Wednesday, July 8th, 2020

सरिता शर्मा की कवितायें

मैं नदी हूँ मैं तुम्हारे पास आऊंगी तुम समन्दर हो तुम्हे क्योंकर बुलाऊंगी मैं तटों के बीच बहती आ रही कल-कल नाम लेती है तुम्हारा हर लहर चंचल तुम ह्रदय के द्वार अपने खोलकर रखना मैं सुकोमल भावना सी आ समाऊँगी मैं नदी हूँ मैं तुम्हारे पास आऊंगी ! --------------------------------------- __________2 ______________

कट गया लो एक टूटा और बिखरा दिन बढ़ गया फिर दर्द का कुछ ऋण ! फिर समन्दर का अहम आहत हुआ दर्द से दुहरी हुई नदिया होठ भींचे स्वर दबे हैं कंठ में भीगता है बे-जुबाँ तकिया देह पत्थर हो गई है फिर अहिल्या की ठोकरों के चिन्ह हैं अनगिन !! बढ़ गया फिर दर्द का कुछ ऋण ! जिस नजर में चाँद रहता था कभी अब उसे बस दाग दिखता है क्यों विधाता फूल की तकदीर में ओस लिखकर आग लिखता है चांदनी का दूधिया रंग हो गया नीला डस गयी संदेह की नागिन !! बढ़ गया फिर दर्द का कुछ ऋण! ******** Sarita Sharmaसरिता शर्मा निवास दिल्ली

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