Monday, October 21st, 2019
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साक्षात्कार- कल और आज : आकाशवाणी के पूर्व निदेशक बी एन बोस से इस विषय पर ख़ास बातचीत

zakir husseinसाक्षात्कार का प्रचलन या चलन कब से इंसानी ज़िंदगी में आम हुया इसका कोई पुख्ता सबूत अभी तक किसी के पास नहीं मिलता हैं पर मैंने पत्रकारिता को मुंशी प्रेम चंद के झोले से निकल कर बिल गेट्स की टैक्नोलोजी को अपनाते हुए देखा हैं ! साक्षात्कार एक कला हैं जिसने सदियों का सफ़र तय किया हैं इस सफर में अब तक न जाने कितने महान लोगो की महानता का बखान सरेआम किया हैं पर ज़माने के साथ साथ पत्रकारिता में साक्षात्कार ने भी अपनी भूमिका में बदलाव का चयन खुद ही किया हैं !ज़माने भर की सभी मशहूर हस्तियों को सोहरत की उचाईयों तक पहुचाने में साक्षात्कार और साक्षात्कार करने वालो का एक अहम् रोल रहा हैं ! ज़माने भरकी  मशहूर हस्तियों के साक्षात्कार करने वालो की तरफ किसी का ध्यान बहुत ज़्यादा नहीं जाता ये एक बिडम्बना भी हो सकती हैं ! बहुत दिनों से मेरे ज़हन ये सवाल हमेशा मुह उठाये खडा रहता की साक्षात्कार करने वालो का साक्षात्कार कोई क्यूँ नहीं करता ! खबरिया चैनल में बैठकर राय लेना देना एक अलग बात हैं पर साक्षात्कार कोई क्यूँ नहीं करता ये सवाल फिर भी वहीँ खडा नज़र आया ! इस देश में बहुत सारी ऐसी मशहूर हस्तिया अभी भी मौजूद हैं जिन्होंने साक्षात्कार कोई एक नए आयाम तक पहुचाने में अपनी अहम् भूमिका अदा की !
साक्षात्कार करने वालो की बहुत सारी यादे उस सभी साक्षात्कारो जुडी होती हैं ! मैंने सोचा क्यूँ न किसी महान हस्ती से इस मुद्दे पर ही चर्चा की जाए ! उनकी यादे दुनिया जहान के साथ सांझी की जाए  ! B.N.Bose, former Station Director- IBPS(Retd)इन सभी सवालों के जबाब में मुझे मेरी खोज  इंदौर आकाशवाणी के पूर्व केंद्र निदेशक श्री बी एन बोस के घर तक ले गयी .बहुत सारे सवालों के साथ में उनके दरवाजे पर खडा हो गया !
श्री बी एन बोस  इन्दौर शहर की एक ऐसी जानी मानी शख्सियत हैं जो अपनी गंभीर और बेहद आकर्षक आवाज़ के बदौलत कई सालों से इंदौर और मध्य प्रदेश के शहरों में श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करते आ रहे हैं| आज प्रायवेट FM’s, News channels का ज़माना है लेकिन आज से दस वर्ष पहले तक विविध भारती और AIR के लोकल चैनल्स ही देश की जनता की पहली पसंद हुआ करते थे| आकाशवाणी से साल 2001 में केन्द्र निदेशक( Station Director) के पद से रिटायर्ड हुए श्री बी एन बोस ने साल 1964 में रेग्युलर एनाउंसर के रूप में रायपुर आकाशवाणी में काम करना शुरू किया| अपने कार्यकाल के दौरान ‘शामे ग़ज़ल’, लोकल नाटकों, अलग अलग तरह के साक्षात्कारों के ज़रिये और मंच पर अपने ओजस्वी संचालन  की बदौलत श्री बी एन बोस ने इंदौर और आस पास के जिलों में अपने कई मुरीद बना लिए हैं, लेकिन उनकी यादों में ऐसे कई लम्हे आज भी ताज़ा हैं जिन्होंने उनकी नौकरी के दौरान उन्हें खासा प्रभावित किया है|उनमें से हैं प्रख्यात गायक और संगीतकार हेमंत कुमार मुखर्जी , ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह और मखमली आवाज़ के धनी तलत महमूद से उनकी मुलाकातें | उनकी इन सभी शख्सियतों से मुलाकातों और उनसे जुडी यादों को सभी के साथ साझा करेंगे|ज़ाकिर हुसैन: बोस साहब सबसे पहले ये बताईये कि आपकी साहित्य और संगीत में इतनी गहरी रुची की कोइ ख़ास वजह ?B.N.Bose, former Station Director-बी एन बोस:  जी, साहित्य और संगीत में रूची बचपन से ही थी और इसकी वजह थे मेरे बड़े भाई साहब जिनसे मैं सारी ज़िंदगी बेहद मुत्तासिर रहा| सारी उम्र वे नाटक और अभिनय से जुड़े रहे, और उनकी वजह से मेरा रुझान भी कला के इस क्षेत्र में हुआ| ज़ाकिर हुसैन: क्या आपके परिवार का सहयोग मिला आपको? और आपका नाटकों और गानों में इतनी रूची देख कर उनका रूख कैसा रहा? बी एन बोस: पेरेंट्स का सिर्फ मोरेल सपोर्ट रहा| ट्यूशन पढ़ा पढ़ा के मैंने अपनी पढाई जारी रखी| मैथ्स और अंग्रेज़ी विषय में अच्छा ज्ञान और पकड़ होने की वजह से नौकरी मिलने कोइ परेशानी नहीं हुई| और मैंने अंग्रेज़ी, और इतिहास में एम ए की डिग्री हासिल की| एल एल बी और जर्नलिज्म में स्नातक की डिग्री भी इसी क्रम में बाद के वर्षों में हासिल की| पहले रायपुर शहर में टीचरी की और बाद में अपनी प्रतिभा और आवाज़ के ज़रिये उस ज़माने की इकलौती मनोरंजन सेवा आकाशवाणी में एक उदघोषक के पद में अपनी सेवाएं देनी आरंभ की| सन 1964 में रेग्युलर एनाउंसर के रूप में मैंने रायपुर आकाशवाणी में काम करना शुरू किया| ज़ाकिर हुसैन:आपका इंदौर कब और कैसे आना हुआ? बी एन बोस: साल 1971 में इंदौर आकाशवाणी में ट्रांसमिशन अधिकारी के पद पर मेरा तबादला हुआ| तब रायपुर जैसे छोटे शहर से अपने प्रदेश के एक बड़े शहर में आने का रोमांच कुछ ख़ास था और माता पिता, पत्नी और दो बच्चों की ज़िम्मेदारी भी थी| साथ ही दो बहनों और भाईयों की देखभाल भी मेरे ही सुपर्द थी| ज़ाकिर हुसैन:इंदौर आकाशवाणी में काम करने के दौरान ऐसी कोइ यादगार मुलाक़ात क्या आपको याद है जिसे आप आज भी जीते हैं? बी एन बोस: 1970 के दशक में  हेमंत कुमार, तलत महमूद, और 1980 के दशक के दौरान जगजीत सिंह से जुडी मुलाकातें मेरे ज़हन में आज भी ताज़ा हैं| इनमें से हेमंत कुमार से हुई मेरी मुलाक़ात मैं कभी भी नहीं भूल सकता हूँ| हेमंत कुमार को बचपन से सुनते हुए मैं  भी उन्हीं के गाने गाता था, सभी कहते थे की मेरी आवाज़ उनसे मिलती जुलती है| लेकिन एक बात और है, बहुत कम लोगों को मालूम है की गैर फिल्मी गीतों को बंगाल में पोपुलर करने में पंकज मालिक, जगमोहन मित्रा और हेमन्त कुमार मुखर्जी का हाथ सबसे ज़्यादा हैं| उनके गाये गाने मैं दुर्गा पूजा के दौरान स्टेज पर गाता था| ज़ाकिर हुसैन: तो जब आप हेमंत कुमार जी से पहली बार मिले तो आपका अनुभव कैसा रहा? बी एन बोस: हेमंत दा से जब पहली बार मिला तब लगा की जैसे सपना पूरा हुआ| 1971 में मेरा इंदौर आकाशवाणी में तबादला हुआ था | तब इंदौर की एक सांस्क्रतिक संस्था ने हेमंत कुमार को पहली बार इंदौर इन्वाईट किया| मुझे याद है ये कार्यक्रम तब रवीन्द्र नाट्य गृह में हुआ था| तब तक आकाशवाणी में कार्यक्रम कर कर के मेरी आवाज़ इंदौर वासियों में काफी लोकप्रिय हो चुकी थी| मेरी आवाज़ की लोकप्रियता के कारण लोगों ने मुझे इस प्रोग्रेम की कन्पीयरिंग के लिए बुलाया था| संचालन के पहले उनसे मुलाक़ात भी हुई| काफी उदात्त और विशाल, धीर गंभीर व्यक्तित्व के मालिक हेमन्त दा के पैर छु कर लगा की जैसे मैंने अपने ईश्वर से मुलाक़ात कर ली है| बहुत देर तक टकटकी लगा कर उन्हें देखता ही रहा| तब उनहोंने बांग्ला में कहा ‘बोशून’ यानी कि बैठिये …. तब मैंने कहा की ”बौशो याने कि बैठो कहिये, आप मेरे पिता तुल्य हैं| फिर मैंने उनसे पूछा आप गैर फ़िल्मी गाने गायेंगे की फ़िल्मी ही गायेंगे?तो वे बोले मैं तो गैर फ़िल्मी गाना चाहता हूँ|  लेकिन तब तक उनकी ‘नागिन’, ’जाल’, पतिता आदी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय हो चुकी थीं | इसीलिये लोगों का ज़्यादा जोर फ़िल्मी गानों के लिए ही था| तब उन्होने कहा की जब आप संचालन कर रहे हो तो आप ही जमा लेना| मैंने निवेदन किया की रविन्द्र संगीत और बंगला गाने या आधुनिक गान  भी गाईये तो वो बेहद आत्मीयता से मान गए| ज़ाकिर हुसैन: इसका मतलब आपकी हेमंत जी से मुलाक़ात एक बाहरी कार्यक्रम में पहले हुई? फिर क्या उन्हें आकाशवाणी में इंटरव्यू के लिए नहीं बुलाया? बी एन बोस: नहीं नहीं, उस प्रोग्रेम में मुलाक़ात होने के बाद मुझे आदेश हुआ की आकाशवाणी की तरफ से भी उनका एक इंटरव्यू  होना चाहिए| तब वे इंदौर के ‘सुहाग’ होटल में ठहरे हुए थे| मैंने उनसे अगले दिन सुबह दस बजे मिलने  का वक़्त मुकर्रर किया| जब मैं उनसे मिलने पहुंचा तो उनको देख कर और उनकी आवाज़ की पाकीज़गी देख कर ऐसा लगा रहा था की जैसे कोइ तपस्वी तप कर रहा हो.. मंदिर में पुजारी मंत्रजाप कर रहा हो| फिर हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ | मैंने पूछा कि आपका हिन्दी और बँगला में इतना  अच्छा दखल कैसे है? तो उन्होंने बताया की ”बिहार के भागलपुर में जन्म होने के कारण मेरी हिन्दी इतने अच्छी है| कलकत्ता में आने के बाद मैने बंगला में गाने गाये| शायर फ़याज़ हाशामी के गैर फ़िल्मी गाने ज़्यादा गाये हैं| सचिन देव बर्मन कीफिल्म ‘जाल’ में पहला लोकप्रिय गाना था’ये रात ये चांदनी’ जो काफी लोकप्रिय हुआ”| ये सब सुनाते हुए वे काफी भावुक हो गए थे| वो इंजीनियरिंग की पढाई कर रहे थे लेकिन वो सब छोड़ कर हेमंत कुमार संगीत क्षेत्र में जुड़ गए| फिर उन्होंने मुझसे पूछा की आप इतनी अच्छी बंगला, हिन्दी ,अंग्रेज़ी और उर्दू कैसे जानते हो?तब मैंने बताया की मेरा भी रुझान बचपन से इसी तरफ था| मैं भी  इंजीयरिंग करते करते इस क्षेत्र से जुड़ गया| पढाई लिखाई करते हुए मै हमेशा हिन्दी अंग्रेज़ी और उर्दू पढता रहा| जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, तलत महमूद इन सब से मैं बहुत प्रभावित हुआ|लेकिन सबसे ज़्यादा प्रभावित मुझे हेमन्त कुमार ने ही किया| वे बेहद मितभाषी और मृदु भाषी थे| इतने सारे अवोर्ड और फिल्मफेयर जितने के बावजूद उनमें बिलकुल भी घमंड नहीं था| ज़ाकिर हुसैन: आपकी मखमली और थरथराती हुई आवाज़ के मालिक तलत महमूद से मुलाक़ात कैसी रही? बी एन बोस: तलत महमूद लखनऊ से कलकत्ता आये थे| जैसे हेमंत कुमार के शायर फैयाज्ज़ हाशमी थे तलत महमूद के भी वही थे| बंगाल में उन्होंने तपन कुमार के नाम से बहुत सारे बंगाली गाने गाये| ‘तस्वीर तेरी दिल मेरा’ उनका बेहद पोपुलर गैर फिलमी गाना है| अनिल विश्वास के साथ मिलकर उन्होंने काफी बेहतरीन गाने गाये| अनिल जी के मुताबिक उनकी आवाज़ की थरथराहट ही उनकी सबसे बड़ी खासियत थी| इंदौर में एक महिला संस्था ने उन्हें सबसे पहली बार इंदौर बुलाया था| उस वक़्त मैं आकाशवाणी में ‘कार्यक्रम अधिकारी’ बन गया था| लेकिन मैंने माइक का साथ  कभी नहीं छोड़ा था| वो तलत जी की पहली इंदौर यात्रा थी| उनके कार्यक्रम का भी संचालन मैंने ही किया| मुझे याद है उस कार्यक्रम में उनके बेटे हमीद ने भी गाने गाये थे| तलत जी ग़ज़लों के बादशाह थे| इनसे भी मैंने बंगला में बात की| लगभग पौन घंटे बात चीत हुई|पंकज मालिक, रायचंद बोराल, ने तलत जी को कलकत्ते में गवाया| अनील विशवास ने मुंबई में उन्हें लोकप्रिय किया| ज़ाकिर हुसैन:  अब बात करते हैं जगजीत सिंह और चित्रा सिंह जी की| इनसे अपनी मुलाक़ात के बारे में बताईये? क्या आप जगजीत जी से स्टूडेंट रूप में भी मिले थे? बी एन बोस: अरे हाँ… क्या बात याद दिला दी है आपने… | 1960 के दशक की शुरुआत में युवा महोत्सव का आयोजन दिल्ली में हुआ था| मैं तब रायपुर में पढ़ रहा था जो की उस वक़्त सागर विश्वविद्यालय के अंतर्गत आता था| तब सागर विश्वविद्यालय की तरफ से मैं नाटक ले कर गया था और जालंधर विश्वविद्यालय से जगजीत सिंह अपनी गायकों की टोली के साथ आये थे, वहीं हमारी पहली मुलाक़ात हुई| फिर जब लगभग दस पंद्रह सालों के बाद अपने ‘शामे ग़ज़ल’ प्रोग्रेम पेश करने के दौरान मैं उनकी बहुत सारी ग़ज़लें बजाता था| तब एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए वे इंदौर आये थे|उनकी पत्नी चित्रा सिंह और उनके साथ मैं सुहाग होटल में मिला| चित्रा सिंह ने मुझसे बंगला में बात की , उनका असली नाम चित्रा शोम था, उन्होंने बताया की उनकी दादी विभाजन के पूर्व  के बंगाल में  रेडियो B.N.Bose,में गाती थी| उनकी पहली शादी दत्ता से हुई थी लेकिन पति की मौत के बाद चित्रा सिंह ने जगजीत सिंह से दूसरी शादी की| बंगला में भी गाना गाया| जगजीत सिंह पर पंजाब के सूफी गायकों  का बहुत प्रभाव है| जगजीत सिंह की उर्दू बेमिसाल है और उनका तलफ्फूज़ भी काबिले तारीफ़ है लेकिन चित्रा सिंह उर्दू लफ़्ज़ों को बोलते वक़्त काफी असहज रहती हैं | यही बात मैंने उनसे पूछी भी थी| तब चित्रा जी ने कहा था कि सिर्फ उर्दू में अपनी असहजता की वजह से ही वो मंच पर गाते समय इतनी कौन्श्यास रहती हैं| उनके साथ की मेरी इस तस्वीर के पीछे की भी के बड़ी विचित्र कहानी है… जगजीत सिंह और चित्रा सिंह अपनी वापसी की फ्लाईट पकड़ने के लिए लेट हो रहे थे और फोटोग्राफर आ ही नहीं रहा था| फिर जैसे ही वो दोनों सीढियां उतर कर एयरपोर्ट जाने के लिए निकलने लगे तभी वो आया और लगभग भागते हुए ही ये तस्वीर खींची गयी थी|
------------------इसके बाद बोस साहब ने  एक लम्बी सी सांस ली शायद अपने माजी के सभी झरोखो को बंद करने की कवायत अब शुरू कर दी थी ! साक्षात्कार एक कप चाय की प्याली के बाद खाना खाने की बारी थी !  बोस साहब से साक्षात्कार करने वाद मैं जब दिल्ली की तरफ कूंच कर रहा था एक बात मेरे दीमाग में अब भी घर कियें हुयी थी की इस दुनिया ने भले ही कितनी भी तरक्की क्यूँ कर ली हो पर यादों के खजाने तक अभी कोई भी टैक्नोलोजी  नहीं पहुच पायी हैं !
अगले हफ्ते कुछ और किसी और के यादो के खजाने से ,कुछ यादे लाने की कवायत होगी  !
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नीरज चौधरी, says on June 7, 2014, 2:41 PM

उम्दा, बेहतरीन, शानदार, लाज़बाव......न जाने कितने की तारीफ वाले शब्द लिखने का मन कर रहा है.....जितना शुरूआती शब्द धांसू है....उतना ही अंत । अगर ये साक्षात्कार कितना भी बड़ा होता..फिर भी मैं पढ़ता ही जाता...।

राजेश उपाध्याय, says on June 4, 2014, 12:01 PM

मैंने पत्रकारिता को मुंशी प्रेम चंद के झोले से निकल कर बिल गेट्स की टैक्नोलोजी को अपनाते हुए देखा हैं ! साक्षात्कार एक कला हैं जिसने सदियों का सफ़र तय किया हैं इस सफर में अब तक न जाने कितने महान लोगो की महानता का बखान सरेआम किया हैं ....जाकिर साहब आपने क्या शानदार इंट्रो लिखा हैं रविश के बाद आपका इंट्रो पढ़कर बहुत अच्छा लगा

सुरेन्द्र अग्निहोत्री, says on June 4, 2014, 11:49 AM

इसमें कोई दो राय नहीं हैं हम सबसे ज़्यादा खबरे प्रसारित करते हैं ,देश शायद इकलोता न्यूज़ एंड व्यूज़ पोर्टल हैं जो सबसे ज़्यादा ब्यूरो / रिपोर्टर / के साथ खबरों की दुनिया में छ साल से पूरी तरहा सक्रीय हैं! जाकिर साहब एक शानदार शुरुआत की हैं आपने ! ये एक कुछ कमी सी थी !