Close X
Saturday, October 31st, 2020

सर्वोच्च न्यायालय में हिन्दी सम्बन्धी राष्ट्रपति के आदेशों का संविधान के अनुच्छेद 348 के साथ उल्लेख किया जाये

आई एन वी सी न्यूज़ नई दिल्ली, अखिल भारतीय अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच और अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री चन्द्र प्रकाश कौशिक की अध्यक्षता में हिन्दू महासभा भवन में हूई बैठक में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हिन्दी में दायर याचिका का अंग्रेजी अनुवाद मांगना और अनुच्छेद 348 का गलत हवाला देकर सर्वोच्च न्यायालय की भाषा अंग्रेजी बताकर संसदीय राजभाषा समिति की सिफारिश को ठुकराना और महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 के आदेशो की अवज्ञा बताते हुए कानून मंत्रालय से मांग की कि महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 के आदेशों का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 348 के नीचे कराया जाये। इस सम्बन्ध में महामहिम राष्ट्रपति जी, कानून मंत्री,संसदीय राजभाषा समिति, राज भाषा विभाग, सचिव न्याय विभाग सहित सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी ज्ञापन दिया गया। बैठक में अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच के महामंत्री श्री मुकेश जैन ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री द्वारा महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 के आदेशों को ठुकरा कर हिन्दी में दायर याचिकाओं को स्वीकार नहीं किया जा रहा है और न ही आज तक कोई भी आदेश हिन्दी में दिया गया। साथ ही साथ सर्वोच्च न्यायालय का सारा प्रशासनिक कार्य केवल और केवल अंग्रेजी में हो रहा है। निश्चय ही यह संसद और लोकतन्त्र के लिये सर्वोच्च न्यायालय का एक बगावती रूख है जिसे लोकतन्त्र की रक्षा के लिये जल्द से जल्द कुचलना बेहद जरूरी है। श्री जैन ने बताया कि दिनांक 4-2-19 को सर्वोच्च न्यायालय में डायरी संख्या 30647@2017 के तहत दायर एक अन्तरवर्ती आवेदन दायर किया गया। जिसमें हमने सर्वोच्च न्यायालय नियम 2013 के आर्डर 8-2 के तहत हमारे द्वारा दायर याचिकाओं का अंग्रेजी अनुवाद कराने की सर्वोच्च न्यायालय से मांग की है किन्तु सर्वोच्च न्यायालय के डिप्टी रजिस्ट्रार श्री आचार्य ने इस सम्बन्ध में हमें टका सा जवाब दया कि हम अंग्रेजी अनुवादक नियुक्त नहीं करेंगे। इसी तरह का टका सा जवाब हमें अपनी सूचना के अधिकार के तहत हिन्दी में मांगी गयी जानकारी अंग्रेजी में मुहैय्या कराने वाले अधिकारी श्री अजय अग्रवाल ने दिया था। बैठक में अखिल भारतीय अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री चन्द्र प्रकाश कौशिक ने बताया कि महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 के आदेशों का उल्लेख हमारी संविधान के अनुच्छेद 348 के अन्तर्गत नहीं किया गया। जैसे संविधान के अनुच्छेद 124-1 में 7 न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है जिसे बढ़ाकर 31 करने का उल्लेख संविधान में किया गया है। ऐसे ही महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 के आदेशों का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 348 के नीचे करना अब जरूरी है। जिसके बिना सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री मे बैठे बेईमान अधिकारियों को महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 क आदेशों की अवज्ञा करने का बहाना मिल रहा है। बैठक में श्री कौशिक ने बताया सबसे बड़ी बात यह है कि राजभाषा विभाग को सर्वोच्च न्यायालय में राजभाषा नियमों की लगातार अवज्ञा किये जाने की बार-बार जानकारी दिये जाने के बाद भी आज तक इन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के राजभाषा हिन्दी विरोधी रजिस्ट्रार कार्यालय के अधिकारियों के खिलाफ कठोरतम अनुशासनात्मक प्रशासनिक कार्यवाही करने के लिये मुख्य न्यायाधीश साहब को नहीं लिखा है। जो कि राजभाषा नियमों के तहत जरूरी है। श्री कौशिक ने चिन्ता जाहिर की कि दिल्ली पुलिस जो किसी भी राजभाषा नियम को नहीं मान रही है जिसकी वर्दी के बिल्ले, नाम पट्टिका और रबड़ की मोहरे राजभाषा नियमों का उल्लंघन करके अंग्रेजी में बनाये जा रहे है। वह किसी पुरानs अंग्रेजी राज के सड़े गले मोटर वेहिकल एक्ट का हवाला देकर हिन्दी में लिखी गाड़ियों की नम्बर प्लेट का चालान कर रही है। अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी मंच की बैठक में महामहिम राष्ट्रपति जी के 24-11-98 के आदेशों की जानकारी संविधान के अनुच्छेद 348 के तहत संविधान में करने की मांग की गयी। और दिल्ली मोटर वेहिकल एक्ट में भी संशोधन करने की मांग की।



Comments

CAPTCHA code

Users Comment