शिव कुमार झा टिल्लू की टिप्पणी : ( श्री श्यामल सुमन जी की कविताओं पर ) महाकवि दिनकर ने कहा है " कवि हूँ आज प्रकृति पूजन में निज कविता को दीप जलाऊँ " आशु कवित्व की यह समाजोपयोगी धारणायें वर्तमान हिन्दी प्रगीत काव्य के प्रबल हस्ताक्षर श्री श्यामल सुमन जी की कविताओं में परिलक्षित होती हैं.श्यामल जी के प्रगीत काव्यों की प्रशंसा   हमारे पूर्व साहित्यकार प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने भी किया है . आप प्रांजल भाषा शैली के ऐसे   प्रवीण गीतकार हैं , जो  हमारी अनर्गल व्यवस्था के ऊपर प्रतिवाद तो करते हैं.परन्तु उस प्रतिवाद में सकारात्मक दृष्टिकोण होता है. जीवन व्यवस्था के  विविध आयामों का सरल शब्दों में व्यंग्यात्मक आरोहण इनकी विशिष्ट पहचान है .जनवादी मंच के प्रखर गीतकार होने के साथ साथ आप एक कुशल वक्ता भी हैं . नवकवितावाद के इस युग में प्रगीत लक्षणा और अभिव्यंजना   को आपने अपने काव्यों में जीवंत रखा है इसमे आपके आशुत्व गुण  और  आपकी सहधर्मिणी श्रीमती सुमन जी का विशेष योगदान है. मैथिली और हिन्दी दोनों में आप समान अधिकार रखते है. ( शिव कुमार झा टिल्लू . वर्तमान .मैथिली और हिन्दी के चर्चित कवि और समालोचक )

श्यामल सुमन  की कलम से गज़लें , मुख्तक ,गीत व् कविता 
 1.रोटी मिली पसीने की
इक हिसाब है मेरी जिन्दगी सालों साल महीने की लेकिन वे दिन याद सभी जब रोटी मिली पसीने की लोग हजारों आसपास में कुछ अच्छे और बुरे अधिक इन लोगों में ही तलाश है नित नित नए नगीने की नेकी  करने वाले अक्सर बैठे गुमशुम कोने में समाचार में तस्वीरों संग चर्चा आज कमीने की आज जिन्दगी भँवर बनी जब सबको पार उतरना है मगर फिक्र है कहाँ किसी को हालत देख सफीने की सच्चाई का साथ ना छोड़ा न छोड़ा ईमान कभी लोग कहे फिर सुमन करे जो करता नहीं करीने की
2. विद्वानों से डर लगता है
पढ़े लिखों का घर लगता है भाव बिना बंजर लगता है बस, डिग्री ले घूमे, ऐसे विद्वानों से डर लगता है काम उलट, भाषण ओजस्वी मर जाऊँ, सुनकर लगता है बाल की खाल निकाले हरदम यह उनको सुन्दर लगता है सुमन यही कारण भारत का अब ऐसा मंजर लगता है
3.नींद तुम्हारी आँखों में
नींद तुम्हारी आँखों में पर मैंने सपना देखा है अपनों से ज्यादा गैरों में मैंने अपना देखा है किसे नहीं लगती है यारो धूप सुहानी जाड़े की बर्फीले मौसम में टूटे दिल का तपना देखा है बड़े लोग की सर्दी - खाँसी अखबारों की सुर्खी में फिक्र नहीं जनहित की ऐसी खबर का छपना देखा है धर्म-कर्म पाखण्ड बताकर जो मंचों से बतियाते उनके घर में अक्सर यारो मन्त्र का जपना देखा है चुपके से घायल करते फिर अपना बनकर सहलाते हाल सुमन का जहाँ पे ऐसा वहीं तड़पना देखा है
4. हाथ सुमन तू मलता जा
कदम कदम तू चलता जा बस लोगों को छलता जा सम्भल, जहाँ अवसर आए तो रिश्ते छोड़, निकलता जा सारे सुख हैं भौतिकता में पा कर उसे मचलता जा सुख पाने को अपमानों का निशि दिन जहर निगलता जा जहाँ जरूरत, गढ़ अपनापन सख्ती छोड़, पिघलता जा नीति नियम मूरख बतियाते दुनिया के संग ढलता जा और अंत में रहो अकेले हाथ सुमन तू मलता जा
5. बचाने कौन आएगा
सजाना जिन्दगी को नित सिखाने कौन आएगा जहाँ तालाब हो गन्दा नहाने कौन आएगा किसी की बेबसी का फायदा कोई उठा ले गर यकीं मानो दुबारा उस ठिकाने कौन आएगा कहीं आँसू हैं रोने के कहीं हँसते हुए आँसू अगर आँसू मुकद्दर है हँसाने कौन आएगा जरा सहला दे बूढ़े पेड़ को आँगन खड़ा है जो कहीं सूखा तो बीता कल दिखाने कौन आएगा समन्दर है बहुत गहरा तेरी आँखों से कम लेकिन समभ्ल कर के सुमन उतरो बचाने कौन आएगा
6.चेहरे पर ही धूल है
वे खोजे महबूब चाँद में हाल जहाँ माकूल है रोटी में जो चाँद निहारे क्या भूखों की भूल है लोग सराहे जाते वैसे जनहित में जो खड़े अभी अगर साथ चलना तो कहते, रस्ते बहुत बबूल है अपने अपने तर्क सभी के खुद की गलती छुप जाए गलती को आदर्श बनाकर कहते यही उसूल है सूरत कैसी अपनी यारो देख नहीं पाया अबतक समझ न पाया दर्पण पे या चेहरे पर ही धूल है माँ की ममता का बँटवारा सन्तानों में सम्भव क्या कहीं पे रौनक कहीं उदासी, कैसा नियम रसूल है किसी के कंधे अर्थी देखो दूजे पर दिखती डोली रो कर लोग विदा करते पर दोनों पर ही फूल है संघर्षों में चलता जीवन सोच समझकर चला करो शायद सुमन कहीं मिल जाए बाकी सब तिरशूल है
7. बात कहने की धुन
बात कहने की धुन गीत लिखने की धुन, जिन्दगी है खुशी गम को सहने की धुन। वश में कुछ भी नहीं हौसले के सिवा, बन के दीपक जगत में है जलने की धुन।। रास्ते में पहाड़ी है दरिया कभी, सामना जिन्दगी में तो करते सभी। ये समन्दर की लहरें सिखाती हमें, हर मुसीबत से आगे निकलने की धुन।। चाहे फिसलन सही जो फिसलता नहीं, दिन गर्दिश के हों पर बदलता नहीं। एक इन्सान सच्चा उसे हम कहें, जिसके भीतर हो जीवन समझने की धुन।। जब कि कुदरत ने सबको है सींचा यहाँ, कौन ऊँचा यहाँ कौन नीचा यहाँ। रोज दीवारें आँगन में बनती है क्यों, दिल की दूरी से हरदम निबटने की धुन।। लोग अपने सभी हो न दिल में जलन, राह ऐसे चले जो उसी को नमन। वो सुमन तो हमेशा ही बेचैन है, जिसको बेहतर फिजा में सँवरने की धुन।।
8. मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं
मौत आती है आने दे डर है किसे, मेरे जीने की रफ्तार कम तो नहीं बाँटते ही रहो प्यार घटता नहीं, माप लेना तू सौ बार कम तो नहीं गम छुपाने की तरकीब का है चलन, लोग चिलमन बनाते हैं मुस्कान की पार गम के उतर वक्त से जूझकर, अपनी हिम्मत पे अधिकार कम तो नहीं था कहाँ कल भी वश में ना कल आएगा, हर किसी के लिए आज अनमोल है कई रोते मिले आज, कल के लिए, उनके चिन्तन का आधार कम तो नहीं लोग धरती पे आते हैं रिश्तों के सँग, और बनाते हैं रिश्ते कई उम्र भर टूट जाते कई उनमे क्यों सोचना, कहीं आपस का व्यापार कम तो नहीं जिन्दगी होश में है तो सब कुछ सही, बोझ माना तो हर पल रुलाती हमे ये समझकर अगर तू न समझा सुमन, तेरी खुशियों का संसार कम तो नहीं।
9. छटपटाता आईना
सच यही कि हर किसी को सच दिखाता आईना ये भी सच कि सच किसी को कह न पाता आईना रू-ब-रू हो आईने से बात पूछे गर कोई कौन सुन पाता इसे बस बुदबुदाता आईना जाने अनजाने बुराई आ ही जाती सोच में आँख तब मिलते तो सचमुच मुँह चिढ़ाता आईना कौन ऐसा आजकल जो अपने भीतर झाँक ले आईना कमजोर हो तो छटपटाता आईना आईना बनकर सुमन तू आईने को देख ले सच अगर न कह सका तो टूट जाता आईना
10.तस्वीर
अगर तू बूँद स्वाती की, तो मैं इक सीप बन जाऊँ बनो तुम प्रेम की पाती, तो मैं इक गीत बन जाऊँ अंधेरे और नफरत को मिटाता प्रेम का दीपक कहीं बन जाओ तुम बाती, तो मैं इक दीप बन जाऊँ तेरी आँखों में गर कोई, मेरी तस्वीर बन जाये मेरी कविता भी जीने की, नयी तदबीर बन जाये बडी मुश्किल से पाता है कोई दुनियाँ में अपनापन बना लो तुम अगर अपना, मेरी तकदीर बन जाये भला बेचैन क्यों होता, जो तेरे पास आता हूँ कभी डरता हूँ मन ही मन, कभी विश्वास पाता हूँ नहीं है होंठ के वश में जो भाषा नैन की बोले नैन बोले जो नैना से, तरन्नुम खास गाता हूँ कई लोगों को देखा है, जो छुपकर के गजल गाते बहुत हैं लोग दुनियाँ में, जो गिरकर के संभल जाते इसी सावन में अपना घर जला है क्या कहूँ यारो नहीं रोता हूँ फिर भी आँख से, आँसू निकल आते है प्रेमी का मिलन मुश्किल, भला कैसी रवायत है मुझे बस याद रख लेना, यही क्या कम इनायत है भ्रमर को कौन रोकेगा सुमन के पास जाने से नजर से देख भर लूँ फिर, नहीं कोई शिकायत है
11. सच की लड़ाई
सवालों से लड़कर, सँवरता गया हूँ विवादों से भिड़कर, उभरता गया हूँ सुमन खुद ही खुशबू में, तब्दील होकर सरे-वादियों में, महकता गया हूँ यूँ दुनिया से लड़ना, कठिन काम यारो है खुद को बदलना, हरएक शाम यारो मेरी जो भी फितरत, ये दुनिया भी वैसी, हो कोशिश कभी, न हों बदनाम यारो नया सीख लेने की, हरदम ललक है कहीं पर जमीं तो, कहीं पर फलक है मगर दूसरों की, तरफ है निगाहें, जो दर्पण को देखा, तो खुद की झलक है कहूँ सच अगर तो, वे मुँहजोर कहते अगर चुप रहूँ तो, वे कमजोर कहते मगर जिन्दगी ने ही, लड़ना सिखाया, है सच की लड़ाई, जिसे शोर कहते
12.मौन का संगीत
जो लिखे थे आँसुओं से, गा सके ना गीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।। दग्ध जब होता हृदय तो लेखनी रोती। ऐसा लगता है कहीं तुम चैन से सोती। फिर भी कहता हूँ यही कि तू मेरा मनमीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।। खोजता हूँ दर-ब-दर कि प्यार समझा कौन। जो समझ पाया है देखो उसकी भाषा मौन। सुन रहा बेचैन होकर मौन का संगीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।। बन गया हूँ मैं तपस्वी याद करके रोज। प्यार के बेहतर समझ की अनवरत है खोज। खुद से खुद को ही मिटाने की अजब है रीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।। साँसें जबतक चल रहीं हैं मान लूँ क्यों हार? और जिद पाना है मंजिल पा सकूँ मैं प्यार। आज ऐसा है सुमन का, आज से ही प्रीत। अबतलक समझा नहीं कि हार है या जीत।।
13. रोते कितने लोग यहाँ
इस माटी का कण कण पावन। नदियाँ पर्वत लगे सुहावन। मिहनत भी करते हैं प्रायः सब करते हैं योग यहाँ। नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।। ये पंजाबी वो बंगाली। मैं बिहार से तू मद्रासी। जात-पात में बँटे हैं ऐसे, कहाँ खो गया भारतवासी। हरित धरा और खनिज सम्पदा का अनुपम संयोग यहाँ। नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।। मैं अच्छा हूँ गलत है दूजा। मैं आया तो अबके तू जा। परम्परा कुछ ऐसी यारो, बुरे लोग की होती पूजा। ऐसा लगता घर घर फैला ये संक्रामक रोग यहाँ। नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।। सच्चाई का व्रत-धारण हो। एक नियम का निर्धारण हो। अवसर सबको मिले बराबर, नहीं अलग से आरक्षण हो। मिलकर सभी सुमन कर पाते सारे सुख का भोग यहाँ नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।।
परिचय -: 
श्यामल सुमन की कविता ,कवि श्यामल सुमन, श्यामल सुमनश्यामल सुमन
शिक्षा :  एम० ए० - अर्थशास्त्र , तकनीकी शिक्षा : विद्युत अभियंत्रण में डिप्लोमा
वर्तमान पेशा :  प्रशासनिक पदाधिकारी टाटा स्टील, जमशेदपुर, झारखण्ड, भारत
साहित्यिक कार्यक्षेत्र :  छात्र जीवन से ही लिखने की ललक, स्थानी समाचार पत्रों सहित देश के प्रायः सभी स्तरीय पत्रिकाओं में अनेक समसामयिक आलेख समेत कविताएँ, गीत, ग़ज़ल, हास्य-व्यंग्य आदि प्रकाशित
स्थानीय टी.वी. चैनल एवं रेडियो स्टेशन में गीत, ग़ज़ल का प्रसारण, कई राष्ट्रीय स्तर के कवि-सम्मेलनों में शिरकत और मंच संचालन अंतरजाल पत्रिका "अनुभूति,हिन्दी नेस्ट, साहित्य कुञ्ज, साहित्य शिल्पी, प्रवासी दुनिया, प्रवक्ता, गर्भनाल, कृत्या, लेखनी, आखर कलश आदि मे अनेकानेक  रचनाएँ प्रकाशित
गीत ग़ज़ल संकलन "रेत में जगती नदी" - (जिसमे मुख्यतया मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं पर आधारित रचनाएँ हैं) प्रकाशक - कला मंदिर प्रकाशन दिल्ली "संवेदना के स्वर" - कला मंदिर प्रकाशन में प्रकाशनार्थ ,"अप्पन माटि" - मैथिली गीत ग़ज़ल संग्रह - प्रकाशन हेतु प्रेस में जाने को तैयार
सम्मान - पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा प्रेषित प्रशंसा पत्र -२००२ साहित्य-सेवी सम्मान - २०११ - सिंहभूम जिला हिन्दी साहित्य सम्मलेन मैथिल प्रवाहिका छतीसगढ़ द्वारा - मिथिला गौरव सम्मान २०१२ नेपाल के उप प्रधान मंत्री द्वारा विराट नगर मे मैथिली साहित्य सम्मान - जनवरी २०१३ अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन संयुक्त अरब अमीरात में "सृजन श्री"सम्मान - फरवरी २०१३
संपर्क - : Email ID - shyamalsuman@gmail.com ,मोबाइल - : 09955373288
अपनी बात - इस प्रतियोगी युग में जीने के लिए लगातार कार्यरत एक जीवित-यंत्र, जिसे सामान्य भाषा में आदमी कहा जाता है और जो इसी आपाधापी से कुछ वक्त चुराकर अपने भोगे हुए यथार्थ की अनुभूतियों को समेट, शब्द-ब्रह्म की उपासना में विनम्रता से तल्लीन है - बस इतना ही।