सपने दिखाकर तूने क्या-क्या किया

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– घनश्याम भारतीय –

 Narendra-Modi“रात दिया बुझा के पिया क्या-क्या किया” भोजपुरी एलबम का यह गीत आजकल चटखारे लेकर खूब सुना जा रहा है । सोच के अनुरूप ही इस गीत का भावार्थ भी निकाला जा रहा है । गीत का एक अर्थ जहां सिर्फ मनोरंजन तक सीमित है वहीं दूसरा अर्थ सियासत की उस स्याह सोच की ओर इशारा करता है जिसमें पहले हरे-भरे सुहाने सपने दिखा कर जनता को भरमाया गया और बाद में नियम कानून में बदलाव के बहाने उसका सुख चैन छीन लिया गया।

सच मायने में आज नेता और मदारी में फर्क ही नहीं बचा है । आज सियासत वही कर रही है जो एक मदारी सदियों से करता आया है। गांव के बाहर जब किसी मदारी का डमरु बजता है तो बूढ़े बच्चे युवा सभी खिंचे चले आते हैं । भीड़ जब बढ़ जाती है तो कुछ देर उसका मनोरंजन करने के बाद मदारी डरा-धमकाकर सबकी जेबें झाड़ लेता है । फिर पेट दिखाकर बचा खुचा नोच कर चलता बनता है। हमारी सियासत भी तो यही कर रही है । पहले अच्छे दिन के सपने दिखाए फिर विश्वास को छलनी कर दिया। अब जनता उसी गीत की तर्ज पर सवाल कर रही है हमें सपने दिखाकर तूने क्या क्या किया।

चुनाव से पूर्व हमारी सियासत ने देश भर में घूम-घूम कर कहा कि विदेशी बैंकों में इतना काला धन छिपा कर रखा गया है कि यदि उसे वापस भारत ला दिया जाए तो सचमुच अपने देश से गरीबी के कोढ़ का सफाया हो जाएगा और अच्छे दिन आ जाएंगे । बस यही वह सपना था जिसे देख कर भोली भाली जनता अच्छे दिन की कल्पना में डूब गई। वह सपना फिलहाल पूर्ण होते नहीं दिख रहा है । ऐसे में अब ठगा महसूस कर रही जनता ने जिसकी उम्मीद की थी वह मिला नहीं बल्कि उसके पास जो था वह भी एक-एक करके चला जा रहा है ।
अच्छे दिन के नाम पर पहले गरीबों को निशुल्क रसोई गैस कनेक्शन बांटे गए। फिर रसोई गैस का दाम बढ़ा दिया गया । हो हल्ला न हो इसके लिए बढ़ी हुई धनराशि उपभोक्ताओं के खाते में वापस करने का बहाना ढूंढा गया। कुछ लोगों के खाते में इसकी धनराशि पहुंची भी जबकि तमाम लोग सिर्फ इंतजार ही करते रहे।

मुझे लगता है कि दाम बढ़ाने और बढ़ी हुई धनराशि दूसरे रूप में वापस करने से पीछे हमारी सियासत का मुख्य उद्देश्य सिर्फ लोगों को महंगे दाम पर खरीददारी करने की आदत डालना था। जब धीरे-धीरे आदत पड़ गई तो सब्सिडी की धनराशि स्वेच्छा से छोड़ने की अपील भी कर दी गई। इसी तरह अब वरिष्ठ नागरिकों को रेल यात्रा में मिलने वाली सुविधाएं भी प्रेमपूर्वक वापस लेने की तैयारी चल रही है। क्या यही अच्छे दिन हैं ? क्या इसीलिए सुहाने सपने दिखाए गए थे ?

संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुसार भारतीय मुद्रा के प्रारूप में समय समय पर परिवर्तन होते रहे हैं परंतु इस बार मुद्रा प्रारूप परिवर्तन ने समूचे देश को रुला दिया।  जिन लोगों ने पूर्वर्ती सरकार के नोटबंदी के प्रयास के विरोध में धरती आसमान एक कर दिया था उन्होंने ही सत्ता में आने के बाद 8 नवंबर 2016 की रात अचानक नोटबंदी का ऐलान कर दिया। फिर देश में जो परिस्थितियां खड़ी हुई उससे सभी परिचित हैं । क्या यही अच्छे दिन हैं ? ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि विदेशी बैंकों में छुपाकर रखे गए काले धन से देश की काया पलटने का सपना दिखाकर सत्ता में पहुंचे लोग जब वादा पूरा न कर सके तो आम जनता के घरों में रखे धन को ही काला धन बताकर बाहर निकलवा दिया। यह छलपूर्वक चली गई दोगली चाल ही तो है । आज हमारी सियासत हमें पुचकार कर चिकोटी काट रही है ।क्या यही अच्छे दिन हैं ?

गांव से दूर रहने वाले मदिरालयों को अब आबादी के बीच खोलकर गांव की जनता को शराबी बनाने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है । यह भी एक बड़ा षड्यंत्र है । नोटबंदी जैसा साहस दिखाने वालों के पैर शराबबंदी के नाम पर कांप रहे हैं । और तो और गांव में मदिरालय का विरोध करने वालों की पीठ पर लाठियां बरसा कर उन्हें हवालात के रास्ते भी दिखाए गए।

वास्तव में सत्ता पाने के बाद किस तरह भाव भाषा और सोच में बदलाव आ जाता है यह बीते कुछ वर्षों से देखने को मिल रहा है । यह बात अलग है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत मजबूत हुआ है परंतु स्थानीय स्तर पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसकी जनता को उम्मीद थी । चाहे वह कश्मीर में आतंकी गतिविधियों पर नियंत्रण करने के साथ साथ वहां अमन चैन कायम करने का वादा हो अथवा भारत के विभिन्न प्रांतों में कानून का राज स्थापित कर भयमुक्त समाज बनाने का । किसी भी मामले में जनता को संतुष्टि नहीं मिल सकी। कहीं सहारनपुर जल रहा है तो कहीं रायबरेली धधक रहा है। कहीं बहू बेटियों की आबरू सरेराह लूटी जा रही है तो कहीं सामंती ताकतें अपना जहरीला फन उठा रही है । इन सबके बीच हमारी सरकार राम रोटी और इंसाफ को भूलकर गौरक्षा,बूचड़खाना और जीएसटी गा रही है । तीन तलाक का मुद्दा लगभग दफन हो गया है । इसी के साथ अब वह महिलाएं भी गायब हो गई हैं जो इससे छुटकारा चाहती थी । अब उनके पतियों ने या तो पीना छोड़ दिया है अथवा पीकर तलाक कहना छोड़ दिया है ।

कुल मिलाकर हमारी सियासत ने हमें जो सपना दिखाया था हम उसी में डूबते-उतराते रहे और कुछ लोगों के अच्छे दिन आ गए। शीश महल का ख्वाब देखने वालों की जब नींद टूट रही है तो वह खुद को शहर की अंधी गली में पाकर हैरानी महसूस कर रहे हैं । इससे बड़ा दुर्भाग्य देश की जनता का और क्या हो सकता है ।

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ghanshyam-bhartपरिचय -:

घनश्याम भारतीय

राजीव गांधी एक्सीलेंस एवार्ड प्राप्त पत्रकार

संपर्क – :
ग्राम व पोस्ट – दुलहूपुर ,जनपद-अम्बेडकरनगर 224139

मो -: 9450489946 – ई-मेल- :  ghanshyamreporter@gmail.com

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