड़ कर अभद्र होते दिखाई दे रहे हैं।

सोनाली बोस - : इसका मतलब यही हुआ कि जब तक हिन्दी साहित्यकार कुर्ता पाजामा और झोला दाढ़ी वाली स्थिति को पार नहीं करता तब तक अपनी पहचान बना पाना असंभव होगा? मतलब बिकने के लिए दिखाना बेहद ज़रूरी है?

तेजेंद्र शर्मा -:कुर्ता पाजामा और झोला दाढ़ी ने हिन्दी साहित्यकार को ग़रीब और बेचारा सा बना दिया है। भला क्या ज़रूरत है कि हिन्दी का साहित्यकार ग़रीब ही दिखे? भारतीय परम्परा सी बन गई है कि लेखक रोनी शक्ल का इन्सान ही हो। और शायद इसीलिये आज हिन्दी के लेखक का कोई सम्मान नहीं है। उसका शोषण प्रकाशक दिल खोल कर करता है। हिन्दी के लेखक को शायद पता ही नहीं होगा कि रॉयल्टी का रंग कैसा होता है। हिन्दी के 75 प्रतिशत लेखकों को तो किताबें पैसे दे कर छपवानी पड़ती हैं। भला उन्हें रॉयल्टी के अर्थ क्या पता होंगे। ऐसा क्यों है कि हिन्दी के बड़े से बड़े लेखक को आम जनता नहीं पहचानती है। जबकि अंग्रेज़ी में लिखने वाला कोई भी नाम अपना स्टेटस  बना लेता है। हिन्दी वाला चेतन भगत की बुराइयां करता रहेगा मगर स्वयं कहीं पहुंच नहीं पाएगा। हिन्दी के लेखक के लिये ज़रूरी है के वह लेखन को उसी गंभीरता से ले और अपने आपको भी। वह अपनी कीमत स्वयं पहचाने और हिन्दी साहित्य को ग़रीबी से जोड़ना बन्द कर दे। अपनी सोच को मॉडर्न बनाना होगा और व्यक्तित्व को भी।

सोनाली बोस - : क्या लिखने पढने वाले समाज या बुद्धिजीवी वर्ग को किसी ख़ास राजनीतिक विचारधारा के समर्थन या विरोध में खुलकर आना आज ज़रूरी लगता है?

तेजेंद्र शर्मा -:सोनाली हिन्दी साहित्य का जितना नुक़्सान विचारधारा के दबाव ने किया है उतना तो कोई साहित्य का घोषित दुश्मन भी नहीं करेगा। लगभग तीन दशकों तक हिन्दी साहित्य एक ही विचारधारा के दबाव में एकरस साहित्य छापता रहा। उद्देशय यही था कि नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, मैनेजर पाण्डेय, परमानन्द श्रीवास्तव जैसे आलोचकों को अपने लेखन से प्रभावित करके कोई सम्मान प्राप्त किया जा सके। मेरा मानना है कि साहित्य को आम आदमी के पक्ष में खड़ा होना पड़ेगा। हिन्दी साहित्यकार को हारे हुए इन्सान का दर्द समझने के लिये किसी विचारधारा का मोहताज नहीं होना चाहिये। यदि लेखक संवेदनशील है तो उसकी क़लम स्वयंमेव ही शोषित के दर्द को अपने पन्नों पर दिखाएगी और उसकी लड़ाई लड़ती दिखाई देगी। हिन्दी में दक्षिणपन्थ का साहित्य जैसी कोई वस्तु तो कहीं है नहीं। पहले साहित्य होता था और फिर आ गया वामपन्थी साहित्य। उनके मठाधीषों का कहना है कि या तो आप हमारे साथ हैं वर्ना आर.एस.एस. के साथ हैं। क्यों भाई मैं इन दो  धुरों के कहीं बीच अलग से क्यों नहीं हो  सकता। क्या आम आदमी केवल चीन और रूस में होता है ? मुझे उस आम आदमी का दर्द समझने के लिये कार्ल मार्क्स को पढ़ना क्यों ज़रूरी है। यदि वामपन्थी अपने ख़ुदा के लिये देश के बाहर देखता है तो वह भारतीय आम आदमी के दर्द को समझ कैसे पाएगा।

सोनाली बोस - : आप जेएनयू और दादरी काण्ड इन दोनों मुद्दों पर बुद्धिजीवी वर्ग की ख़ास प्रतिक्रिया पर अपने विचारों से अवगत काराएं?

तेजेंद्र शर्मा -:सोनाली जहां तक दादरी काण्ड का सवाल है, कोई भी संवेदनशील व्यक्ति उसकी वकालत नहीं कर सकता। दादरी में जो हुआ उसकी केवल भर्त्सना की जा सकती है। मगर सवाल यह है कि दादरी में अभियुक्त किसी भी दल या जमात से जुड़े हों, उस स्थान की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी किस की है? अभियुक्तों को पकड़ कर जेल में डालने की ज़िममेदारी किसकी है? क्या उत्तर प्रदेश में कोई सरकार है या नहीं है? अखिलेश यादव की सरकार किसके आदेश की प्रतीक्षा कर रही है? दादरी में जिसकी हत्या हुई उसे न्याय कब मिलेगा? क्या नरेन्द्र मोदी की सरकार को असहिष्णु  कह देने मात्र से हमारा काम पूरा हो जाता है? उत्तर प्रदेश सरकार का यह दायित्व है कि वह बिना किसी राजनीतिक दबाव में आए न्याय करे। मगर् हमारे देश में तो अजमल कसाब और अफ़ज़ल गुरू जैसे लोगों फांसी लगाने में सालों साल लग जाते हैं, फिर भला दादरी काण्ड वाले क्यों भारतीय कानून से डरने लगे। वस्तुस्थिति यह है कि कर्नाटक में कॉंग्रेस की सरकार है और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की। और आरोप यह है कि संघ परिवार से जुड़े किसी  गुट के सदस्यों ने हत्या की है। फिर परेशानी क्या है? अरे भाई आप तो बीजेपी और मोदी के पूरी तरह ख़िलाफ़ हैं। क्यों नहीं न्यायिक प्रक्रिया में तेज़ी ला कर नरेन्द्र मोदी को शर्मसार करते हैं? मगर नहीं, यदि दोषियों ने कोर्ट में अपने आप को बेगुनाह साबित कर दिया तो मुफ़्त का प्रचार कैसे मिलेगा। सभी दलों का स्वार्थ इसी में है कि समस्याएं खड़ी रहें और उन पर राजनीति जारी रहे। कांग्रेस पार्टी यदि यह घोषणा करदे कि हमारी कर्नाटक सरकार निकम्मी है और हम चाहते हैं कि नरेन्द्र मोदी स्वयं अपने विरुद्ध अदालत में केस करें, तो शायद ऐसा भी हो जाए। फिर साहित्य अकादमी के पुरस्कार वापिस करने से क्या हासिल होगा। क्या इससे कर्नाटक या उत्तर प्रदेश सरकारों पर कोई असर होगा। बस बहती गंगा में हाथ धोकर शहीदों में अपना नाम भी लिखवा दिया।  कुछ मुद्दे सीधे सीधे कानून और व्यवस्था के होते हैं उन पर राजनीति नहीं होनी चाहिये। ख़ासकर के लेखकों को टुच्ची राजनीति से बचना चाहिये। उन्हें समाज का निर्माता बनना है।

सोनाली बोस - : तेजेंद्र जी अब मैं अपने सबसे बुनियादी सवाल पर आती हूँ कि लिखने और वो भी हिन्दी में लिखना आपने कब शुरू किया? अक्सर देखा जाता है कि हर लेखक की कोई न कोई लेखकीय प्रेरणा होती है... आपकी कोई भावनात्मक प्रेरणा...?

तेजेंद्र शर्मा -:सवाल तो वाजिब है, मगर मेरे लिये समस्या यह है कि हिन्दी में आने से पहले मैनें केवल जासूसी उपन्यास पढ़ रखे थे। हां अंग्रेज़ी में मैं चार्ल्स डिकन्स और नये लेखकों में आर्थर हेली को बहुत पसन्द करता था। ओ हेनरी की कहानियों के बिना तो कहानीकार बनने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मगर हिन्दी में कोई ऐसा लेखक नहीं है जिसे मैं अपनी प्रेरणा कह सकूं। यदि मेरी कोई प्रेरणा हो सकती है तो मेरी पत्नी इन्दु हो सकती है। उसने पढ़ना सिखाया, लिखना सिखाया, और अपने लिखे हुए को खारिज करना सिखाया। एक ज़माने में नरेन्द्र कोहली की दीक्षा बहुत पसन्द आई थी। फिर भीष्म साहनी, शैलेश मटियानी, कमलेश्वर, मोहन राकेश आदि बहुत पसन्द आए। राजस्थान के एक लेखक थे पानू खोलिया उनके दो उपन्यास अच्छे लगे। मगर इन सबसे अधिक पसन्द आए जगदीश चन्द्र। यदि कोई एक लेखक मुझे संपूर्ण रूप से पसन्द है तो वे जगदीश चन्द्र ही हो सकते हैं। लगता है जैसे उनकी क़लम में कैमरा लगा हुआ है और वे पंजाब की नस नस से वाक़िफ़ हैं। भावनात्मक प्रेरणा तो इन्दु है ही लेखकीय प्रेरणा नहीं कहूंगा मगर बहुत से लेखकों की बहुत सी कृतियां पसन्द हैं। एक मज़ेदार बात और... मैं आज के युवा कहानीकारों को ज़रूर पढ़ता हूं ताकि अपने लेखन में ताज़गी बरक़रार रख सकूं।

सोनाली बोस - :  लेखन के क्षेत्र में आपके द्वारा शुरू किये गए '' इंदु शर्मा कथा सम्मान '' के बारे में कुछ बताएं?

तेजेंद्र शर्मा -:मैं पहले ही बता चुका हूं कि मुझे कहानी लेखन में प्रेरित करने वाली मेरी पत्नी इन्दु ही थीं। वह बाक़ायदा मेरी कहानियों की पहली पाठक तो होती ही थी, साथ ही मेरी कहानियों को बेहतर बनाने में सक्रिय योगदान भी देती थी। मेरी कहानियों की भाषा, व्याकरण एवं थीम तक में उसका दख़ल था। यदि मैं आज हिन्दी लेखक हूं तो केवल इन्दु के कारण। इन्दु की असामयिक मृत्यु 1995 में कैंसर से हो गई थी। उस समय उसकी आयु 39 वर्ष की थी। बहुत बड़ा आघात था मेरे लिये। बच्चे छोटे थे। जगदम्बा प्रसाद दीक्षित हमारे पड़ोसी थे। उनसे अपनी दिल की बात कही - “भाई साहब, मैं तो किस्मत वाला था कि मुझे इन्दु मिली मगर हर युवा लेखक की किस्मत में तो इन्दु नहीं होती। मैं कतरा कतरा इन्दु बांटना चाहता हूं।” दीक्षित जी समझे नहीं। तब मैनें कहा कि मैं इन्दु के नाम पर एक सम्मान शुरू करना चाहता हूं। हमारी अगली मीटिंग डॉ. धर्मवीर भारती के घर हुई। उन्होंने ही नाम सुझाया। और यह सम्मान 40 वर्ष से कम उम्र के हिन्दी कथाकारों के लिये शुरू किया गया। पहला सम्मान डॉ. भारती ने अपने हाथों से गीतांजलिश्री को दिया था। मुंबई का पहला हिन्दी कार्यक्रम जो कि एअर कंडीशन और कार्पेट वाले हॉल में हुआ। मेरे लंदन बसने़ गीतांजलिश्री के बाद सन 2000 से यह सम्मान अंतरराष्ट्रीय हो गया और पहला सम्मान चित्रा मुद्गल को उनके उपन्यास आवां पर दिया गया। पहले पांच साल केवल कहानी पर सम्मान दिया जाता था मगर अंतरराष्ट्रीय होने के बाद कथा साहित्य पर कर दिया गया। यह एक अकेला सम्मान है जो कि ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में दिया जाता है।

सोनाली बोस - : कथा यूके क्या है?   क्या आप कथा यूके के माध्यम से प्रवासी  साहित्य को जोड़ना चाहेंगे। प्रवासी भारतीय साहित्य को आप कैसे परिभाषित करते हैं और इससे जुड़ी आपकी आगे की योजनाएँ क्या है?

तेजेंद्र शर्मा -:मुंबई में हमने एक संस्था शुरू की थी इन्दु शर्मा मेमेरियल ट्रस्ट। कथा यू.के. उसी का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप है। यह ब्रिटेन में बसे दक्षिण एशियाई मूल के हिन्दी लेखकों की संस्था है। हम यहां ब्रिटेन में कथा गोष्ठियां आयोजित करते हैं जिसमें दो लेखक अपनी कहानी सुनाते हैं और उन पर चर्चा की जाती है। हम स्थानीय लेखकों को प्रोत्साहित करने के लिये पद्मानन्द साहित्य सम्मान का भी आयोजन करते हैं। भारत से आने वाले साहित्यकारों के लिये कार्यक्रमों का आयोजन। हिन्दी फ़िल्मों से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन, कहानी कार्यशालाएं आदि का आयोजन हमारे महत्वपूर्ण कार्य हैं। कथा यू.के. ने भारत में प्रवासी साहित्य सम्मेलनों का आयोजन किया है। पहली बार समूचे प्रवासी लेखन को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। दरअसल साहित्य प्रवासी नहीं होता। प्रवासी होता है लेखक । मगर हमारे यहां सुविधा के लिये भारत से बाहर लिखे जा रहे हिन्दी साहित्य को प्रवासी साहित्य नाम दे दिया गया है। अब तो भारत के विश्वविद्यालयों में प्रवासी लेखन को पाठ्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। प्रवासी साहित्य पर शोध भी हो रहे हैं। सेमिनार तो होते ही रहते हैं। हम चाहेंगे कि साहित्य अकादमी भी अपने संविधान में संशोधन करके अब प्रवासी हिन्दी साहित्यकारों के लिये भी पुरस्कार शुरू करे। वैसे प्रवासी साहित्य पर यदि हम लम्बी बातचीत करने लगेंगे तो एक पूरा इंटरव्यू केवल इस एक विषय पर ही करना होगा। कथा यूके भारत और ब्रिटेन के हिन्दी लेखन के लिये एक पुल का काम कर रही है। हमारा प्रयास है कि विदेशों में लिखे जा रहे साहित्य को बिना पढ़े दोयम दर्जे का ना मान लिया जाए।

सोनाली बोस - : प्रवासी साहित्य में भी नई पीढ़ी तो हिंदी में साहित्य रचना करती नहीं है? क्या आपकी जानकारी में ऐसा कोई साहित्यकार है जो हिंदी में काम कर रहा हो?

तेजेंद्र शर्मा -:प्रवासी साहित्य लेखन विशेष तौर पर अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन, युरोप, खाड़ी देश, ऑस्ट्रेलिया आदि में पहली पीढ़ी के प्रवासियों का ही लेखन है। यदि ध्यान से देखा जाए तो अधिकांश हिन्दी साहित्य का लेखन प्रवासियों ने ही किया है। चाहे वे भारत में गांव से उठ कर महानगरों में आए हों या फिर भारत से बाहर विदेश में रहने। मुंबई में भी ऐसे लेखक ढूंढने मुश्किल होंगे जिनका जन्म मुंबई में हुआ हो। वहां भी पहली पीढ़ी के प्रवासी ही साहित्य रचना कर रहे हैं। शायद इसीलिये नॉस्टेलजिया हिन्दी साहित्य का एक अहम हिस्सा है। आज़मगढ़, हिसार, सुल्तान पुर, भागलपुर, नांगल आदि से महानगर में आया कवि या लेखक अपने गांव को याद करता है तो अंतरराष्ट्रीय प्रवासी अपने शहर को याद करता है। एक बात और साफ़ कर दूं कि दूसरी पीढ़ी का व्यक्ति भला प्रवासी क्यों कहलाएगा। उसका तो जन्म ही दूसरे देश में हुआ है। वह तो ब्रिटिश, अमरीकी या डच कहलाएगा। यानि प्रवासी लेखन केवल पहली पीढ़ी का लेखन ही हो सकता है।

सोनाली बोस - : स्लमडॉग मिलिनेयर जो फिल्म है, जिसे इंटरनेशनल फेम मिली है। उपन्यास लेखन में आपका योगदान रहा है। उपन्यास लेखक विकास स्वरूप है, इसमें आपका किस तरह योगदान रहा है?

तेजेंद्र शर्मा -:कुछ लोग अच्छा लेखक होने के साथ साथ बेहतरीन इन्सान भी होते हैं। विकास उनमें से एक है। दरअसल जब उपन्यास ‘क्यू अण्ड ए’ के बारे में विकास ने सोचना शुरू किया था तो मुझ से बातचीत होती थी कि उपन्यास की रूपरेखा क्या बने। विकास मूलतः एक कैरियर डिप्लोमैट है मगर उसके भीतर के लेखक को मैं पहचान रहा था। जैसे जैसे उपन्यास आगे बढ़ रहा था हमारे डिस्कशन भी बढ़े। बस उसी बातचीत को विकास ने योगदान मान लिया। वर्ना आज तो विकास एक इन्टरनेशनल ब्राण्ड है।

सोनाली बोस - : इसके अतिरिक्त शांति सीरियल लेखन का भी आप हिस्सा रहे हैं! किसी पैनल के साथ लिखते थे या स्वतंत्र रूप से?

तेजेंद्र शर्मा -:शांति भारत का पहला डेल-सोप था जो कि सोमवार से शुक्रवार तक दिखाया जाता था। कहानी समीर की थी और तीन लेखक एपिसोड लिखा करते थे। जबकि कहानी की जानकारी सभी तीनों को दी जाती थी मगर एपिसोड की डिटेल्स उसे ही मिलती थीं जो कि लिखता था। मैं कोर्टसीन एक्सपर्ट जैसा माना जाता था। शांति लिखने के अनुभव ने मेरे लेखन में एक मूलचूक परिवर्तन पैदा किया – मैं अपनी कहानियों में भी संवाद का इस्तेमाल करने लगा। बहुत से बातें नैरेटिव के ज़रिये नहीं कही जा सकती है... संवाद उस समय बहुत काम आता है। संवाद के ज़रिये हम चरित्र की मानसिकता को आसानी से पाठक तक पहुंचा सकते हैं। फिर टीवी पर लिखने से एक फ़ायदा और भी होता है कि आप डेड-लाइन का अर्थ समझते हैं। वैसे एक ख़ास किस्म की पहचान भी बनती है।

सोनाली बोस - : चरित्रों के गढ़न के वक़्त आप किसे मद्देनज़र रखते हैं? आसपास के आम लोगों को या निजी अनुभव आपके चरित्रों को गढ़ते हैं?

तेजेंद्र शर्मा -:मेरे आसपास जो कुछ घटित होता है, वो कहीं न कहीं मेरे दिमाग़ को मथता रहता है। हर व्यक्ति का अलग बात करने का ढंग होता है। व्यक्ति की सोच, चाल, उठना बैठना सब मुझे अपनी ओर आकर्षित करता है। बहुत बार तो मैं किसी भी कहानी में अपनी पहचान के किसी व्यक्ति का इस्तेमाल कर लेता हूं। जैसे देह की कीमत कहानी के किसी भी किरदार से मैं निजी रूप से परिचित नहीं था। मगर मैनें सभी चरित्रों के लिये अपने आसपास के जीवन से चरित्र उठा कर कहानी में जोड़ लिये। कोशिश केवल यह रहती है कि हारे हुए के साथ खड़ा नज़र आऊं। मैं जीतने वाले के साथ आम तौर पर जश्न नहीं मना पाता। मेरा प्रयास होता है कि अपने चरित्रों की लड़ाई मैं स्वयं कहानी के पन्नों पर लड़ूं। उस समय मैं चाह कर भी अपने चरित्रों के साथ खिलवाड़ नहीं कर पाता। चरित्र अपनी भाषा, अपने एक्शन सब स्वयं ही तय करते हैं। एक बात याद रहे कि लेखन में प्रमाणिकता तो महत्वपूर्ण है वहीं यह भी ज़रूरी है कि लेखक किसी दूसरे के दर्द को अपना दर्द और दूसरे की मुस्कुराहट को अपनी हंसी समझ सके।

सोनाली बोस - : आपकी मातृभाषा पंजाबी है, अंग्रेज़ी आपकी रोजमर्रा में  शुमार है  ऐसे में क्या आपके लिखने की भाषा शुद्ध हिन्दी होती है?

तेजेंद्र शर्मा -:सच तो यह है सोनाली कि मैं हिन्दी पढ़ा लिखा बन्दा हूं नहीं। छठी, सातवी, आठवीं में हिन्दी पढ़ी थी। फिर विज्ञान का छात्र होने के कारण मुझे हिन्दी से मुक्ति मिल गई थी। बी.ए. ऑनर्स अंग्रेज़ी और एम.ए. अंग्रेज़ी में तो हिन्दी के लिये कोई स्थान ही नहीं होता। एअर इण्डिया की नौकरी और बाद में लन्दन में बसना – मेरे पास हिन्दी न पढ़ने और लिखने के एक हज़ार बहाने हो सकते थे। शुरूआती पढ़ाई गुरमुखी में... घर में पंजाबी का माहौल और बाहर अंग्रेज़ी। मुझे जैसी हिन्दी आती है, बस वैसी ही गंगा-जमुनी हिन्दी लिख देता हूं। पिता उर्दू लिपि में हिन्दी और पंजाबी लिखा करते थे। बाद में उन्होंने भी देवनागरी सीखी और लिखना शुरू किया। मुझे हिन्दी साहित्य के करीब लाने का काम मेरी दिवंगत पत्नी इन्दु ने किया था। अब मैं सपने भी हिन्दी में देखता हूं। मगर मैं डिक्शनरी से शब्द खोज कर सृजनात्मक लेखन नहीं करता।

सोनाली बोस - : आपकी इस बार की भारत यात्रा में  आपके हिंदी  कहानी संग्रह के बांग्ला भाषा में अनुवादित पुस्तक का लोकार्पण हुआ है, क्या आपको लगता है अनुवादित संस्करण मूल कहानी की आत्मा जस की तस रख पाते हैं?

तेजेंद्र शर्मा -:सोनाली इससे पहले मेरे अनूदित कहानी संग्रह अंग्रेज़ी, उर्दू, नेपाली एवं पंजाबी में आ चुके हैं। अनुवाद को लेकर मेरा मानना यह है कि यदि अनुवाद नहीं किया जाएगा तो कहानी केवल अपनी भाषा के पाठकों तक सीमित रह जाएगी। अनुवाद यदि कुछ और न भी करे तो कहानी का घटनाक्रम तो दूसरी भाषा के पाठकों तक पहुंचा ही सकता है। दुनियां की जितनी महत्वपूर्ण किताबें हैं वे सब अनुवाद के माध्यम से ही वैश्विक किताबें बन पाई हैं। क्या तुम्हें लगता है कि भारतीय पाठकों ने पूरा रूसी साहित्य या कार्ल मार्क्स की थियोरी मूल भाषा में पढ़ी है। ज़रूरी यह है कि अनुवादक जिस भाषा में अनुवाद कर रहा है यदि वह उसकी मातृभाषा है और जिस भाषा से अनुवाद कर रहा है उस भाषा पर उसकी पूरी पकड़ है तो अनुवाद बेहतर होगा ही। सूरज प्रकाश, ओमा शर्मा, सुभाष नीरव जैसे बहुत से अनुवादक हैं जिनके अनुवाद उनके अपने सृजनात्मक लेखन से कहीं अधिक लोकप्रिय हैं। मेरे अपने मामले में मुझे पंजाबी, नेपाली और अंग्रेज़ी पाठकों ने सकारात्मक प्रतिक्रियाएं दी हैं। प्रसित दास बांग्ला के प्रतिष्ठित अनुवादक हैं। उनका कहना है कि वे कहानियों का अनुवाद तभी करते हैं जब कहानियां उन्हें कहीं भीतर तक छू जाती हैं। इस तरह वे आत्मा को न केवल महसूस करते हैं बल्कि उसे अपनी भाषा में व्यक्त भी कर सकते हैं।

साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा  का साहित्यिक सफ़र – :
कहानी संग्रह : काला सागर, ढिबरी टाईट, देह की कीमत, यह क्या हो गया!, बेघर आँखें, सीधी रेखा की परतें, कब्र का मुनाफा, दीवार में रास्ता, मेरी प्रिय कथाएँ, प्रतिनिधि कहानियाँ
कविता संग्रह : ये घर तुम्हारा है, मैं कवि हूँ इस देश का...

संपादन :  समुद्र पार रचना संसार (21 प्रवासी लेखकों की कहानियों का संकलन), यहाँ से वहाँ तक (ब्रिटेन के कवियों का कविता संग्रह), ब्रिटेन में उर्दू कलम, समुद्र पार हिंदी गजल, प्रवासी संसार - कथा विशेषांक, सृजन संदर्भ पत्रिका (प्रवासी साहित्य विशेषांक), देशांतर (दिल्ली हिंदी अकादमी द्वारा प्रकाशित प्रवासी कहानी संग्रह)

सम्मान : डॉ. मोटुरी सत्यनारायण सम्मान (केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), प्रवासी भारतीय साहित्य भूषण सम्मान (यू.पी. हिंदी संस्थान), हरियाणा राज्य साहित्य अकादमी सम्मान, महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार, युवा साहित्यकार पुरस्कार (सहयोग फाउंडेशन), सुपथगा सम्मान, संकल्प साहित्य सम्मान, डॉ. हरिवंशराय बच्चन सम्मान (भारतीय उच्चायोग, लंदन), उर्वशी सम्मान (भोपाल, म.प्र),  हिन्दी कथा साहित्य में योगदान के लिये भारत के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री डॉ. महेश शर्मा द्वारा सम्मानित|

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sudesh bhardwaj, says on May 21, 2016, 10:43 PM

साहित्य कितनी भी विभिन्नता प्राप्त कर ले वो साहित्य के सर्वग्राहिता को ही उद्घाटित करता है..............

sudesh bhardwaj, says on May 21, 2016, 10:36 PM

साक्षात्कार बातचीत सरीखा लगा....ऐसा लगा जैसे सोनाली श्री तजेंद्र शर्मा जी से नहीं पाठकों से बात कर रही हैं और श्री तजेंद्र जी पाठकों की ओर से जवाब दे रहें हैं / वामपंथ ने पूरी एक लेखक जमात को बंधक और पिछ्लग्गू बना डाला है.....वामपंथी कहलाने वाले लेखक का अपना कोई स्वतन्त्र वजूद नहीं /

एस आर हरनोट, says on March 24, 2016, 10:08 AM

तेजन्‍द्र जी ने बेबाकी से अपनी बातें कही है, बहुत अच्‍छा साक्षात्‍कार है। बधाई।

pankaj jha, says on March 24, 2016, 12:47 AM

सुंदर.

Jagdish Dhantolr, says on March 23, 2016, 5:39 PM

Hindi ka prachar Jassoosi kitabon ne 60 ke Zamane me kiya aur Hindi Filmi geetone to poore sansar me dhoom machadi, Tejender dil se pramanik baat karte ho, Pratap sahgal saab ne sahi Likha hai. Good Luck.

प्रताप सहगल, says on March 23, 2016, 5:23 PM

अर्थपूर्ण साक्षात्कार।