Saturday, February 29th, 2020

सदियों रहा है दुश्मन दौर ऐ जहां हमारा

invc{ वसीम अकरम त्यागी **} पिछले एक दशक से पश्चिमी मीडिया और उसके पदचिन्हों पर चलने वाली भारतीय मीडिया ने जितना दुष्प्रचार इस्लाम और उसके अनुयायीयों के खिलाफ किया है उतना किसी धर्म संप्रदाय के खिलाफ नहीं किया। उसी का परिणाम है कि आज लोग मुसलमानों को हिकारत की नजरों से नजरों से देखने लगे हैं। उन्हें किराये पर घर लेने तक में परेशानी होती है यदि पासपोर्ट बनवाना हो तो मानो बाप दादा तक की कुंडली खंगाली जाती है। कुछ लोग पवित्र ग्रंथ कुरआन को बुरा भला कहते हैं, कुछ इस्लाम के अनुयायीयों को हिंसक और आतंकवादी समझते हैं और अपने अंदर ये गलत धारणा पाल लेते हैं कि इस्लाम आतंक सिखाता है। कुछ नासमझ लोग कुरआन में भी संशोधन करने की सलाह देते हैं। भला अब इन को कौन समझाऐ कि इस्लाम में आतंक के लिये कोई जगह नहीं है, ये तो एक निर्दोष इंसान के कत्ल को तमाम मानवजाती का कत्ल मानता है. आत्म हत्या करना गैरइस्लामी अमल है फिर आत्मघाती हमला करने वाले लोग मुसलमान कैसे हो सकते हैं ? उसका नाम लेकर दुनिया में आतंक फैलान वाले लोगों का इस्लाम से क्या सरोकार है. बलात धर्म दूसरे धर्मों से ईषर्या इस्लाम कैसे सिखा सकता है, जबकि खुद इस्लाम कहत है कि किसी गिरोह की दुश्मनी तुम्हें उस ओर न ले जाये कि तुम न्याय की राह से विचलित हो जाओ. तो फिर कैसे ये आरोप लगाया जा सकता है कि इस्लाम नफरत फैलाता है ? फिर क्यों इसे तरह तरह की साजिशों के तहत बदनाम किया जा रहा है। जो लोग इस्लाम और मुसलमानों पर तरह तरह के आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें अमेरिका द्वारा किया गया आतंकवाद नजर क्यों नहीं आता. वही आतंकवाद जिसे वे लोकतंत्र के नाम पर ईराक लेकर गये और उसके चिथड़े रोजाना बगदाद की सड़कों पर पड़े मिलते हैं क्या ये आतंकवाद नहीं ? या एक पूंजीपति राष्ट्र द्वारा की गई हत्या हत्या नहीं होती बड़ा अजीब पैमाना है इन बुद्धीजीवियों के पास जिसमें अमेरिकी आतंकवाद ही नजर नहीं आता. इन्हें बर्मा में रोहांगिया मुसलमानों पर किया जाने वाला जुल्म नजर नहीं आता जो बोद्ध धर्म के उपासक करते हैं क्यो ? इन्हें इजरायल द्वारा दो लाख से भी अधिक फिलस्तीनियों का कत्ल नहीं दिखाई देता क्या वह आतंकवाद नहीं है ? पाकिस्तान अफगानिस्तान में होने वाले द्रोण हमले में मारे जाने वाले लोग क्या निर्दोष नहीं हैं फिर ये आतंकवाद क्यों नहीं ? दरअस्ल ये विकृत मानसिकता के लोग है जिनके निशाने पर हमेशा इस्लाम रहता हैं । कहते हैं कि हजारों साल पहले लिखी गई कुरआन को को बदल दिया जाये कैसी भोंडी बात है ? कैसे तुच्छ बातों पर कलम चेलानी पड़ रही है ? इनको शीशा पिघला कर कानों में डालने का संदेश देने वाली मनुस्मृती में कोई खोट नजर नहीं आती हां बराबरी का हक देने वाले ग्रंथ में जरूर खोट नजर आती है। उसके बाद भी मुसलमानों पर आरोप कि वे आतंकवादी होते है, उसके बाद भी कुरआन नफरत की शिक्षा देने वाली किताब....... मगर कैसे ? ये भी तो बताना पड़ेगा इन स्वंय घोषित बुद्धीजीवियों को। हर एक आतंकवादी घटना के बाद ये सीधे सीधे मुस्लिमों को निशाने पर ले आते हैं मगर उस उपद्रव को ये आतंकवाद मानने को तैयार नहीं जो बहुसंख्यक समाज द्वारा या पूंजिपतियों राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन, इजरायल द्वारा किया जाता है।India Ayodhya Verdict पिछले एक दशक में अमेरिका ईराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, में लगभग 10 लाख लोगों को ठिकाने लगा चुका है क्या किसी पोप ने कहा कि ईसाई धर्म आतंकवाद नहीं सिखाता ? इजरायल फिल्सलीन में दो लाख फिलस्तीनियों को स्वर्गवासी बना चुका है क्या किसी रब्बी ने कहा कि यहूदी धर्म आतंकवाद नहीं सिखाता ? गुजरात में पांच हजार मुसलमान वाजपेयी, मोदी के तंदूर में पका दिये गये क्या किसी सनातन धर्म के मानने वाला ने कहा कि सनातन धर्म आतंकवाद नहीं सिखाता ? उल्टे अशोक सिंघल ने इस हैवानियत को हिंदू धर्म में आयी जागृती बताया था। अब बताईये बदलाव की जरूरत कहां है ? बल्कि वास्तिवकता तो यह है कि सारी दुनिया के निशाने पर केवल एक ही समुदाय है जिसकी कहीं नहीं चलती उसकी यहां चल जाती है. दूसरे कुछ कट्टरपंथी लोग जो जरा सी बात पर आपा खो बैठते हैं इन्हीं so called बुद्धीजीवियों अब चाहे वह तसलीमा हो या सलमान रुश्दी इन्हें विश्व प्रसिद्ध बना देते हैं। मगर वे लोग जो आये दिन मुसलमानों और इस्लाम को कौसते रहते हैं उन्हें या तो घटना दिखाई नहीं देती या फिर वे जानबूझकर अनजान बना जाते हैं। वे प्रत्येक हिंसा की जड़ इस्लाम को मानते हैं मगर ये तक पढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते कि इस्लाम कहता क्या है ? तो पहले उन्हें अपनी सोच को बदलना होगा उन्हें अमेरिका आतंकवाद, इजरायली आतंकवाद, बोद्धिस्ट आतंकवाद का मूल्यांकन करना होगा उसके बाद कोई नुक्ता चीनी इस्लाम और उसके अनुयायीयों पर होगी । रहा सवाल इस्लाम दुश्मनी का तो अल्लामा इकबाल ने कहा भी है कि ... बातिल से डरने वाले ऐ आसमां नहीं हम सो बार कर चुका है तू इम्तहां हमारा।

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Wasim-Akram-Wasim-Akram-tyagi-वसीम-अकरम-त्यागी4वसीम अकरम त्यागी युवा पत्रकार

9927972718, 9716428646

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