Tuesday, October 15th, 2019
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सनातन धर्म ही राष्ट्रीय अस्मिता : राज्यपाल

आई एन वी सी न्यूज़ भोपाल , राज्यपाल श्री ओमप्रकाश कोहली ने कहा है कि सनातन धर्म ही राष्ट्रीय अस्मिता है। यह सार्वभौमिक और शाश्वत होती है। इसे आधुनिक संदर्भों में परिभाषित और अभिव्यक्त करना होगा। वे आज यहाँ 'राष्ट्र सर्वोपरि' विचारकों और कर्मशीलों के तीन दिवसीय ‘लोक मंथन’ कार्यक्रम के शुभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम संस्कृति विभाग, भारत भवन और प्रज्ञा प्रवाह द्वारा आयोजित किया गया। श्री कोहली ने कहा कि उपनिवेशवादी मानसिकता आज बाजार, उत्पादों, जीवन-शैली और भूमंडलीकरण के रूप में उपस्थित है। इससे निपटने के लिये स्वदेशी आंदोलन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि यदि राष्ट्रीय अस्मिता मजबूत है, तो औपनिवेशवादी मानसिकता का कोई भी प्रकार या स्वरूप नुकसान नहीं पहुँचा सकता। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय अस्मिता और सनातन धर्म शाश्वत होने के बावजूद धूमिल पड़ सकते हैं। इसे समय-समय पर साफ करने की जरूरत है। श्री कोहली ने कहा कि भारत में मुगलों के आक्रमण के बाद भी भारत के लोक ने राष्ट्रीय अस्मिता को बिखरने नहीं दिया लेकिन अंग्रेजी शासन ने इस पर गहरा आधात किया। भक्ति आंदोलन ने भारत की सांस्कृतिक पहचान को बनाये रखा। उन्होंने कहा कि मुगल शासन के बावजूद हिज्री संवत स्वीकार नहीं किया। आज राष्ट्रीय अस्मिता के संरक्षण की जरूरत है। इसे जन-मानस के आचार-विचार में अभिव्यक्त होना चाहिये। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह श्री सुरेश सोनी ने अपने बीज वक्तव्य 'राष्ट्र की लोकाभिव्यक्ति'' में कहा कि भारत की अस्मिता को दैनंदिन कार्यों और हर विषय में अभिव्यक्त होना चाहिये। उन्होंने कहा कि एक से अनेक होने और फिर अनेक से एक बने रहने की मूल भावना और दर्शन भारतीय जीवन में अभिव्यक्त हुआ है। इसी से औपनिवेशिक दुष्परिणाम से मुक्ति मिलेगी। उन्होंने राष्ट्र और नेशन के अंतर को समझाते हुए बताया कि भारत ने एक राष्ट्र के रूप में दूसरों को ज्ञान और कौशल देकर समृद्ध किया। आज भारतीय अस्मिता के माध्यम से बदलाव की प्रक्रिया का उपकरण अपनाने की जरूरत है। भारत एक है और अखंड है क्योंकि यहाँ की अस्मिताओं में समन्वय रहा है। जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर स्वामी श्री अवधेशानंद गिरि ने कहा कि विज्ञान ने नींद छीन ली ओर मानसिक चेतना कुंद हुई है। शास्त्रों में कहा गया है कि मन की चिंता करो। भारतीय ऋषियों ने मन की चिंता की, पदार्थ की नहीं। पश्चिम के लिये विश्व एक बाजार है जबकि भारतीय दर्शन और धार्मिक परंपराओं में विश्व को परिवार माना गया है। उन्होंने कहा कि भोग की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं। भंडारण और संचय की प्रवृत्ति उचित नहीं है। उन्होंने आर्थिक क्षेत्र में लिये गये हाल के निर्णय के संदर्भ में कहा कि इससे संग्रह की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी। यह निर्णय भारत में बड़ा परिवर्तन लाने वाला है। देश का बड़ा रूपांतरण होगा। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का नागरिक होने के नाते यह भी याद रखने की जरूरत है कि समाज का भी ऋण है, इसे चुकाना होगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है लेकिन कर्त्तव्यों के प्रति उदासीनता भी बढ़ी है। उन्होंने कहा कि लोक-मानस को पवित्र रखने का संकल्प लेना होगा। अच्छा और बड़ा दिखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अच्छा और बड़ा बनने पर ज्यादा ध्यान देना भी जरूरी है। मुख्यमंत्री श्री चौहान द्वारा बनाये गये आनंद मंत्रालय के संदर्भ में उन्होंने कहा कि पदार्थ से आनंद नहीं मिलता। जब तक प्रकृति, अपने मूल और निजता में नहीं लौटेंगे, खुशी नहीं मिलेगी। आत्मानुभूति ज्यादा जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोक मंथन में शासक, प्रशासक और उपासक को एक मंच पर लाने के लिये श्री चौहान ने राजा हर्षवर्धन और विक्रमादित्य की परंपरा निभायी है। राज्यसभा सदस्य श्री विनय सहस्त्रबुद्धे ने ‘लोक मंथन’ की परिकल्पना और आयोजन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि राष्ट्रवादी विचार पंरपराओं की श्रंखला में प्रदेश में छह बड़े आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारत महान राष्ट्र है। जब विकसित देशों में लोग पेड़ों की छाल से तन ढँकते थे तब भारत में रेशम और मलमल बनते थे। नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे। जब कई विकसित देशों का अस्तित्व नहीं था तब भारत में वेदों की रचना हो चुकी थी। यहाँ का ज्ञात इतिहास पाँच हजार सालों का है। उन्होंने कहा कि भारत की लोक विरासत अत्यंत विराट और समृद्ध है। इसी भूमि ने विश्व को कई उदात्त नैतिक सिद्धांत दिये हैं। उन्होंने कहा कि लोक मंथन के माध्यम से उपलब्ध हुए अमृत विचारों को राज्य सरकार द्वारा सघन रूप से प्रचारित-प्रसारित किया जायेगा। राज्यपाल एवं मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने इस अवसर पर चार किताबों का विमोचन किया। संस्कृति राज्य मंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा ने अतिथियों को स्मृति-चिन्ह भेंट किये। प्रमुख सचिव संस्कृति श्री मनोज श्रीवास्तव ने आभार व्यक्त किया। विधानसभा अध्यक्ष श्री सीताशरण शर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, प्रज्ञा प्रवाह के संयोजक श्री सदानंद सप्रे एवं बड़ी संख्या में विद्वान एवं शोधकर्ता उपस्थित थे।

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