कहानीकार महेंद्र भीष्म कि ” कृति लाल डोरा ”  पुस्तक की सभी कहानियां आई एन वी सी न्यूज़ पर सिलसिलेवार प्रकाशित होंगी , आई एन वी सी न्यूज़ पर यह एक पहला और अलग तरहा प्रयास  व् प्रयोग हैं .

 - लाल डोरा पुस्तक की सत्रहवीं कहानी -

___ वह चिड़िया ____

Mahendra-BhishmaMahendra-Bhishma-storystory-by-Mahendra-Bhishma1111111वह एक जंगली चिड़िया थी। मनुष्यों की भाषा में उसके वर्ग के पक्षी को ‘तीतर’ नाम मिला है। उसके बचपने के दिन बीतते जा रहे थे। अब वह किशोरावस्था में कदम रख चुकी थी। उसका शरीर पहले से तरोताजा और सुन्दर लगने लगा था। जब कभी वह पानी में फुदकते हुए उसमें अपने शरीर को देखती, तब उसे अपने आप पर गर्व हो उठता। उसके संगी-साथी उसका सामीप्य पाने को लालायित रहते। दूसरों के मध्य स्वयं को महत्त्वपूर्ण पा वह सदैव प्रसन्न और स्फूर्तिवान रहती।

नीले आसमान में घुमड़े बादामी बादलों का समूह धरती मां की हरित साड़ी को भिगोकर छंट चुका था। बाहर का मौसम बहुत सुहावना हो चला था। चारों ओर हरियाली ही हरियाली बिखरी पड़ी थी। ऐसे में वह अपने आपको रोक न सकी और अपने घोंसले से बाहर निकल कर पेड़ की टहनी पर बैठ गयी। इतने पर भी उसका मन नहीं माना और अपने नन्हे पंखों के सहारे वह नीले मैदान पर उतर आई। फिर कुछ देर बाद वह बरसाती पानी से भरे छोटे से कुंडनुमा गड्ढे में फुदकने लगी। इस प्रकार जल-स्नान करना उसे बहुत भाता था।

वह जल-क्रीड़ा में इतनी निमग्न हो चुकी थी कि उसे इस बात का कतई भान नहीं हुआ कि जिस पेड़ से वह नीचे उतर आई थी, बारिश से बचने के लिए, उसी पेड़ में छिपे दैत्यकार काले गिद्ध की कुदृष्टि उस पर पड़ चुकी थी। नन्ही चिड़िया के नरम-नरम मांस की कल्पना ने गिद्ध के मुंह में पानी ला दिया। एक ही झपाटे में उस नन्ही चिड़िया को अपनी चोंच में कैद कर लेने की इच्छा से गिद्ध ने नीचे मैदान की ओर तेज गोता लगाया। नन्ही चिड़िया की दृष्टि एकाएक अपनी ओर आते गिद्ध पर पड़ी। वह नन्ही जान चेतनाशून्य किंकर्तव्यविमूढ़-सी अपनी ओर बढ़ रही मृत्यु को स्पष्ट देख रही थी। मृत्यु-भय से उसकी आंखें स्वतः बंद हो गयीं। उसके शरीर पर पड़ा बरसाती जल, भय और घबड़ाहट से निकले पसीने में मिलकर गर्मीला हो गयज्ञं वह अपने जीवन की आशा त्याग चुकी थी। बचाव का समय क्षण मात्रा भी न था। तभी एक धमाकेदार आवाज हुई। चिड़िया धमाका सुनकर मारे घबराहट के उसी नन्हे कुंड में लुढ़क गयी। कुछ पल बाद उसने अपनी आंखें खोलीं तो देखा दैत्याकार काला गिद्ध अपनी चोंच खोले उसके बहुत निकट मृत पड़ा था, जिसके शरीर से रक्त बहकर छोटे से कुंड में पानी को लाल कर रहा था। ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। हरि-स्मरण कर अपनी चोंच से नन्ही चिड़िया ने अपने शरीर को टटोला, सब कुछ यथावत था। वह आश्वस्त हुई और एक तेज सांस लेने के बाद कुंड से बाहर आ गयी। बाहर आने पर उसने देखा, एक बंदूकधारी तेज कदमों से उसके पास आ रहा है।

‘तो यह है उसके जीवन का रक्षक, जिसने उसे गिद्ध के आक्रमण से बचाया। वह अपने रक्षक की ओर कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि से देखने लगी। कुछ पल बाद ही वह बंदूकधारी की पीठ पर पड़े थैले के अन्दर थी। वह घुटन भरी अंधेरी खोह में सिमटी हुई सोच में पड़ गयी। उसे उसके रक्षक ने उठाया। उसके शरीर पर हाथ फेरा। फिर वह मुस्कराया और उसे स्वतंत्र कर देने के स्थान पर उसने उसे अपने थैले में क्यों कैद कर लिया?’ विचार-मन्थन के बाद उसने तय किया कि चाहे जैसा भी हो, बंदूकधारी ने दुष्ट गिद्ध से उसकी रक्षा की थी। वह उसका रक्षक है और उसे कुछ देर बाद वह छोड़ देगा। आशा जीवन को बनाए रखती है।

बंदूकधारी शिकारी ने गिद्ध के मृत शरीर को बंदूक की नली से कुरेदा, फिर उसे वहीं मरा छोड़कर अपने घर की ओर चल दिया। मार्ग में वह सोचने लगा कि उसने बंदूक का लक्ष्य तीतर के बच्चे पर साधा था, परन्तु क्या संयोग रहा जो गिद्ध बीच में आकर अपने प्राण नाहक गवां बैठा।

इस संयोगपूर्ण घटना से उसने अपनी पत्नी व दोनों बच्चों को अवगत कराया। सभी तीतर के बच्चे को निकट से देखकर खुश हो रहे थे। नन्ही चिली व उसका छोटा भाई बीरू खिलौने को सम्मुख पाकर प्रसन्न थे जबकि उनके माता-पिता तीतर के स्वादिष्ट मांस की कल्पना कर प्रसन्न हो रहे थे।

शिकारी की पुत्री चिली ने नन्ही चिड़िया के सामने फर्श पर बिस्कुट का चूरा और दूध की कुछ बूंदें गिरा दीं। सामने भोजन देखकर नन्ही चिड़िया की सोई भूख जाग उठी। नरम-नरम चूरा चुगने और दूध की कुछ बूंदे गले के नीचे उतार लेने के बाद उसकी पलकें बोझिल हो चलीं। उसे नींद सताने लगी। अमृत तुल्य स्वादिष्ट भोजन पाकर वह तृप्त हो चुकी थी। नींद ने उसे जल्दी ही अपने घेरे में ले लिया और वह पलके बंद किए बैठे-बैठे ऊंघने लगी। चिली व बीरू को तीतर के बच्चे का इस तरह ऊंघना बहुत अच्छा लगा।

दोनों ने सो रही चिड़िया को अपनी मां के कहने पर बांस की टोकरी से ढक दिया। उनकी मां को आशंका थी, कहीं जागने के बाद वह उड़ न जाए। शाम को शिकारी एक सुनहरा बांस का पिंजरा खरीद लाया। शिकारी के दोनों बच्चे पिंजरे में कैद तीतर के बच्चे को खूब खिलाते-पिलाते और उसके साथ खेलते। बंद कमरे में वे दोनों भाई-बहन उसको पिंजरे से निकालकर उससे खेलते।

उस जंगली चिड़िया को धीरे-धीरे अपना सुनहरा घर और दोनों बहन-भाई के साथ खेलना भाने लगा। कुछ दिन यूं ही बीत गये। उस चिड़िया को अब एकांत खलने लगा। अकेलापन काटने को दौड़ता क्योंकि चिली और बीरू के स्कूल खुल चुके थे। फलस्वरूप अब वे पहले जैसा समय उसके साथ बिता नहीं पाते थे। धीरे-धीरे तीतर के बच्चे को अपनी मां, अपने जंगल के संगी-साथियों की याद सताने लगी। एकांकी समय में वह जंगल के स्वच्छंद वातावरण को याद कर बांस के पिंजरे से बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगती। वह सोचती, मेरे रक्षक की मुझ पर यह कैसी दया है? इस कैद से तो अच्छा था कि मुझे वह दैत्य गिद्ध ही मारकर खा जाता। इस रोज-रोज के मरने से एक बार की मौत अच्छी थी।

नन्ही तीतर के ये सारे के सारे विचार चिली व बीरू के स्कूल से वापस आ जाने के बाद धरे के धरे रह जाते। दोनों बहन-भाई के निश्छल प्रेम के वशीभूत हो; वह एकाकीपन में उपजी टीस भरी सोच को भूल जाती। दिन बीतने लगे। नन्ही तीतर अब नन्ही नहीं रही। पहले से मोटी हो गयी थी। चिली व बीरू उसके शरीर को जब-तब टटोला करते। चिड़िया को अपने रक्षक द्वारा अपने शरीर को छूना या सहलाना तो अच्छा लगता, परन्तु उसे अपने शरीर को दबाना या उंगलियों से कोचना बहुत कष्टकर लगता। वह नन्ही जान अपने रक्षक के उद्देश्य से अनभिज्ञ थी। शिकारी तीतर के शरीर पर चढ़ रहे मांस से खुश होकर उसे वापस पिंजरे में बंद कर देता।

नन्ही बीरू की नन्ही उंगलियों के पोर अपनी चोंच में हौले से दबाकर वह भीतर अपने स्नेह को अभिव्यक्त करती। तीतर की इस नित्य की क्रिया से बीरू खुशी से निहाल हो जाता, तब चिली अपनी उंगलियों की मोटी पोरों को देखकर, जो तीतर की चोंच में नहीं आ सकती थी, मन मसोसकर रह जाती। उसे अपनी हथेली पर तीतर की चोंच की गुदगुदी अच्छी लगती थी। दोनों बहन-भाई, तीतर की पूरी देखभाल करते। उसके परों और पंजों की नियमित सफाई करते, उसे स्नेह से सहलाते, चूमते और विभिन्न प्रकार की बातें करते हुए परस्पर संवाद स्थापित कर उसके साथ खेला करते। एक दिन चिली व बीरू तीतर के साथ खेल चुकने के बाद उसे पिंजरे में बंद किए बगैर अपने स्कूल चले गये, तब तीतर को अकेलेपन ने फिर विषाद के घेरे में ले लिया। कमरे की छत पर लगे पंखे पर बैठे-बैठे उसे भान हुआ कि वह पिंजरे के अन्दर नहीं है। तभी उसके मस्तिष्क में यह विचार कौंधा क्यों न वह वापस जंगल चली जाए। विचार मात्रा से उसे पंख स्वतः फड़फड़ाने लगे। कमरे के दरवाजे खुले हुए थे। वह आंगन से उड़ती हुई मुंडेर के ऊपर आ गयी और एक बार अपने नन्हे मित्रों को यादकर उसने नीचे की ओर दृष्टि डाली। फिर तेज उड़ान भरकर ऊपर आकाश में आ गयी। आसमान में आने के थोड़ी देर बाद ही उसे वह पहाड़ी दिखाई दी, जिसकी तलहटी के किसी पेड़ पर वह अपनी मां के साथ रहती थी। उसे अपना बसेरा ढूंढ़ने में अधिक कठिनाई नहीं हुई। पेड़-पौधों के प्राकृतिक-परिवर्तन के सिवाय सभी कुछ यथावत था। घांेसले में उसकी मां कुछ दिन पूर्व जन्मे, उसके नवजात भाई-बहनों को चुग्गा खिलाने में व्यस्त थीं। चिड़िया को अपना बचपन याद आ गया। उसकी आंखें मां को देखने मात्र से सजल हो उठीं। मां अपनी खोई बच्ची को एकाएक सामने पाकर खुशी से बेहाल हो उठी। चिड़िया अपनी मां के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी मां की आंखों में मिलन की प्रसन्नता के आंसू उमड़ आए। वह अपनी पुत्री को ढाढ़स बंधाने लगी। मां-बेटी के इस मिलन में अपनी मां को रोता देख नवजात शिशु भी बिना कुछ समझे रुदन करने लगे। सारी दोपहर वह चिड़िया अपने संगी-साथियों के साथ मौज-मस्ती करती रही। अपने बीते दिनों के बारे में उसने सबको बताकर रोमांचित कर दिया। उसने अपने नन्हे दोस्तों, चिली व बीरू के बारे में भी सबको बताया। मीठे और स्वादिष्ट भोजन के बारे में भी सभी को बताया। उसके सभी संगी-साथी उसके भाग्य की सराहना करने लगे। वह चिड़िया सभी के बीच आज फिर महत्त्वपूर्ण बन गयी थी। सभी उसके स्वस्थ और मोटे-ताजे शरीर को देख और छूकर उसकी बातों पर विश्वास कर रहे थे।

‘क्या वह पुनः मनुष्यों के पास जाएगी?’ इस प्रश्न ने उत्साहित तीतर को असमंजस में डाल दिया। कुछ पल बाद उसने अपना निर्णय सुना दिया, ‘‘हां! वह अवश्य जाएगी।’’ एक मोटे चिड़े टिंगू को उसका यह निर्णय कतई अच्छा नहीं लगा। वह उससे मन ही मन बहुत पहले से प्रेम करता था। वह फिर बिछोह को याद करके बोल पड़ा, ‘‘नहीं! अब मत जाना वापस मनुष्यों के पास। वह लोग ठीक नहीं होते। सुना है, हम पक्षियों को मारकर आग में भूनकर खा जाते हैं।’’

मोटे टिंगू की आशंका को अपनी प्रसन्नता और उत्साह के सामने झाड़ते हुए वह चिड़िया दृढ़ता से बोली, ‘‘वह वापस अवश्य जाएगी।’’ सांझ घिरते ही उसके संगी-साथी एक-एक कर अपने-अपने घोंसलों में चले गये, सिवाय मोटे चिड़े टिंगू के। वह उससे बहुत कुछ बातें करना चाहता था। तीतर अपने दोनों दोस्तों चिली व बीरू की याद आने पर उदास हो गयी और टिंगू चिड़े को वहीं छोड़ अपने घोंसले में आ गयी। घोंसले में आकर सोचने लगी, उसके दोनों मित्र वापस आ चुके होंगे और उसे पिंजरे में न पाकर कितने दुखी हो रहे होंगे। उसका रक्षक उसके बारे में क्या सोच रहा होगा। उसके प्राणों की रक्षा उसने की और स्वादिष्ट मीठा भोजन खिला-खिलाकर उसे तंदुरुस्त किया। उसके बच्चों ने उसे कितना स्नेह दिया।

उसका कितना ध्यान उन सभी ने रखा। उसने अचानक वहां से आकर अच्छा नहीं किया। उसके मस्तिष्क में विचार घुमड़ने लगे और फिर वह अपने आपको रोक न सकी और मुड़ चली अपने रक्षक के घर की ओर, अपने नन्हे मित्रा चिली व बीरू के पास। उसने अपने जाने की सूचना किसी को नहीं दी, यहां तक कि अपनी मां तक को भी नहीं। उसे विश्वास था कि वह एक बार अपने दोनों नन्हे मित्रों से मिलकर वापस आ जाएगी। अपने रक्षक के घर उसके पहुंचते-पहंुचते रात का अधियारा घिर आया था। घरों में विद्युत-प्रकाश फैल चुका था। वह छत की मुंडेर पर कुछ देर सुस्ताकर आंगन में लगे पपीते के पेड़ पर बैठ गयी। तभी उस चिली व बीरू के रोने की आवाज सुनाई दी। सम्भवतः वे दोनों उसके चले जाने से दुःखी हो रहे हैं, यह सोचती हुई वह हालनुमा बैठक के रोशनदान पर आ गयी। हाल के अन्दर उसका रक्षक उसके दोनों दोस्तों के कान उमेठते हुए उन्हें डांट रहा था। वह भोली चिड़िया रक्षक के इस कृत्य को समझ न सकी।

तभी बीरू की दृष्टि उस पर पड़ी। बीरू उसे देखकर रोना भूल खुशी से चिल्ला पड़ा। सभी की दृष्टि रोशनदान पर बैठी तीतर पर पड़ी। रोती हुई चिली ने तीतर की ओर हाथ फैलाकर अस्पष्ट शब्दों में कुछ कहा। वह चिड़िया अपने मित्रा के भाव को ताड़कर केवल इतना ही समझ सकी कि उसके पास पहुंचने पर ही उन दोनों पर पड़ रही मार और डांट बंद होगी। वह रोशनदान से उड़कर चिली की फैली हथेलियों पर पंख सिकोड़कर बैठ गयी। चिली ने उसे अपने गालों पर लगाकर हौले से उसके शरीर को सहलाया, पर एकाएक यह क्या? उसके रक्षक ने झपाटे से उसे दबोचते हुए पिंजरे के अन्दर डाल दिया और पिंजरा बंद कर दिया। अपने रक्षक का यह व्यवहार तीतर को बहुत खराब लगा। दबोचे जाने से दुख रहे शरीर व भय से वह ‘चीं’ कर उठी। चिली व बीरू को भी उसके साथ अपने पिता के द्वारा ऐसा करना बहुत खराब लगा।

शिकारी बक-झक करते हुए वहां से चला गया। उसके जाने के बाद चिली व बीरू ने तीतर को पिंजरे में हाथ डालकर सहलाया, पुचकारा, उसे खाने व पीने को दिया, परन्तु पहले की तरह पिंजरे से बाहर नहीं निकाला। ऊहा-पोह की स्थिति में रात-भर वह चिड़िया ठीक से सो न सकी। कहां बाहर का उन्मुक्त वातावरण और कहां पिंजरे की कैद की अभिशप्त स्थिति। उसे बहुत अजीब लग रहा था। मां की याद कर उसके नेत्रा सजल हो उठे। काश! वह उन्हें बताकर आई होती। काश! टिंगू चिड़े की चेतावनी को वह गम्भीरता से लेती। उसे पहली बार अपने रक्षक के बदले तेवर अच्छे नहीं लग रहे थे। उसका मन अज्ञात आशंका से भर उठा। सुबह चिली व बीरू ने पिंजरे के अन्दर हाथ डालकर उसे सहलाया, खाने-पीने को दिया, किन्तु पिंजरे से बाहर नहीं निकाला। कल शाम अपने पिता द्वारा पड़ी डांट-फटकार से दोनों बहन-भाई अभी तक भयभीत थे। वह चिड़िया उनके निश्छल प्रेम के सामने अपने दुख कुछ समय के लिए भूल गयी। नन्हे बीरू की अंगुली के पोर को अपनी चोंच में दबाकर और चिली की हथेली में चोंच से गुदगुदी करके उसने अपना प्रेम प्रदर्शित किया। शाम को स्कूल से वापस आकर उससे मिलने का वादा करके चिली व बीरू स्कूल चले गये।

शाम को स्कूल से दोनों बहन भाई जब वापस घर लौटे तो नित्य की भांति दौड़कर पिंजरे के पास पहुंचे, परन्तु यह क्या? हठात् दोनों किंकर्तव्यविमूढ़ से खाली पिंजरे को देख मूर्ति बन गये। भय और घबराहट के कारण दोनों के माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा आईं। चिड़िया फिर उड़ गयी मगर कैसे? दोनों की समझ में कुछ नहीं आया। सुबह तो उन्होंने पिंजरा खोला तक नहीं था। फिर वह पिंजरे से बाहर कैसे निकल गयी? अपने पिता की डांट के स्मरण-मात्र से दोनों बहन-भाई रुआंसे हो उठे। कमरे से बाहर आंगन में, फिर छत तक दोनों अपनी मित्र चिड़िया को देख आए, परन्तु वह उन्हें दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं दी। सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए अचानक चिली की दृष्टि किचन के बाहर बरामदे में रखी कूड़े की टोकरी में खून से सने तीतर के कटे डैने और पंजों पर पड़ी। उसके कंठ से तेज चीख निकल गयी। अपनी दीदी की कारुणिक चीख से बीरू भी चैंका। उसकी दृष्टि भी टोकरी पर पड़ी। दोनों बहन-भाई तेजी से शेष सीढ़ियां उतरकर भागते हुए किचन के बरामदे में रखी कूड़े की टोकरी तक पहुंचे। अपने नन्हे हाथों से अपनी मित्र तीतर के रक्त-मिश्रित पंखों और पंजों को उठाकर चिली रो पड़ी। तीतर के अन्जाम को समझकर और अपनी दीदी को रोता देख नन्हा बीरू भी जोर-जोर से रोने लगा।

बच्चों का एकाएक रोना सुन उनकी मां किचन से बाहर आ गयी। तभी किचन के अन्दर से प्रेशर कुकर की तेज सीटी से चिली व बीरू चैंक गये। ‘उनकी मित्रा तीतर प्रेशर कुकर के अन्दर उबल रही थी।’ दोनों यह सोचकर और तेज स्वर में रो पड़े। बच्चों की मां सारी बात समझ गयी। उसे अपनी व अपने पति की गलती समझ में आ रही थी। उसने अपने दोनों बच्चों को अपने आंचल में समेटने का प्रयास किया, पर वह दोनों मां से दूर छिटक कर हट गये और अपने कमरे में आकर अपनी नन्ही मित्र की याद में रो-रोकर तकिया गीला करने लगे। रात किसी ने भी खाना नहीं खाया। शिकारी व उसकी पत्नी अपने बच्चों के दुःख को महसूस कर रहे थे। वह चिड़िया, जिसे अपना रक्षक समझ बैठी थी, वही रक्षक उसका प्राणहंता बन गया, परन्तु अपनी दुःखद मृत्यु के बाद वह एक मांसाहारी परिवार को सदा के लिए शाकाहारी बना गयी।

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Mahendra-BhishmaMahendra-Bhishma-storystory-by-Mahendra-BhishmaMahendra-Bhishma1111121परिचय -:
महेन्द्र भीष्म
सुपरिचित कथाकार

बसंत पंचमी 1966 को ननिहाल के गाँव खरेला, (महोबा) उ.प्र. में जन्मे महेन्द्र भीष्म की प्रारम्भिक षिक्षा बिलासपुर (छत्तीसगढ़), पैतृक गाँव कुलपहाड़ (महोबा) में हुई। अतर्रा (बांदा) उ.प्र. से सैन्य विज्ञान में स्नातक। राजनीति विज्ञान से परास्नातक बुंदेलखण्ड विष्वविद्यालय झाँसी से एवं लखनऊ विश्वविद्यालय से विधि स्नातक महेन्द्र भीष्म सुपरिचित कथाकार हैं।

कृतियाँ कहानी संग्रह: तेरह करवटें, एक अप्रेषित-पत्र (तीन संस्करण), क्या कहें? (दो संस्करण)  उपन्यास: जय! हिन्द की सेना (2010), किन्नर कथा (2011)  इनकी एक कहानी ‘लालच’ पर टेलीफिल्म का निर्माण भी हुआ है। महेन्द्र भीष्म जी अब तक मुंशी प्रेमचन्द्र कथा सम्मान, डॉ. विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार, महाकवि अवधेश साहित्य सम्मान, अमृत लाल नागर कथा सम्मान सहित कई सम्मानों से सम्मानित हो चुके हैं।

संप्रति -:  मा. उच्च न्यायालय इलाहाबाद की  लखनऊ पीठ में संयुक्त निबंधक/न्यायपीठ सचिव

सम्पर्क -: डी-5 बटलर पैलेस ऑफीसर्स कॉलोनी , लखनऊ – 226 001 दूरभाष -: 08004905043, 07607333001-  ई-मेल -: mahendrabhishma@gmail.com